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Showing posts from January, 2012

एक आवाज़ कुछ गुनगुनाती रही

ढल रही शाम की वीथियों में कहींएक आवाज़ कुछ गुनगुनाती रहीपत्र पर बादलों की पड़ी छाँव सीआपकी याद ले सरसराती रहीधूप अपना दुपट्टा गई छोड़ करजब प्रतीची के घर को चढ़ी पालकीधार नदिया की बस देखती रह गईधूप-रोली बिखरते हुये थाल कीबातियाँ दीप की लग पड़ीं जागनेनींद से, आंख अपनी मसलते  हुयेएक पल के लिये सब ठिठक रुक गयेजितने भी बिम्ब थे राह चलते हुयेआरती के दिये में सजी ज्योत्सनाबस अकेली वहाँ झिलमिलाती रहीरात ने डोरियां चन्द लटकाईं तोघुप अँधेरा सहज ही उतरने लगाकाजरी आँख को श्याम करते हुएरेख में एक, काजल संवरता रहास्वप्न को इसलिये एक टीका लगाताकि उसको कहीं न नजर लग सकेऔर चुपचाप ही याद को ओढ़करमन की एकाकियत में उतर भर सकेराह की शून्यता पास आके नयनझट से छूते हुये दूर जाती रहीउंगलियों से हिनायें बिखर व्योम मेंलिख गईं नाम बस एक ही,चित्र साअंक अपने दिशाओं ने वह भर लियाकौन जाने उन्हें कैसा विश्वास थाछेड़ती रागिनी इक रही जाह्नवीनभ में, अपनी तरंगे उठाते हुयेऔर भरती रही गंध से पांखुरीनीर अपना छलक कर गिराते हुये
कोई सन्देश ले भोर आ जायेगीदृष्टि पथ में नयन थी बिछाती रही

फिर चुनाव की रुत आई

फिर चुनाव की रुत आईरोपे जाने लगे बीज गमलों में फिर आश्वासन केअपने तरकस के तीरों पर धार लगे लेखक रखनेअंधियारी गलियों में उतरी मावस के दिन जुन्हाईबंजरता  को लगे सींचने देव सुधाओं के झरनेचांदी के वर्कों से शोभित हुई देह की परछाईफिर चुनाव की रुत आईबूढ़े बिजली के खम्भों पर आयी सहसा तरुणाईपीली सी बीमार रोशनी ने पाया फिर नवयौवनचलकर आई स्वयं द्वारका आज सुदामा के द्वारेतंदुल के बिन लगा सौंपने दो लोकों को मनमोहनसूखे होठों ने फिर कसमें दो हजार सौ दुहाराईंफिर चुनाव की रुत आईबनी प्याज के छिलकों सी फिर लगी उधड़ने सब परतेंबदलीं जाने लगी मानकों की रह रह कर परिभाषाजन प्रतिनिधि  फिर आज हुए हैं तत्पर और हड़प कर लेंजन निधियों का शेष रह गया संचय जो इक छोटा साहुईं पहाड़ की औकातें भी आज सिमट कर के रायफिर चुनाव की रुत आईलगीं उछलने गेंदें आरोपों की प्रत्यारोपों कीचौके छक्के लगे उड़ाने कवि मंचों से गा गाकरउठे ववंडर नये चाय की प्याली में फिर बिना रुकेअविरल धारा लगा बहाने वादों का गंगासागरधोने लगा दूध रह रह कर फिर चेहरों की   कजराईफिर चुनाव की रुत आई

और करूँ बस बातें तुमसे

मैने कब यह कहा कि मैं हूँ कोई कवि, कविता करता हूँ
या मैं कोई चित्रकार हूँ, रंग चित्र में ला भरता हूँ
मैं तारों की छाया में इक भटक रहा आवारा बादल
उषा की अगवानी करता, मैं पंखुरियों पर झरता हूँ
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आज अचानक ना जाने क्यूँ ऐसा मुझको लगा सुनयने
गीत गज़ल सब लिखना छोड़ूँ, और करूँ बस बातें तुमसे

पूछूँ मुझसे दूर तुम्हारे कैसे कटते हैं दिन रातें
क्या पाखी लेकर आते हैं कुछ सन्देशों की सौगातें
जैसे मेरा मानस पट बस चित्र तुम्हारे दिखलाता है
नयन तुम्हारे भी क्या वैसे देखें चित्रों की बारातें

हवा चली उत्तर से आये दक्षिण से पूरब पश्चिम से
उसकी हर अंगड़ाई मुझको लगता जुड़ी हुई है तुमसे

