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Showing posts from September, 2012

रचें नयन में आ राँगोली

दीवाली के जले दियों की किरन किरन में तुम प्रतिबिम्बित रंग तुम्हारी अँगड़ाई से पाकर के सजती है होली
तुम तो तुम हो तुलनाओं के लिये नहीं है कुछ भी संभव कचनारों में चैरी फूलों में, चम्पा में आभा तुमसे घटा साँवरी,पल सिन्दूरी, खिली धूप का उजियारापन अपना भाग्य सराहा करते पाकर के छायायें तुमसे उगे दिवस की वाणी हो या हो थक कर बैठी पगडंडी जब भी बोली शब्द कोई तो नाम तुम्हारा ही बस बोली फ़िसली हुई पान के पत्तों की नोकों से जल की बूँदें करती हैं जिस पल प्रतिमा के चरणों का जाकर प्रक्षालन उस पल मन की साधें सहसा घुल जाया करतीं रोली में और भावनायें हो जातीं कल्पित तुमको कर के चन्दन अविश्वास का पल हो चाहे या दृढ़ गहरी हुई आस्था अर्पित तुमको भरी आँजुरी, करे अपेक्षा रीती झोली
आवश्क यह नहीं सदा ही खिलें डालियों पर गुलमोहर आवश्यक यह नहीं हवा के झोंके सदा गंध ही लाये यह भी निश्चित नहीं साधना पा जाये हर बार अभीप्सित यह भी तय कब रहा अधर पर गीत प्रीत के ही आ पाय लेकिन इतना तय है प्रियतम, जब भी रजनी थपके पलकें तब तब स्वप्न तुम्हारे ही बस रचें नयन में आ राँगोली

आप-एक बार फिर

नैन की वीथियों में संवरता रहा हर निशा में वही सात रंगी सपन छू गई थी जिसे आपकी दृष्टि की एक दिन जगमगाती सुनहरी किरण आगतों के पलों में घुले हैं हुये पल विगत के रहे जो निकट आपके आपकी ही छवी से लगा जुड़ गई ज़िंदगी की मेरी ये चिरंतर लगन धूप जब भी खिली याद आने लगा आपकी ओढ़नी का मुझे वो सिरा गुलमुहर की लिए रंगतें,गंध बन जो मलय की सदा वाटिका में तिरा कोर की फुन्दानियों से छिटकती हुई जगमगाहट दिवस को सजाती हुई शीश के स्पर्श से ले मुदित प्रेरणा, व्योम में सावनी मेघ आकर घिरा

आप-एक और चित्र

व्योम के पत्र पर चाँदनी की किरन, रात भर एक जो नाम लिखती रही वर्तनी से उसी की पिघलते हुये, पाटलों पर सुधा थी बरसती रही चाँद छूकर उसे और उजला हुआ, रोशनी भी सितारों की बढ़ने लगी आपका नाम था, छू पवन झालरी गंध बन वाटिका में विचरती रही बादलों ने उमड़ते हुये लिख दिया ,व्योम पर से जिसे बूँद में ढाल कर टाँकती है जिसे गंध पीकर हवा, मन के लहरा रहे श्वेत रूमाल पर एक सतरंग धनु की प्रत्यंचा बना जो दिशाओं पे संधान करता रहा आपका नाम है जगमगाता हुआ नित्य अंकित हुआ है दिवस भाल पर

आप--सितम्बर

ट्रेन की सीट पर थे बिखर कर पड़े,कल के अखबार की सुर्खियों में छिपा शब्द हर एक था कर रहा मंत्रणा,इसलिये नाम बस आपका ही दिखा जो समाचार थे वे सभी आपकी गुनगुनाती हुई मुस्कुराहट भरे और विज्ञापनों में सजा चित्र जो वो मुझे एक बस आपका ही लगा शोर ट्रेफ़िक का सारा पिघलते हुये, यूँ लगा ढल गया एक ही नाम में भोर आफ़िस को जाते हुये थी लगा,और यूँ ही लगा लौटते शाम में पट्ट चौरास्तों पर लगे थे हुये, चित्र जिनमें बने थे कई रंग के चित्र सारे मुझे आपके ही लगे, मन रँगा यूँ रहा आपके ध्यान में