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Showing posts from November, 2012

खुलते तो हैं पृष्ठ

खुलते तो हैं पृष्ठ हवा को छूकर इस मन की पुस्तक के सुधियों वाली जो संध्या की गलियों में टहला  करती है पी जाती है पर आंखों में तिरती हुई धुंध शब्दों को और रिक्तता परछाई बन  कर आंगन में आ तिरती है हो जाती है राह तिरोहित, अनायास ही चलते चलते एक वृत्त में बन्दी बन कर लगता है पग रह जाते हैं अधरों पर रह रह कर जैसे कोई बात लरज जाती है लेकिन समझ नहीं आ पाता उमड़े स्वर क्या कह जाते हैं बिखराने लगता है चढ़ता हुआ अंधेरा स्याही जैसे सपनों की दहलीजों पर बन ओस फ़िसलती है गिरती है और मौन की प्रतिध्वनियां बस देखा करती प्रश्न चिह्न बन जैसे ही तारों से कोई तान बांसुरी की मिलती है भटकन लौट लौट  कर आती है टकराते हुये क्षितिज सेे आकारों के आभासों से जुड़ता नहीं नाम कोई भी दीपक रोज जला कर रखता है दिन ला अपने आले में मुट्ठी में भर रख लेती है उसकी रश्मि सांझ  सोई सी हँसिये का आकार चाँद ले लेता हाथ रात का छूकर सपनों के पौधे उग पाने से पहले ही कट जाते हैं बिखरे हुये विजन की गूँगी आवाज़ों को खोजा  करते अवगुंठित हो इक दूजे में निमिष प्रहर सब घुल जाते हैं

जब कथानक गया इस कथा का लिखा

बनगईंलेखनीरश्मियाँभोरकी
आजलिखनेलगीइकनईफिरकथा
होगयेहैंइकत्तीसपूरेबरस
जबकथानकगयाइसकथाकालिखा अजनबीएकझोंकाहवाकाउड़ा
दोअपरिचितसहजआगयेपासमें
दृष्टिसेदृष्टियोंनेउलझतेहुये
एकदूजेकोबाँधाथाभुजपाशमें
पंथदोथेअलग, एकहोघुलगये
पगबढ़ेएकहीरागिनीमेंबँधे
लक्ष्यकेजितनेअनुमानथेवेसभी
एकहीबिन्दुकोकेन्द्रकरतेसधे एकहीसूत्रहैधड़कनोंजोड़ता
हरसितारागयामुस्कुराकरबता भोरउगतीरहींसांझढलतीरहीं
सांसकेसाथसांसेंलिपटतीरहीं
दोपहरनितनयेआभरणओढ़ती
प्रीतकीधूपपीतीसँवरतीरही
स्वप्नचारोंनयनकेहुयेएकसे
एकहीकामनापरिणतिकीरही
साथमिलकरकेदोआंजुरिएकहो
यज्ञमेंआहुतिसाथदेतीरहीं प्राणदोथेमगरएकहोजुड़

नाम थी आज की सभ्यता लिख गई

इक सड़क के किनारे पे बिखरे पड़े फ़्रेन्च फ़्राई के कन्टेनरों पे छपा नाम थी आज की सभ्यता लिख गई कोशिशें की बहुत,पर नहीं पढ़ सका विश्व पर्यावरण दिन मनाया था कल खूब नारे लगे खूब जलसे हुये रोक लगना जरूरी, न दूषण बढ़े बात उछली हवाओं में चलते हुये रिक्त पानी की बोतल गिरीं पंथ में चिप्स के बैग बन कर पतंगें उड़े हर डगर पर यही चिह्न छोड़ा किये पांव चलते हुये जिस तरफ़ भी मुड़े स्वर उमड़ता हुआ करता उद्घोष था भोर से सांझ बीती,नहीं पर थका एक टुकड़ा हरी घास बाकी रहे एक आँजुरि रहे स्वच्छ जल की कहीं अगली पीढ़ी को देनी विरासत हमें लेवें संकल्प अस्मर्थ हंवे नहीं बस यही सोच ले, कैन थी हाथ में कोक की पेप्सी और स्प्राईट की खाली होते किनारे उछाला उन्हें बात उनके लिये यह सहज राईट थी ध्यान से मैं मनन अध्ययन कर रहा पर समझ आ नहीं पाया ये फ़लसफ़ा दीप तो बाल कर रख लिया शीश पर पर तले का अंधेरा न देखा तनिक दृष्टि दहलीज के बार जब भी गयी अंश था काल का एक ही वह क्षणिक जिस नियम को बनाने का जयघोष था मात्र वे सब रहे दूसरों के लिये उनके आगे कभी आ न दर्पण सका सोच के वे बदलते रहे जाविये दायां कर एक उपदेश की मुद्रिका बायें से खेलते है नि…

