छंद गीतों के संवरते हैं नहीं अब सुर में

छंद गीतों के संवरते हैं नहीं अब सुर में
कोई मिसरा-ए-ग़ज़ल होंठ पे नहीं आता
आपका मुझसे तकाजा कि नया गीत रचूं
शब्द गूंगे हैं हुए गाता अगर क्या गाता
 
खँडहर होती मुंडेरों पे चढ़े बैठे जो
देखते जो हैं नहीं किरणें उभरते दिन की
अपनी मुरझाई हुई सोच में उलझे उलझे
सोचते ज़िन्दगी मोहताज है उनके ऋण की
उनके कहने पे दिवस उगता है रातें ढलती
कौम के होके खुदा गफलतों में रहते हैं
अपने कमरे से परे झाँक नहीं देखा कभी
कान को अच्छी लगे बात वही सुनते हैं
 
कब्र में पांव मगर छोड़ते नहीं कुर्सी
कितना लालच है समझ में ये नहीं आ पाता
आपका मुझसे तकाजा कि नया गीत रचूं
शब्द गूंगे हैं हुए कुछ भी कहा न जाता
 
वक्त बदला न बदल पाए नजर के भ्रम पर
अपने दर्पण में ही देखा हैं किये अपने को
मरुथली हिरना के सांचे में ढले बैठे हैं
मान कर एक हकीकत बिखरते सपने को
चीरते मानवियत आज भी शमशीरों से
रक्त की प्यास नहीं बुझती वरस बीत गये
उनके साये में धुली साँस आंसुओं में सदा
आंख के घट भी लगे अब तो सभी रीत गये
 
एक चादर को चढ़ाये हैं रखे करघे पर
सूत पर एक भी बालिश्त भर नहीं काता
आपका मुझसे तकाजा कि नया गीत रचूं
शब्द गूंगे हैं हुए कुछ भी कहा न जाता
 
अब न बादल में छुपा रहने सकेगा सूरज
एक ही रश्मि हटा देती अंधेरा गहरा
एक चिंगारी भड़कती है बने दावानल
बाढ़ का पानी कहां एक जगह पर ठहरा
कोई घर हो कि सल्तनत हो या कोई शासन
रेत की नींव पे टिक पाता नहीं देर तलक
बीज को रोक सका कौन कभी उगने से
स्वप्न से सत्य की दूरी है महज एक पलक
 
उग रही धूप ने झाड़ू से बुहारा उनको
जोड़ बैठे हुए थे जो कि तिमिर से नाता
अब तो गीतों को संवरना है स्वयं होठों पर
जिनका पा पा के पर्स सत्य हर उभर आता

Comments

शब्द आज भी घर घर अपना अर्थ ढूढ़ते फिरते हैं,
काश उन्हें भी संवेदन मन, अपना जैसा समझ सके।
कल 02/07/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!
एक चादर को चढ़ाये हैं रखे करघे पर
सूत पर एक भी बालिश्त भर नहीं काता
आपका मुझसे तकाजा कि नया गीत रचूं
शब्द गूंगे हैं हुए कुछ भी कहा न जाता

बहुत बढ़िया.... वाह!
सादर।
aisee rachnao ko padh kar bas yahin kahunga ki jaruri nahi bahut behtreen rachnakaro ko comments mil hi jayen...!!
bahut behtareen likhte hain sir aap:)

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