Monday, January 23, 2012

फिर चुनाव की रुत आई


फिर चुनाव की रुत आई
 
रोपे जाने लगे बीज गमलों में फिर आश्वासन के
अपने तरकस के तीरों पर धार लगे लेखक रखने
अंधियारी गलियों में उतरी मावस के दिन जुन्हाई
बंजरता  को लगे सींचने देव सुधाओं के झरने
चांदी के वर्कों से शोभित हुई देह की परछाई
फिर चुनाव की रुत आई
 
बूढ़े बिजली के खम्भों पर आयी सहसा तरुणाई
पीली सी बीमार रोशनी ने पाया फिर नवयौवन
चलकर आई स्वयं द्वारका आज सुदामा के द्वारे
तंदुल के बिन लगा सौंपने दो लोकों को मनमोहन
सूखे होठों ने फिर कसमें दो हजार सौ दुहाराईं
फिर चुनाव की रुत आई
 
बनी प्याज के छिलकों सी फिर लगी उधड़ने सब परतें
बदलीं जाने लगी मानकों की रह रह कर परिभाषा
जन प्रतिनिधि  फिर आज हुए हैं तत्पर और हड़प कर लें
जन निधियों का शेष रह गया संचय जो इक छोटा सा
हुईं पहाड़ की औकातें भी आज सिमट कर के राय
फिर चुनाव की रुत आई
 
लगीं उछलने गेंदें आरोपों की प्रत्यारोपों की
चौके छक्के लगे उड़ाने कवि मंचों से गा गाकर
उठे ववंडर नये चाय की प्याली में फिर बिना रुके
अविरल धारा लगा बहाने वादों का गंगासागर
धोने लगा दूध रह रह कर फिर चेहरों की   कजराई
फिर चुनाव की रुत आई
 

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

न ठंडी, न गर्म, बस सम्मोहन की रितु..

ATAMPRAKASHKUMAR said...

"फिर चुनाव की रुत आई " आप का यह गीत वास्तविकता से भरपूर है |बड़ी सहजता से आप ने अपनी बात प्रस्थापित की है |साधुवाद |
श्रीमान जी मैं आप को अपने ब्लॉग पर सादर आमंत्रित करता हूँ |http//kumar2291937.blogspot.com मेरी ग़ज़लों पर आप की टिपणी अवश्य देने का कष्ट करें |धयवाद

Shardula said...

सोमवार को इस ब्लॉग पे कुछ नया न हो ऐसा शायद कभी भी नहीं हुआ है.
आज आपने 'गीतकार की कलम' पे दोसौवां गीत लिखा है पर यहाँ भी कुछ तो होना ही चाहिए:)
आपकी ही दो पंक्तियाँ लिख रही हूँ:
"मुख मंडल पर बिखराकर कुछ मुस्कानें इक कविता पढ़िए
आगत के कुछ नये छंद की नई-नई संरचना करिए
"
सादर