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Showing posts from 2012

इक नया पृष्ठ खुलने लगा

यह समय के वृहद ग्रन्थ का आज फिर इक नया पृष्ठ खुलने लगा बांच लें रिक्त जो रह गया शब्द के मध्य में कामनाएं सजा कर उसे आँक लें आओ हम तुम नया आज संकल्प लें सिसकियाँ सब बनें बांसुरी की धुनें कंटकों से सजे पंथ जितने रहे वे सभी फूल की पांखुरी से बनें शुष्क हो रह गए नैन की वीथी में स्वप्न की पौध फिर से करें अंकुरित पल जो डगमग हुए वर्ष में बीतते आओ उनको करें हम पुन: संतुलित अपनी कोशिश बनाए उसे आईना हाथ में जो भी टूटा हुआ कांच लें स्वप्न की बेल जो भी उगाये निशा तय रहे उसको अवलम्ब पूरा मिले साधना का दिया जो जले सांझ में साथ दे आरती और पूजा चले आस्था और विश्वास के अर्थ को आज फिर से दिलों में सँजीवित करें जो तिमिर से ढका रह गया अब तलक इस नये वर्ष में आओ दीपित करें जो भी निर्णय बने वह सुनिश्चित रहे हम प्रकाशन से पहले उसे जाँच लें वर्ष पर वर्ष अब तक रहे बीतते दूरियाँ तुम से मैं की नहीं मिट सकीं आओ हम बीज हम के करें अंकुरित तो रहें द्वार उपलब्धियाँ आ सजी जो अपेक्षित रहे वह हमारा रहे एक का दूसरा बन के पूरक रहे भोर की लालिमा ले सजा थाल को द्वार अभिषेक आ नित्य सूरज करे सुख बढ़े,शान्ति समृद…

और अपने आप को कब तक छलेगा यूँ प्रवासी

आज फ़िर से खो गया प्रतिबिम्ब की परछाईं में मन और धुंधली हो गई नभ में बिखरती चन्द्रिका भी शून्य तक जाती हुई पगडांडियों पर पांव धरते और अपने आप को कब तक छलेगा यूँ प्रवासी हो चुकी हैं वे अपरिचित थी जड़ें जिन क्यारियों में फूल बनते ही हवाओं ने सभी पाटल उड़ाये गंध की आवारगी जिन वीथियों में घूमती थी द्वार उनके जानता है दूर तक थे याद आये खोलने में आज है असमर्थ पन्ने स्पन्दनों के उड़ चुकी हैं रंगतें अब हाथ से सँवरी हिना की जानता इस पंथ मेम मुड़ देखना पीछे मना है राह में डाले तिलिस्मों ने निरन्तर जाल अपने मूर्तियो मे  ढल गये कितने पथिक अब तक डगर में लग रही हैं गिनतियां भी गिनतियां कर आज थकने

लौट कर आता नहीं इस सिन्धु में नाविक पलट कर थाम कर झंझायें ले जाती रहीं उसको सदा ही खटखटाते द्वार क्षितिजों के तुझे हासिल हुआ क्या कांच के टुकड़े मरुस्थल के लिये भ्रम दूर तक हैं खिलखिलाहट की सभी शाखाओं पर पतझर रुके हैं बोध देने को दिशाओं का तुझे बस सूर अब हैं उग रही है कंटकों सी प्यास रह रह कर अधर पर सोख बैठी शुष्कियाँ इस बार सब नमियाँ हवा की

अनुभूतियाँ मिलती नहीं हैं

दोपहर से आँख मलता है दिवस लेते उवासी सांझ हो पाती नहीं है और थक कर बैठ जाता सीढ़ियों पर पांव रखता है अधर की सकपकाते इसलिये ही शब्द छूता ना स्वरों को,लड़खड़ाता वृत्त में चलती हुई सुईयाँ घड़ी की - ज़िन्दगी है केन्द्र से जो बँध न रहलें,खूँटियाँ मिलती नहीं हैं आस सूनी मांग ले पल के निधन पर छटपटाती कामना की झोलियाँ फिर कल्पना के द्वार फ़ैला फिर वही गतिक्रम,विखंडित स्वप्न कर देता संजोये और टँगता कक्ष की दीवार पर फिर चित्र पहला है वही इक पीर,घटनाक्रम वही, आंसू वही हैं और अब नूतन कहीं अनुभूतियाँ मिलती नहीं हैं होलियाँ, दीवालियाँ  एकादशी और’ पूर्णिमायें कौन कब आती नजर के दूर रह कर बीत जाती सावनी मल्हार फ़ागुन की खनकती  थाप ढूँढ़े कोई भी पुरबा ई मिल पाती नहीं है गुनगुनाती द्वार के दोनों तरफ़ हैं पृष्ठ कोरे भीतियों के रँग सकं उनमें कथानक,बूटियाँ मिलती नहीं है