दीप दीपावली के जलें इस बरस

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भोर की रश्मियों की प्रखरता लिये दीप दीपावली के जलें इस बरस
रक्त-कमलासनी के करों से झरे,आप आशीष का पायें पारस परस
ऋद्धि सिद्धि की अनुकूल हों दृष्टियाँ साथ झंकारती एक वीणा रहे
भावनाओं में अपनत्व उगता रहे, क्यारियाँ ज़िन्दगी की रहें सब सरस



जले हैं फिर से इस बरस हजार कामना लिए नवीन वर्तिकाओं से सजे हुए नए दिए नए ही स्वप्न आँजती है आँख फिर से इस बरस  जो अंकुरित हो आस वो बरस के अंत तक जिए

रची पुरबि के द्वार पर नवीन आज कल्पना  न अब रहे ह्रदय कहीं पे   कोई भी हो अनमना  उगे जो भोर निश्चयों के साथ यात्राओं के  डगर के साथ अंश हों नवीन वार्ताओं के  न व्यस्तता की चादरों से दूर एक पल रहे  औ' आज ही भविष्य हो गया है आन कल कहे  न नीड़  के निमंत्रणों से एक पल कोई छले  औ लक्ष्य पग के साथ अपने पग मिला मिला चले

हैं मंत्रपूर सप्तानीर आंजुरी में भर लिए जले हैं फिर से इस बरस हजार कामना लिए

जो कामनाएँ हैं मेरी, वही रहें हों आपकी  ये डोरियाँ जुड़ी रहें सदा हमारे साथ की  न मैं में तुम में भेद हो,जो तुम कहो वो मैं कहूं  तुम्हारी भावना प्रत्येक साथ साथ मैं सहूँ  यों  तुम से मैं जुडू  कि  भेद बीच आप का हेट  बढ़…

सब कुछ ठीक ठाक है

सांझ अटक कर चौराहे पर पीती रही धुंआ ज़हरीला बूढ़े  अम्बर का जर्जर तन हुआ आज कुछ ज्यादा पीला पीर पिघल कर बही नयन से घायल हुई घटाओं की यों पगडंडी का राज पथों का सब ही का तन मन है गीला बान्धे रहा राजहठ लेकिन पट्टी अपने खुले नयन पर कहते हुये चिह्न उन्नति के हैं ये, सब कुछ ठीक ठाक है मौसम की करवट ने बदले दिन सब गर्मी के  सर्दी के बसा  लिया है सावन ने अब अपना घर सूने मरुथल में सिन्धु तीर पर आ सो जातीं हिम आलय से चली हवायें नीलकंठ का गला छोड़कर भरा हलाहल गंगा जल में निहित स्वार्थ के आभूषण   से शोभित प्रतिमा के आराधक ढूँढ़ा करते दोष दृष्टि में, कहते दर्पण यहाँ साफ़ है कर बैठी अधिकार तुलसियों के गमलों पर विष की बेलें खेतों में उगती फ़सलों की अधिकारी हैं अमरलतायें भूमिपुत्र मां के आंचक्ल को हो होकर व्याकुल टटोलते प्राप्त किन्तु हो पातीं केवल उसको उलझी हुई व्यथायें जिनका है दायित्व सभी वे हाथ झाड़ अपने कह देते जो पीड़ित है उसे जनम का पिछले कोई मिला श्राप है धरा  टेरती जिसको वो ही इन्द्रसभा में जाकर बैठे दृष्टिकिरण घाटी में आती नहीं जहां से कभी उतर कर गंधर्वों के गान अप्सराओं  की किंकिणियों के स्वर में क…