पता नहीं कल भोर

प्राची के पीताम्बर पर कुछ अरुणिम आभाओं के छींटे
प्रहरी बन कर खड़े हुये दो बादल के टुकडे कजरारे
श्याम प्रतीची नीले रंग की एक बुहारी लेकर कर में
दिन की अगवानी को आतुर,अंगनाई को और बुहारे
 
कितनी खुले अवनिका अम्बर की खिड़की से पता नहीं कल
चित्र आज के इसीलिये मैं, सोच रहा नयनों में भर लूं
 
द्वार नीड़ के खोल देखता एक विहग फैले वितान को
पाटल पर बूंदों के दर्पण में अलसाई सी परछाई
रहे लड़खड़ाते कदमों से कलियों के बिस्तर से उठ कर
आँखें मलते हुये गंध के एक झकोरे की अंगडाई
 
करे धूप का चाबुक गतियाँ द्रुत इस ठहरे हुये समय की
इससे पहले इन्हें तूलिका अपनी लेकर चित्रित कर लूं
 
पलक मिचमिचाती पगडंडी औऔर उठाकरश्यामल चूनर
अथक बटोही के आने की लेकर आशायें फ़ैलाये
घंटे शंख अजानों के स्वर में घुलते मंत्रोच्चार को
तट नदिया का अपनी लहरों के गुंजन से और सजाये
 
कोपभवन की ओर बढ़ रहा मौसम कुपित रहे कल कितना
पता नहीं इसलिये आज ही इसे याद में अंकित कर लूँ

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कल का भोर, छोर है दूजा,
वर्तमान की विधिवित पूजा।

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