रंग जितने फ़िसल तूलिका से गिरे

स्वप्न की वीथियों में उगे फूल बन रंग जितने फ़िसल तूलिका से गिरे फिर अवनिका-पटल चित्र करने लगा बिम्ब बनते हुये जब गगन से झरे
कोई सूरजमुखी में बदल रह गया कोई करने लगा भोर पीताम्बरी पोर पर आ कोई हल्दिया बन गया कोई पुरबाईयाँ कर गया केसरी हँस पड़ा कोई भुजपाश ले गुलमुहर  कोई कचनार सा खिलखिलाने लगा और थामे हुये रश्मियाँ धूप की कोई आ झील पर झिलमिलाने लगा
बाँह  मौसम ने फ़ैलाई जितनी अधिक दृश्य आ आके उतने ही उनमें भरे
वाखरों पर नयन की खड़े ओढ़ ला मौसमों की गली से नये आवरण सावनी एक मल्हार पहने हुये फिर कली पर बुने कुछ नये आभरण तीर नदिया के जलते हुये दीप की वर्तिका की तरह नृत्य करते हुये झोलियों में संजोये हुये बिम्ब को चित्र दहलीज पर कर के रखते हुये
नभ सलिल से जो रजताभ कण चुन लिये वाटिकाओं की ला वीथियों में धरे
वेणियों पर उतर आ गये रूप की मोतियों में गुँथे,मोगरे से सजे और हथफूल को केन्द्र करते हुये कंगनों को पकड़ घुँघरुओं से बजे टेसुई आभ होकर अलक्तक बने फिर हिना से हथेली रचाने लगे पांखुरी पांखुरी हो बिछे सेज पर और फ़िर कामनायें सजाने लगे

हो गए शिल्प नूतन पुन: आस के  चेतना में घुली कल्पना के परे

स्वर उमड़ते कंठ

स्वर उमड़ते कंठ से न छू सके कभी अधर कोर पर सिमट के रह गया है अश्रु का सफ़र दृष्टि की गली में कोई पाहुना ना आ सका अजनबी से मोड़ पे आ ज़िन्दगी गई ठहर सामने नहीं है शेष कोई भी तो कामना बज रहा है द्वात्र पर अतीत का ही झुनझुना आ खड़े हैं पास में वे पंथ मानचित्र के दंभ ने जिन्हें स्वयं के वास्ते नहीं चुना कल्पना के पाखियों के पंख सारे झर गये घिर तमस के मेघ नैन का वितान भर गये अस्स की किरन  को लील कर दिशायें हँस पड़ीं एक बिन्दु पर अटक के थम सभी प्रहर गये मंदिरों के द्वार दीप एक भी जला नहीं भाग्य था गुणित परन्तु अंश भी फ़ला नहीं चाँदनी ने गीत जितने रात जाग कर लिखे पंखुरी के कंठ स्वर में एक भी सजा नहीं भोर का लिखा सँदेस एक भी ना पढ़ सके खिंच रही थी रेख को ना पाँव पार कर सके तीर की उड़ान के परे रहे थे लक्ष्य सब आँधियों के सामने न निश्चय देर टिक सके
थी किताब वेड की जो ब्रह्मलीन हो गई  तेर बांसुरी की लग रहा है क्षीण हो गई  मंत्र अपने उच्चारण से हो गए अलग लगा  तार सब बिखर चुके हैं मौन बीन हो गई 
हुए हैं हाथ बाध्य अब मशाल दीप्त नव करें  अवनिकाएं सब हटायें औ प्रकाश नभ भरें  जो प्राप्ति संचयित हुई ह…

