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Showing posts from March, 2012

अब गली के मोड़ पर है

कल्पवृक्षों के सुमन कुछ आन झोली में गिरे हैंआ मरुस्थल पर लगा ज्यों सावनी बादल घिरे हैंदेवसलिला की लहर आईं उमड़ कर वीथियों मेंनयन झीलों में सपन सतरंगिया होकर तिरे हैंएक झोंका गंध का पट खोलकर वातायनों केकह गया है रथ तुम्हारा अब गली के मोड़ पर हैलग पड़ी छँटने घिरी थी कक्ष में गहरी उदासीसांझ की अंगड़ाईयों में लग पड़ी घुलने विभा सीरश्मि की पाजेब बांधे नृत्यमग्ना हो प्रतीचीहो गई है पुष्पधन्वा के शरों की कामना सीआतुरा होते नयन की दृष्टि को संगम अपेक्षितज्ञात है बस झपझपाती सी पलक की कोर पर हैसांस में सारंगियों के सुर लगे आकर विचरनेधड़कनों की आस में लगने लगा विश्वास भरनेश्वेत पाटल पर कुसुम के चन्द बासन्ती पराकणलग पड़े हैं चित्र में अनुराग के नव रंग भरनेरह गया बँध कर कलाई से दिवस की शाख पर जोवह निराशा का प्रहर अब उंगलियों की पोर पर हैदृष्टि बन रेखायें रह रह भित्तिचित्रों को निहारेंथाल में अगवानियों के पुष्प की गंधें निखारेंध्यान की नारद सरीखी भ्रामरी को कर नियंत्रितमन निलय सज्जाओं की बारीकियां फ़िर फ़िर संवारेबांसुरी की टेर पर पाजेब की रुनझुन बिखरनाएक स्मितमय अधर के बस थरथराते छोर पर है

गज़लों का उन्वान कर लिया

हमको जब सुकरात समझ कर दिया भेंट में गरल किसी नेहमने खुद को नीलकंठ तब कर कर उसका पान कर लियाआवश्यकता नहीं अगर तो नहीं अपेक्षायें हीं  होतीजिसका जितना संचय, उसकी उतनी बढ़ीं लालसायें भीभोर गिनतियों की सीढ़ी पर चढ़ते चढ़ते विलय हो गयीऔर दिवस की गुत्थी में ही रहीं उलझ कर संध्यायें भीयुग तो देता रहा निरन्तर अवसर राजमुकुट को थामेलेकिन वह आसीन कहाँ रह्ता जिसने अभिमान कर लियादृष्टि सितारों पर रख कर जब चलते रहे पांव गतिमय होतब तब अपने पग के चिह्नों का भी हमने किया आकलनभाव अगर इक तन कर मन में खड़ा हो गया ताड़ सरीखातब तब हमने देखा अपनी परछाईं का सहज समर्पणठोकर खा गिर पड़े शब्द जो रहे पंथ में अनदेखे हीहमने उन सब को चुन चुन कर गज़लों का उन्वान कर लियाइन्द्रधनुष की आभाओं में जब जब भी अटका था ये मनतब तब हमने याद कर रखी मन में रात अमावस वालीबुझे हुये दीपक की प्राणों की आहुति को दिया कंठ स्वरदृष्टि लगी उलझाने जिस पल, सजी हुई पूजा की थालीआतुर किसी पपीहे का स्वर हो या टेर मधुर वंसी कीहमने अपने स्वर में इनको बो, वीणा की तान कर लिया 

मन फ़िर से एकाकी

दोपह्री है दिन से रूठीआशाओं की गगरी फूटीपरिवर्तन की बातें झूठींविमुख हो चुकी है प्याले से अब सुधियों की साकीमन फिर से एकाकीजीवन की पुस्तक के पन्नेसे अक्षर लग गये बिगड़नेतम के रंग लगे हैं भरनेफिर लिख पाये ऐसी कोई नहीं लेखनी बाकीमन फ़िर से एकाकीजुड़े तार सारे ही बिखरेरंग पीर के गहरा निखरेहुए सपन सब टूटॆ ठिकरेजेठ किये बैठा बन्दी कर सावन की हर झांकीमन फ़िर से एकाकी

पहने हर संध्या ने मेरे गीतों के गहने

दिन के उजियारे हों चाहे , चाहे रातों के अंधियारे
प्रहर , दिवस हों सप्ताहों से जुड़ कर मिले हुए पखवारे
कोई ऐसा निमिष नहीं था जबकि साथ में उंगली पकडे
चले नहीं हों मेरे संग संग ओ स्वरूपिणे , चित्र तुम्हारे -o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-पहने हर संध्या ने मेरे गीतों के गहनेलौट रहा हो चरवाहा घररुके नीड़ पर आ यायावरसबके अधरों पर आ आ करसहज लगे बहनेपहने हर संध्या ने मेरे गीतों के गहनेहुई प्रतीची अरुणाई मेंजले दीप की अँगड़ाई मेंपछुआई सी पुरबाई मेंलगा धुँआ कहनेपहने हर संध्या ने मेरे गीतों के गहनेरक्त-पीत नदिय के जल मेंबिखरे रजनी के काजल मेंआज बीत बन जाते कल मेंहोते पल तहनेपहने हर संध्या ने मेरे गीतों के गहने