बुनता लिये कल्पनाओं के धागे मन बासन्ती पल्लव
खड़ी रसोई में चूल्हे पर चाय बनाती होगी तुम जब
अनायास उग गये भाल पर स्वेद कणों को चुम्बित करने
स्वयं कमर में उड़सा पल्लू बाहर आ जाता होगा तब

काफ़ी का प्याला हो कर में या हो चाय दार्जिलिंग वाली
लगता मुझे अनूठेपन का स्वाद मांग लाई हैं तुमसे

आ जाता है ख्याल काम जब करता मैं अपने दफ़्तर में
तब हर अक्षर मुझको लगता लिखा तुम्हारे ही खुश्खत में
क्या तुमने…

संभव नहीं मुझे शतरूपे

संभव नहीं मुझे शतरूपे करुँ विवेचन संदेशों का
बिना शब्द के लिखे हुए हैं जो कि नयन पृष्ठों पे तुमने

शब्दों की अक्षमताओं का भान तुम्हें है, ज्ञात मुझे है 
इसीलिए ही मनभावों को व्यक्त किया रच नव भाषायें 
अपनी हर अनुभूति रंगी है मूक नयन के संप्रेषण में
करती है जीवंत हृदय के पाटल पर अंकित गाथायें

परकोटे की खिंची हुई हर इक रेखा को धूमिल कर के
वक्षस्थल पर लिखा समय के हस्ताक्षर कर कर कर तुमने 

हुए सहज आलोकित जितने भी अभिप्राय मौन स्वर के थे
अनायास हो गया भावनाओं का फ़िर समवेत प्रकाशन 
ज्ञात तुम्हें है, ज्ञात मुझे है, उन अबोल अनमोल क्षणों में
कितनी बार टूट कर बिखरा ओढ़ा हुआ एक अनुशासन 

कहने की है नहीं तनिक भी आवश्यकताएं पर फ़िर भी
कहता हूँ फ़िर से लिख डाला मन पट पर नव आखर तुमने

भाव अंकुरित मीरा वाले दो पल, फ़िर दो पल राधा के 
किन्तु अपेक्षित मुरली वादन मैं असमर्थ रहा करने में 
मैं अविराम निरंतर गतिमय, ठिठका नहीं पंथ में तो फ़िर
कला साधिके ! साथ चली तुम  बन कर धाराएं झरने में

इसी एक पल की परिणति है मैं जिसको स्वीकार कर रहा
अपने नाम लिख लिए मेरे सारे ही निशि-वासर तुमने 

2012

हों दिवस आपके स्वर्ण पत्रों मढ़े और रजनी को रंगती रहे चाँदनी

आपके पंथ को सींचती नित रहे करते छिडकाव आकर घटा सावनी

भोर सारंगियों की धुनों में सजे,सांझ तुलसी के चौरे जला दीप हो

आपके द्वार पर सरगमों को लिए हर घड़ी मुस्कुराती रहे रागिनी



टूट कर आस के फूल पिछले बरस,जो बिखर रह गए फिर से जीवंत हों

आस्था फिर नई दुल्हनों सी सजे,आपके स्वप्न फिर अनलिखे ग्रन्थ हों

ताकते उँगलियों का इशारा रहें आपकी, नभ के नक्षत्र तारे सभी

हर घड़ी आके चूमे सुयश आपको,कीर्ति से आपकी लोक जयवंत हों



स्वप्न फ़िर भी आँज लें हम

दस्तकें देने लगा है द्वार पर नववर्ष साथी

बीज गमलों में लगायें आओ फ़िर से कामना के

जानते परिणति रहेगी,दोपहर में ओस जैसी

स्वप्न फ़िर भी आँज लें हम आँख में संभावना के



आज फ़िर से मैं कहूँ हों स्वप्न सब शिल्पित तुम्हारे

इस बरस खुल जायें सब उपलब्धियों के राज द्वारे

रुत रहे नित खिड़कियों पर धूप की अठखेलियों की

सांझ अवधी हो उगे हर भोर ज्यों गंगा किनारे

दस्तकें दें द्वार पर आ वाक्य नव प्रस्तावना के



घिस गई सुईयां यही बस बात रह रह कर बजाते

थाल में पूजाओं के, टूटे हुये अक्षत सजाते

रंगहीना हो चुकी जो रोलियां, अवशेष उनके

फ़िर भुलावे के लिये ला भाल पर अपने लगाते

मौन हैं घुंघरू, गई थक एक इस नृत्यांगना के



इसलिये इस बार आशा है कहो तुम ही सभी वह

जो कि चाहत के पटल पर चढ़ न पाया, है गया रह

जो अपेक्षित था अभी भी है नहीं आगे रहे जो

वर्ष का नव रूप जिसको जाये कर इस बार तो तय

प्राप्तिफ़ल लिख दो समय के शैल पर आराधना के


३१ दिसम्बर २०११

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