खुलते तो हैं पृष्ठ

खुलते तो हैं पृष्ठ हवा को छूकर इस मन की पुस्तक के सुधियों वाली जो संध्या की गलियों में टहला  करती है पी जाती है पर आंखों में तिरती हुई धुंध शब्दों को और रिक्तता परछाई बन  कर आंगन में आ तिरती है हो जाती है राह तिरोहित, अनायास ही चलते चलते एक वृत्त में बन्दी बन कर लगता है पग रह जाते हैं अधरों पर रह रह कर जैसे कोई बात लरज जाती है लेकिन समझ नहीं आ पाता उमड़े स्वर क्या कह जाते हैं बिखराने लगता है चढ़ता हुआ अंधेरा स्याही जैसे सपनों की दहलीजों पर बन ओस फ़िसलती है गिरती है और मौन की प्रतिध्वनियां बस देखा करती प्रश्न चिह्न बन जैसे ही तारों से कोई तान बांसुरी की मिलती है भटकन लौट लौट  कर आती है टकराते हुये क्षितिज सेे आकारों के आभासों से जुड़ता नहीं नाम कोई भी दीपक रोज जला कर रखता है दिन ला अपने आले में मुट्ठी में भर रख लेती है उसकी रश्मि सांझ  सोई सी हँसिये का आकार चाँद ले लेता हाथ रात का छूकर सपनों के पौधे उग पाने से पहले ही कट जाते हैं बिखरे हुये विजन की गूँगी आवाज़ों को खोजा  करते अवगुंठित हो इक दूजे में निमिष प्रहर सब घुल जाते हैं

जब कथानक गया इस कथा का लिखा

बनगईंलेखनीरश्मियाँभोरकी
आजलिखनेलगीइकनईफिरकथा
होगयेहैंइकत्तीसपूरेबरस
जबकथानकगयाइसकथाकालिखा अजनबीएकझोंकाहवाकाउड़ा
दोअपरिचितसहजआगयेपासमें
दृष्टिसेदृष्टियोंनेउलझतेहुये
एकदूजेकोबाँधाथाभुजपाशमें
पंथदोथेअलग, एकहोघुलगये
पगबढ़ेएकहीरागिनीमेंबँधे
लक्ष्यकेजितनेअनुमानथेवेसभी
एकहीबिन्दुकोकेन्द्रकरतेसधे एकहीसूत्रहैधड़कनोंजोड़ता
हरसितारागयामुस्कुराकरबता भोरउगतीरहींसांझढलतीरहीं
सांसकेसाथसांसेंलिपटतीरहीं
दोपहरनितनयेआभरणओढ़ती
प्रीतकीधूपपीतीसँवरतीरही
स्वप्नचारोंनयनकेहुयेएकसे
एकहीकामनापरिणतिकीरही
साथमिलकरकेदोआंजुरिएकहो
यज्ञमेंआहुतिसाथदेतीरहीं प्राणदोथेमगरएकहोजुड़

नाम थी आज की सभ्यता लिख गई

इक सड़क के किनारे पे बिखरे पड़े फ़्रेन्च फ़्राई के कन्टेनरों पे छपा नाम थी आज की सभ्यता लिख गई कोशिशें की बहुत,पर नहीं पढ़ सका विश्व पर्यावरण दिन मनाया था कल खूब नारे लगे खूब जलसे हुये रोक लगना जरूरी, न दूषण बढ़े बात उछली हवाओं में चलते हुये रिक्त पानी की बोतल गिरीं पंथ में चिप्स के बैग बन कर पतंगें उड़े हर डगर पर यही चिह्न छोड़ा किये पांव चलते हुये जिस तरफ़ भी मुड़े स्वर उमड़ता हुआ करता उद्घोष था भोर से सांझ बीती,नहीं पर थका एक टुकड़ा हरी घास बाकी रहे एक आँजुरि रहे स्वच्छ जल की कहीं अगली पीढ़ी को देनी विरासत हमें लेवें संकल्प अस्मर्थ हंवे नहीं बस यही सोच ले, कैन थी हाथ में कोक की पेप्सी और स्प्राईट की खाली होते किनारे उछाला उन्हें बात उनके लिये यह सहज राईट थी ध्यान से मैं मनन अध्ययन कर रहा पर समझ आ नहीं पाया ये फ़लसफ़ा दीप तो बाल कर रख लिया शीश पर पर तले का अंधेरा न देखा तनिक दृष्टि दहलीज के बार जब भी गयी अंश था काल का एक ही वह क्षणिक जिस नियम को बनाने का जयघोष था मात्र वे सब रहे दूसरों के लिये उनके आगे कभी आ न दर्पण सका सोच के वे बदलते रहे जाविये दायां कर एक उपदेश की मुद्रिका बायें से खेलते है नि…

