गज़लों का उन्वान कर लिया


हमको जब सुकरात समझ कर दिया भेंट में गरल किसी ने
हमने खुद को नीलकंठ तब कर कर उसका पान कर लिया
 
आवश्यकता नहीं अगर तो नहीं अपेक्षायें हीं  होती
जिसका जितना संचय, उसकी उतनी बढ़ीं लालसायें भी
भोर गिनतियों की सीढ़ी पर चढ़ते चढ़ते विलय हो गयी
और दिवस की गुत्थी में ही रहीं उलझ कर संध्यायें भी
 
युग तो देता रहा निरन्तर अवसर राजमुकुट को थामे
लेकिन वह आसीन कहाँ रह्ता जिसने अभिमान कर लिया
 
दृष्टि सितारों पर रख कर जब चलते रहे पांव गतिमय हो
तब तब अपने पग के चिह्नों का भी हमने किया आकलन
भाव अगर इक तन कर मन में खड़ा हो गया ताड़ सरीखा
तब तब हमने देखा अपनी परछाईं का सहज समर्पण
 
ठोकर खा गिर पड़े शब्द जो रहे पंथ में अनदेखे ही
हमने उन सब को चुन चुन कर गज़लों का उन्वान कर लिया
 
इन्द्रधनुष की आभाओं में जब जब भी अटका था ये मन
तब तब हमने याद कर रखी मन में रात अमावस वाली
बुझे हुये दीपक की प्राणों की आहुति को दिया कंठ स्वर
दृष्टि लगी उलझाने जिस पल, सजी हुई पूजा की थाली
 
आतुर किसी पपीहे का स्वर हो या टेर मधुर वंसी की
हमने अपने स्वर में इनको बो, वीणा की तान कर लिया 

Comments

Shardula said…
"उठी इतिहास पृष्ठों से नये संकल्प की धारा
गगन पर चित्र रचती है लिये कर आस की कूची"
याद है न !
अद्भुत वृत्तचित्र खींचा है आपने।
Udan Tashtari said…
ठोकर खा गिर पड़े शब्द जो रहे पंथ में अनदेखे ही
हमने उन सब को चुन चुन कर गज़लों का उन्वान कर लिया


-अद्भुत...

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