Monday, April 02, 2012

तुमसे दूर कटे कैसे दिन

तुमसे दूर कटे कैसे दिन तुमने पूछा बतलाता हूं
मन की बात उमड़ आती है जिन शब्दों को मैं गाता हूँ
 
झात तुम्हें मैने असत्य का थामा नहीं हाथ पल भर भी
किन्तु सत्य की अप्रियता पर अक्सर गया आवरण डाला
कह देता हूँ शान्तिमयी हूँ सकुशल कटते हैं दिन रातें
मन को भावों को ओढ़ाये रहा मौन की मैं दोशाला
 
केवल शब्दों का आडम्बर है यह भी तो ज्ञात मुझे है
गीत गज़ल के सांचे में मैं, जिन शब्दों को बुन गाता हूँ
 
कुछ बातों का अधरों पर आ पाना रहा असम्भव प्रियतम
और संकुचित सीमाओं में रही बँधी अनुभूति सदा ही
मन के जुड़े हुये तारों में आलोड़न से कहाँ अपरिचित
चाहे तुम स्वीकार न कर पाओ इसको मेरे अनुरागी
 
विषम परिस्थितियों में रहता चित्रलिखित होकर मेरा मन
सत्य यही है आज पूछते हो तुम तो मैं दोहराता हूँ
 
तुमने पूछा तो उग आये अनगिन प्रश्न अचानक मन में
तुम्हें किस तरह रही अपरिचित तुमसे दूर दशा क्या मेरी
दिन की बिछी हुई चादरिया कितनी है विस्तृत हो जाती
बिना सिरे के कितनी लम्बी हो जाती है रात अँधेरी
 
 
यद्यपि हुआ प्रकाशन दुष्कर मन की गहराई का प्रियतम
फिर भी उन्हें शब्द देने की कोशिश मैं करता जाता हूँ.

2 comments:

Shardula said...

अद्भुत रूप से भावपूर्ण गीत है आज का!
गीत की अंतिम पंक्तियों में कितने सुन्दर रूपक दिए हैं आपने!
"दिन की बिछी हुई चादरिया कितनी है विस्तृत हो जाती
बिना सिरे के कितनी लम्बी हो जाती है रात अँधेरी "
जानते हैं क्या याद आ गया इससे -- आपकी ही पंक्तियाँ--" ज़िंदगी है रेशमी साड़ी जड़ी एक चौखटे में, बुनकरों का ध्यान जिससे एकदम ही उठ गया है! पीर के अनुभव सभी है बस अधूरी बूटियों से, रूठ कर जिनसे कशीदे का सिरा हर कट गया है " (वो गीत मुझे अतिप्रिय है!)
पर आपकी कलम होते ये तो संभव नहीं कि पीर के अनुभव यथावत गाए न जाएं...आप एक कुशल बुनकर की तरह, एक पात्र उठाते हैं, उसके जीवन के धागे, मन के तार, अपने हाथ में लेते हैं और यूँ गीत बुन देते हैं उसके चारों ओर कि पाठक को क्या सत्य है क्या कथा है ये अहसास ही नहीं हो पाता!
सो बाबा नागार्जुन की तरह कहना पड़ता है : "कालिदास सच सच बतलाना" !

आज के गीत में उभरी अंतर्मन की उदासी जैसे पाठक को अपने साथ गहरी व्यथा में ले डूबने वाली हो, पर आस के तिनके की तरह एक ये पंक्ति लिख दी है आपने: 'तुम्हें किस तरह रही अपिरिचित..."

झात तुम्हें मैने असत्य का थामा नहीं हाथ पल भर भी --- यहाँ 'ज्ञात' ठीक कर लीजियेगा.
किन्तु सत्य की अप्रियता पर अक्सर गया आवरण डाला --- डल सका होगा क्या?
कह देता हूँ शान्तिमयी हूँ सकुशल कटते हैं दिन रातें
मन को भावों को ओढ़ाये रहा मौन की मैं दोशाला--- बहुत सुन्दर और व्यवहारिक बंद!

मन के जुड़े हुये तारों में आलोड़न से कहाँ अपरिचित --- ये केंद्र है इस कविता का. अतिसुन्दर!
चाहे तुम स्वीकार न कर पाओ इसको मेरे अनुरागी --- विश्वास भी, अविश्वास भी ? :)

विषम परिस्थितियों में रहता चित्रलिखित होकर मेरा मन -- ओह!

तुम्हें किस तरह रही अपरिचित तुमसे दूर दशा क्या मेरी--- ये उल्हाना! :)
नमन स्वीकारें!
सादर शार्दुला

प्रवीण पाण्डेय said...

विरह का भाव गाढ़ा होता है, उसमें स्याही रुक रुक कर चलती है।