दीप दीपावली के जलें इस बरस

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भोर की रश्मियों की प्रखरता लिये दीप दीपावली के जलें इस बरस
रक्त-कमलासनी के करों से झरे,आप आशीष का पायें पारस परस
ऋद्धि सिद्धि की अनुकूल हों दृष्टियाँ साथ झंकारती एक वीणा रहे
भावनाओं में अपनत्व उगता रहे, क्यारियाँ ज़िन्दगी की रहें सब सरस



जले हैं फिर से इस बरस हजार कामना लिए नवीन वर्तिकाओं से सजे हुए नए दिए नए ही स्वप्न आँजती है आँख फिर से इस बरस  जो अंकुरित हो आस वो बरस के अंत तक जिए

रची पुरबि के द्वार पर नवीन आज कल्पना  न अब रहे ह्रदय कहीं पे   कोई भी हो अनमना  उगे जो भोर निश्चयों के साथ यात्राओं के  डगर के साथ अंश हों नवीन वार्ताओं के  न व्यस्तता की चादरों से दूर एक पल रहे  औ' आज ही भविष्य हो गया है आन कल कहे  न नीड़  के निमंत्रणों से एक पल कोई छले  औ लक्ष्य पग के साथ अपने पग मिला मिला चले

हैं मंत्रपूर सप्तानीर आंजुरी में भर लिए जले हैं फिर से इस बरस हजार कामना लिए

जो कामनाएँ हैं मेरी, वही रहें हों आपकी  ये डोरियाँ जुड़ी रहें सदा हमारे साथ की  न मैं में तुम में भेद हो,जो तुम कहो वो मैं कहूं  तुम्हारी भावना प्रत्येक साथ साथ मैं सहूँ  यों  तुम से मैं जुडू  कि  भेद बीच आप का हेट  बढ़…

सब कुछ ठीक ठाक है

सांझ अटक कर चौराहे पर पीती रही धुंआ ज़हरीला बूढ़े  अम्बर का जर्जर तन हुआ आज कुछ ज्यादा पीला पीर पिघल कर बही नयन से घायल हुई घटाओं की यों पगडंडी का राज पथों का सब ही का तन मन है गीला बान्धे रहा राजहठ लेकिन पट्टी अपने खुले नयन पर कहते हुये चिह्न उन्नति के हैं ये, सब कुछ ठीक ठाक है मौसम की करवट ने बदले दिन सब गर्मी के  सर्दी के बसा  लिया है सावन ने अब अपना घर सूने मरुथल में सिन्धु तीर पर आ सो जातीं हिम आलय से चली हवायें नीलकंठ का गला छोड़कर भरा हलाहल गंगा जल में निहित स्वार्थ के आभूषण   से शोभित प्रतिमा के आराधक ढूँढ़ा करते दोष दृष्टि में, कहते दर्पण यहाँ साफ़ है कर बैठी अधिकार तुलसियों के गमलों पर विष की बेलें खेतों में उगती फ़सलों की अधिकारी हैं अमरलतायें भूमिपुत्र मां के आंचक्ल को हो होकर व्याकुल टटोलते प्राप्त किन्तु हो पातीं केवल उसको उलझी हुई व्यथायें जिनका है दायित्व सभी वे हाथ झाड़ अपने कह देते जो पीड़ित है उसे जनम का पिछले कोई मिला श्राप है धरा  टेरती जिसको वो ही इन्द्रसभा में जाकर बैठे दृष्टिकिरण घाटी में आती नहीं जहां से कभी उतर कर गंधर्वों के गान अप्सराओं  की किंकिणियों के स्वर में क…

दिशाओं पर इबारत

लाज ने हर बार रोके शब्द चढ़ने से अधर पर दृष्टि छूते ही नयन की देहरी को झुक गई है प्राप्त मुझको हो गये सन्देश सब उड़ती हवा से कंठ की वाणी जिन्हें उच्चार करते रुक गई है स्वप्न जो संवरे नयन में, मैं उन्हें पहचान लूंगा भाव की आलोड़नायें हो रहीं जो, जान लूंगा शब्द की बैसाखियां क्या चाहते संबंध अपने बिन कही संप्रेषणा के बन रहे आधार हम तुम कोई परिभाषा नहीं,जो सूत्र हमको बांधता है फूल-खुश्बू,धार-नदिया, शाख से हो कोई विद्रुम मैं तुम्हारी छांव को परछाईं अपनी मान लूंगा भावना की टेर को मैं सहज ही पहचान लूंगा जब अकेली सांझ लिखती है दिशाओं पर इबारत बादलों ने शब्द बन तब नाम लिक्खा है हमारा कंपकंपाती दीप की लौ ने स्वयं को तूलिका कर रात की कजराई में बस चित्र अपना ही निखारा मैं हमारी अस्मिता का प्राप्त कर अनुमान लूँगा जो तुम्हारी है उसी को मीत अपनी मान लूंगा

