पर घटा कोई भी द्वार आई नहीं

आके सावन गली से गुजरता रहा
पर घटा कोई भी द्वार आई नहीं
 
धूप ने जिन पथों को प्रकाशित किया
वे सदा दूर मेरे पगों से रहे
कोई ऐसी किरण ना मिली आज तक
एक पल के लिये बाँह आकर गहे
एक टूटे सितारे की किस्मत लिये
व्योम की शून्यता में विचरता रहा
और मौसम की सूखी हुई डाल से
नित्य दिनमान पत्ते सा झरता रहा
 
एक मुट्ठी खुली,आँजुरी ना बनी
नीर की बूँद हाथों में आई नहीं
 
इक मयुरी करुण टेर उठती हुई
तीर नदिया के आ लड़खड़ाती रही
प्यास चातक की उलझी हुई कंठ से
आई बाहर नहीं, छटपटाती रही
पी कहां स्वर भटकता हुआ खो गया
फ़िर ना लौटाई कोई क्षितिज ने नजर
ठोकरें खाते,गिरते संभलते हुये
क्रम में बँध रह गया ज़िन्दगी का सफ़र.
 
तार झंकारते थक गईं उंगलियां
एक पाजेब पर झनझनाई नहीं
 
आईना बिम्ब कोई ना दिखला सका
दूर परछाईयाँ देह से हो गईं
अजनबी गंध की झालरें टाँक कर
रिक्त इक पालकी ही हवा ढो गई
एक रेखा दिशाओं में ढलती रही
एक ही वृत्त के व्यास को बांध कर
रात ठगिनी हुई साथ में ले गईं
नींद की गठरियाँ पीठ पर लाद कर
 
दूर जाते हुये रोशनी कह गई
सांझ तक की शपथ थी उठाई नहीं

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