दुशाला लग गई बुनने


पते से दूरियां आमंत्रणों की  जब लगीं बढ़ने
अपरिचित  हो गए जब सांझ के सब रंग सिन्दूरी
नदी की धार  ने निगले जले सब दीप दोनों के
उड़ा था आस की हर बूँद का आभास कर्पूरी
किरण तब एक नन्ही सी
मेरी अंगनाई में आकर
नये संकल्प की फिर से दुशाला लग गई बुनने

बँटी थी धूप टुकड़ों में दिवस की सल्तनत की नित
न टिकता छोर पर आ हाथ के कोई परस पल भी
सभी फेंके हुए पासे  गिरे थे सामने उलटे
अँधेरा हर घड़ी था पास आने की किये जल्दी
सितारे चार छः नभ से
उतर कर आ गए सहसा
मेरे हर मौन की गाथा हुए तन्मय लगे सुनने

हुये थे   पृष्ठ पुस्तक के अचानक आप ही कोरे
सिमट कर रह गया वृत्तांत केवल भूमिकाओं में
कहा जो कुछ गया था  अर्थ के विपरीत था   वह तो
रहा जो शेष था ओझल निखरती शून्यताओं में
लिखे को बांच पाना तो  
न हो पाया कभी संभव
सुनाई बस कहानी बांसुरी की एक ही धुन ने

अन्धेरा कात कर देते रहें कंदील सब  जलते
स्वयं ही नीड़ आकर हाथ में पाथेय दे जाते  
थकन की बेड़ियों से बंध नहीं रुकना हुआ संभव
सभी सुर सांत्वना वाले प्रयाणी गीत ही गाते
थकन को हो नहीं पाया
कभी स्वीकार रुक पाना
डगर जब आ स्वयं ही लग गई हो पाँव को चुनने

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

हर दिन, हर पल, एक नयी पहल..

Anonymous said...

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Shardula said...

बहुत सुन्दर!
पहले भाव में डूब के उबर जाऊं फ़िर लिखूंगी... सादर शार

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नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...