पीर बिना कारण के गाती

गिरजे में, मंदिर मस्जिद में केवल सौदागर मिलते हैं कोई ऐसा नहीं कहीं भी दे पाये प्रश्नों के उत्तर खिली धूप की सलवट मे क्यों अंधियारे के बीज पनपते क्यों चन्दा की किरन किसी के मन का आंगन झुलसा जाती क्यों कर्मण्यवाधिकारस्ते की बदला करती परिभाषा कैसे किसी हथेली पर आकर के अब सरसों जम जाती किसका आज विगत के पुण्यों का प्रताप ही बन जाता है किसके भाल टँगे अक्षर की छवियां धूमिल होती जातीं क्यों नयनों के ढलते जल पर भी प्रतिबन्ध लगा करते हैं पीर बिना कारण के गाती आकर कुछ अधरों पर क्योंकर पथवारी पर वड़ के नीचे लगी हुई कुछ तस्वीरों पर अक्षत चन्दन रख देने से भाग्य कहां बदला करते हैं खोल दुकानें,जन्तर गंडे ताबीजों को बेच रहे जो उनका कितना बदला ? भाग्य बदलने का दावा करते हैं कोई शीश नवाये,कोई सवामनी की भेंट चढ़ाये श्रद्धा के पलड़े में दोनों की क्यों तुलनायें करते हैं टिकट लगा कर दर्शन दे जो,वो तो देव नहीं हो सकता और दलाली करने वाले क्या हैं सच पशुओं से बढ़कर

पता नहीं कल भोर

प्राची के पीताम्बर पर कुछ अरुणिम आभाओं के छींटे प्रहरी बन कर खड़े हुये दो बादल के टुकडे कजरारे श्याम प्रतीची नीले रंग की एक बुहारी लेकर कर में दिन की अगवानी को आतुर,अंगनाई को और बुहारे कितनी खुले अवनिका अम्बर की खिड़की से पता नहीं कल चित्र आज के इसीलिये मैं, सोच रहा नयनों में भर लूं द्वार नीड़ के खोल देखता एक विहग फैले वितान को पाटल पर बूंदों के दर्पण में अलसाई सी परछाई रहे लड़खड़ाते कदमों से कलियों के बिस्तर से उठ कर आँखें मलते हुये गंध के एक झकोरे की अंगडाई करे धूप का चाबुक गतियाँ द्रुत इस ठहरे हुये समय की इससे पहले इन्हें तूलिका अपनी लेकर चित्रित कर लूं पलक मिचमिचाती पगडंडी औऔर उठाकरश्यामल चूनर अथक बटोही के आने की लेकर आशायें फ़ैलाये घंटे शंख अजानों के स्वर में घुलते मंत्रोच्चार को तट नदिया का अपनी लहरों के गुंजन से और सजाये कोपभवन की ओर बढ़ रहा मौसम कुपित रहे कल कितना पता नहीं इसलिये आज ही इसे याद में अंकित कर लूँ

दोपहर ने साथ मेरे छल किया है

आ गए अंगनाई में फिर से उतर कोहरे घनेरे आज फिर से दोपहर ने साथ मेरे छल किया है भोर के पट जा किरण ने रोज ही थे थपथपाये नींद से जागे, सुनहरी रूप आ अपना दिखाये और प्राची से निरन्तर जोड़ते सामंजसों को स्वर प्रभाती के नये कुछ छेड़ स्वर अपना मिलाये किन्तु जागी भोर जब आई उतर कर देहरी पर तो लगा जैसे किसी ने तिमिर मुख पर मल दिया है रोशनी को ढूँढ़ते पथ में दिवस आ लड़खड़ाता बायें दायें पृष्ठ जाता और फिर पथ भूल जाता सोख बैठी है सियाही बाग झरने फूल पर्वत एक सन्नाटा घिरा चहुँ ओर केवल झनझनाता फ़ैलता विस्तार तम का हो गया निस्सीम जैसे एक ही आकार जिसने घोल नभ में थल दिया है खो चुकी सारी दिशायें, क्या कहाँ है क्या यहाँ है और जो भी पास होने का भरम, जाने कहाँ है मुट्ठियों ने क्या समेटा क्या फ़िसल कर बह गया है जो अपेक्षित है , नजर जाती नहीं है बस वहाँ है वह सुनहरा स्वप्न जिसके बीज बोये नित नयन ने
रात की पगडंडियों पर पार जाने चल दिया है

