Monday, March 26, 2012

अब गली के मोड़ पर है

कल्पवृक्षों के सुमन कुछ आन झोली में गिरे हैं
आ मरुस्थल पर लगा ज्यों सावनी बादल घिरे हैं
देवसलिला की लहर आईं उमड़ कर वीथियों में
नयन झीलों में सपन सतरंगिया होकर तिरे हैं
 
एक झोंका गंध का पट खोलकर वातायनों के
कह गया है रथ तुम्हारा अब गली के मोड़ पर है
 
लग पड़ी छँटने घिरी थी कक्ष में गहरी उदासी
सांझ की अंगड़ाईयों में लग पड़ी घुलने विभा सी
रश्मि की पाजेब बांधे नृत्यमग्ना हो प्रतीची
हो गई है पुष्पधन्वा के शरों की कामना सी
 
आतुरा होते नयन की दृष्टि को संगम अपेक्षित
ज्ञात है बस झपझपाती सी पलक की कोर पर है
 
सांस में सारंगियों के सुर लगे आकर विचरने
धड़कनों की आस में लगने लगा विश्वास भरने
श्वेत पाटल पर कुसुम के चन्द बासन्ती पराकण
लग पड़े हैं चित्र में अनुराग के नव रंग भरने
 
रह गया बँध कर कलाई से दिवस की शाख पर जो
वह निराशा का प्रहर अब उंगलियों की पोर पर है
 
दृष्टि बन रेखायें रह रह भित्तिचित्रों को निहारें
थाल में अगवानियों के पुष्प की गंधें निखारें
ध्यान की नारद सरीखी भ्रामरी को कर नियंत्रित
मन निलय सज्जाओं की बारीकियां फ़िर फ़िर संवारे
 
बांसुरी की टेर पर पाजेब की रुनझुन बिखरना
एक स्मितमय अधर के बस थरथराते छोर पर है

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

बांसुरी की टेर पर पाजेब की रुनझुन बिखरना
एक स्मितमय अधर के बस थरथराते छोर पर है

अद्भुत बिम्ब..

Shardula said...

ऐसा श्रृंगार गीत जो शायद नायक और नायिका दोनों के मुख से हूबहू निकल सकता है क्योंकि सारे बिम्ब कुशलता से ऐसे लिखें हैं कि ये सुनिश्चित नहीं कि ये गीत कौन गा रहा है!
ये आपकी कुशलता और चीटिंग दोनों है:) ...मन में चित्र बनने में सब गुडमुड हो रहा है! :)

एक झोंका गंध का पट खोलकर वातायनों के --- इसका अनायास, अपने आप हो जाने वाला भाव बहुत ही सुन्दर और सत्य भी!
कह गया है रथ तुम्हारा अब गली के मोड़ पर है --- ये स्टेज सेट करतीं हुईं पक्तियां आगे आने वाली सारी मधुर और सुगन्धित पंक्तियों के लिए!

रश्मि की पाजेब बांधे नृत्यमग्ना हो प्रतीची--- प्रतीची के जितने चित्र आपकी कविता में देखती हूँ उतने केवल आकाश के हृदय में ही होंगे!

आतुरा होते नयन की दृष्टि को संगम अपेक्षित --- बहुत ही सुन्दर तरह से लिखी हुई पंक्तियाँ.
ज्ञात है बस झपझपाती सी पलक की कोर पर है --- अहा!

श्वेत पाटल पर कुसुम के चन्द बासन्ती पराकण --- ये अतिसुन्दर!

रह गया बँध कर कलाई से दिवस की शाख पर जो
वह निराशा का प्रहर अब उंगलियों की पोर पर है --- बहुत ही सुन्दर कल्पना! जैसे लो अब विसर्जित हुई जाती हो निराशा...बस एक पल और!

ध्यान की नारद सरीखी भ्रामरी को कर नियंत्रित --- बाबा रे! भ्रामरी प्राणायाम :) आप ही ऐसे बिम्ब डाल सकते हैं गीतों में कविराज!
मन निलय सज्जाओं की बारीकियां फ़िर फ़िर संवारे --- ये गलत बात! एकदम "चौथ के चंदा..." वाली पंक्तियों जैसी बात कर दी आपने! ये हमारी पंक्तियाँ हैं, इन्हें हम कवयित्रियों से न छीनिए :)

बांसुरी की टेर पर पाजेब की रुनझुन बिखरना
एक स्मितमय अधर के बस थरथराते छोर पर है --- अद्भुत! क्या कहूँ :)
मन को ख़ुशी और सकारात्मकता से भर देने वाला गीत!
जय हो!
सादर शार्दुला