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Showing posts from February, 2012

सांस को चिश्वास की पूँजी

निराशा के समन्दर के सभी तटबन्ध जब टूटॆसपन हर आस की परछाईयों के नैन से रूठेअपरिचित हो गये जब सान्त्वना के शब्द से अक्षरसभी संचय समय के हाथ पल भर में गये लूटे

तभी जाते हुये अस्ताचली को जो किरन लौटीउसी की स्वर्णरेखा ने अगोचर सी डगर सूझी

अंधेरों ने हजारों चक्रव्यूहों को रचा बढ़ करसुनिश्चय सो गया प्रारब्ध कह लड़ते हुये थक करदिशा भ्रम ने लगाये आन कर दहलीज पर पहरेहवायें सोखने जब लग पड़ें हर एक उठता स्वर

तेरे अनुराग से जो बन्ध गयी इक ज्योति की डोरीवही बस दे रही है सांस को चिश्वास की पूँजी

डगर पीने लगे जब पगतली के चिह्न भी सारेअधर की कोर पर आकर टंके जब अश्रु ही खारेनजर क्र सब वितानों में विजन की शून्यता बिखरेनिशायें सोख लें आकाशगंगा के सभी तारे

पलों की तब असहनीयताओं की उमड़ी हुई धारासमुख करती रही है एक छवि बस और न दूजी

लगे गंतव्य अपने आप को जब धुन्ध में खोब्नेदिशाओं के झरोखे जब धुंआसे लग पड़ें होनेक्षितिज का द्वार सीमित हो पगों की उंगलियों पर आदिवाकर भी दुपहरी में अंधेरा लग पड़े बोने

उठी इतिहास पृष्ठों से नये संकल्प की धारागगन पर चित्र रचती है लिये कर आस की कूची

सांझ के पहले दिये से भोर के अंतिम दिये तक

पढ़ चुका दिन धूप के लिक्खे हुए पन्ने गुलाबीहो गई रंगत बदल कर मौसमों की अब उनावीधार नदिया की लगा जम्हाईयाँ लेने लगी हैशाख पर है पत्र की बाकी नहीं हलचल जरा भीयाद की तीली रही सुलगा नई कुछ बातियों कोसांझ के पहले दिये से भोर के अंतिम दिये तकएक पल आ सामने अनुराग रँगता राधिका सादूसरे पल एक इकतारा बजाती है दिवानीरुक्मिणी का नेह ढलता भित्तिचित्रों में उतर करफिर हवायें कह उठी हैं सत्यभामा की कहानीछेड़ता है कोई फिर अनजान सी इक रागिनी कोतोडती   है   जो ह्रदय  के तार बंसी के हिये तकबांधती है पांव को अदृश्य सी जंजीर कोईकोई मन का उत्तरीयम बिन छुये ही खींचता हैएक अकुलाहट उभरने लग पड़े जैसे नसों मेंमुट्ठियों में कोई सहसा ही ह्रदय को भींचता हैदृष्टि की आवारगी को चैन मिल पाता नहीं हैहर जुड़े सम्बन्ध से अनुबन्ध हर इक अनकिये तकझिलमिलाते तारको की अधगिरी परछाईयों मेंघुल संवरते हैं हजारों चित्र पर रहते  अबूझे कसमसाहट सलवटों पर करबटें ले ले निरन्तरचाहती है कोई तो हो एक पल जो बात पूछेखींच लेती हैं अरुण कुछ उंगलियाँ चादर निशा कीवृत्त ही बस शेष रहता रेख के हर जाविये तक

इक कुम्हारन समय की

इक कुम्हारन समय की कहीं गाँव मेंगढ़ रही है दिवस के घड़े चाक पररात मिटटी का लोंदा बना गूंधतीऔर फिर तापती उनको आलाव पर
क्या भरे क्या पता आज के हाथ मेंजो दिवस का घडा सौंप कर वो गईतृप्ति का नीर ला कोई भर जाएगाया मथेगी उसे रश्मियों की रईला जलहरी पे कोई उसे टांक देया बुलाये उसे पनघटों की गलीछाप उसकी बने काल के शीश परया निगल ले उसे सांझ की वावलीकौन जाने कुशल उँगलियों ने रखाकितना विस्तार उसमें गुणा माप करआ गए सांझ के द्वार को छोड़ कररात के पाँव इस और चलते हुएये सुनिश्चित उसी ने किया था सदासाथ दीपक रहें कितने जलते हुएकितनी नीहारिकाएं सपन के कलशभर सकेंगी उमड़ नैन की छाँव मेंभोर के तारकों की बजे पैंजनीजानती है वही कौन से पाँव मेंएक ही है प्रहर रच दिया था जिसेआठ से कर गुना रख दिया ताक पर
जो पथिक चल रहा है दिशा छोड़ करतय करे वह उसे पोटली सौंप देभर के पाथेय गंतव्य की राह काया कि पग बीच में ही कहीं रोक देकिसको मालूम कब क्या गढ़ें उंगलियांउस कुशल शिल्पिनी की मचलती हुईकब सुनहरी करे,  काजरी कब करेएक चादर रही जो  लहरती हुई
बाँटती जा रहीअपने हर शिल्प कोपात्रता के लिये योग्यता आँक कर

दुशाला लग गई बुनने

पते से दूरियां आमंत्रणों की  जब लगीं बढ़नेअपरिचित  हो गए जब सांझ के सब रंग सिन्दूरीनदी की धार  ने निगले जले सब दीप दोनों केउड़ा था आस की हर बूँद का आभास कर्पूरीकिरण तब एक नन्ही सीमेरी अंगनाई में आकरनये संकल्प की फिर से दुशाला लग गई बुनने

बँटी थी धूप टुकड़ों में दिवस की सल्तनत की नितन टिकता छोर पर आ हाथ के कोई परस पल भीसभी फेंके हुए पासे  गिरे थे सामने उलटेअँधेरा हर घड़ी था पास आने की किये जल्दीसितारे चार छः नभ सेउतर कर आ गए सहसामेरे हर मौन की गाथा हुए तन्मय लगे सुनने

हुये थे   पृष्ठ पुस्तक के अचानक आप ही कोरेसिमट कर रह गया वृत्तांत केवल भूमिकाओं मेंकहा जो कुछ गया था  अर्थ के विपरीत था   वह तोरहा जो शेष था ओझल निखरती शून्यताओं मेंलिखे को बांच पाना तो  न हो पाया कभी संभवसुनाई बस कहानी बांसुरी की एक ही धुन ने

अन्धेरा कात कर देते रहें कंदील सब  जलतेस्वयं ही नीड़ आकर हाथ में पाथेय दे जाते  थकन की बेड़ियों से बंध नहीं रुकना हुआ संभवसभी सुर सांत्वना वाले प्रयाणी गीत ही गातेथकन को हो नहीं पायाकभी स्वीकार रुक पानाडगर जब आ स्वयं ही लग गई हो पाँव को चुनने