पाँचसौवीं प्रस्तुति---केवल हैं आभास तुम्हारे

जाते  जाते सितम्बर ने ठिठक कर पीछे मुड़ कर देखा और हौले से मुस्कुराया. मेरी दृष्टि में घुले हुये प्रश्नों को देख कर वह फिर से मुस्कुरा दिया और दरवाजे के एक ओर होकर अक्तूबर को अन्दर आने का निमंत्रण देते हुये बाहर निकल गया. ऊहापोह में डूबा मैं उसके इस व्यवहार को समझने की कोशिश कर ही रहा था तभी अक्तूबर ने अपनी एक उंगली उठा कर याद दिलाया कि गीत कलश पर माँ शारदा के आशीष के शब्द सुमन प्रस्तुत करने हैं और यह पंखुरियाँ इस क्रम में पाँचसौवीं होंगी. कुछ विशेष नहीं है. वही शब्दों के फूल जो सदा माँ सरस्वती के चरणोंमें चढ़ते है. वही शब्द सुमन एक बार फिर सादर समर्पित माँ भारती के श्री चरणों में :-


निखरी है कोई परछाई जब जब भी धरती पर पड़कर मृतिका सहज बना देती है प्रतिमा उसकी पल में गढ़ कर अनायास वो सज जाती है छवियाँ लेकर मीत तुम्हारी रख लेता है भावसिक्त मन उसको दीवारों पर जड़कर परछाईं तो परछाईं है, बोध कहे कितना भी चाहे दृष्टि ढूँढती हर परछाईं में केवल आभास तुम्हारे जिन सोचों में डूबा हूँ मैं, शायद तुम भी उनमें खोये जो सपने देखे हैं मैंने,तुमने भी आँखों में बोये यादों के जिन मणिपुष्पों की  माला…

रचें नयन में आ राँगोली

दीवाली के जले दियों की किरन किरन में तुम प्रतिबिम्बित रंग तुम्हारी अँगड़ाई से पाकर के सजती है होली
तुम तो तुम हो तुलनाओं के लिये नहीं है कुछ भी संभव कचनारों में चैरी फूलों में, चम्पा में आभा तुमसे घटा साँवरी,पल सिन्दूरी, खिली धूप का उजियारापन अपना भाग्य सराहा करते पाकर के छायायें तुमसे उगे दिवस की वाणी हो या हो थक कर बैठी पगडंडी जब भी बोली शब्द कोई तो नाम तुम्हारा ही बस बोली फ़िसली हुई पान के पत्तों की नोकों से जल की बूँदें करती हैं जिस पल प्रतिमा के चरणों का जाकर प्रक्षालन उस पल मन की साधें सहसा घुल जाया करतीं रोली में और भावनायें हो जातीं कल्पित तुमको कर के चन्दन अविश्वास का पल हो चाहे या दृढ़ गहरी हुई आस्था अर्पित तुमको भरी आँजुरी, करे अपेक्षा रीती झोली
आवश्क यह नहीं सदा ही खिलें डालियों पर गुलमोहर आवश्यक यह नहीं हवा के झोंके सदा गंध ही लाये यह भी निश्चित नहीं साधना पा जाये हर बार अभीप्सित यह भी तय कब रहा अधर पर गीत प्रीत के ही आ पाय लेकिन इतना तय है प्रियतम, जब भी रजनी थपके पलकें तब तब स्वप्न तुम्हारे ही बस रचें नयन में आ राँगोली

आप-एक बार फिर

नैन की वीथियों में संवरता रहा हर निशा में वही सात रंगी सपन छू गई थी जिसे आपकी दृष्टि की एक दिन जगमगाती सुनहरी किरण आगतों के पलों में घुले हैं हुये पल विगत के रहे जो निकट आपके आपकी ही छवी से लगा जुड़ गई ज़िंदगी की मेरी ये चिरंतर लगन धूप जब भी खिली याद आने लगा आपकी ओढ़नी का मुझे वो सिरा गुलमुहर की लिए रंगतें,गंध बन जो मलय की सदा वाटिका में तिरा कोर की फुन्दानियों से छिटकती हुई जगमगाहट दिवस को सजाती हुई शीश के स्पर्श से ले मुदित प्रेरणा, व्योम में सावनी मेघ आकर घिरा

आप-एक और चित्र

व्योम के पत्र पर चाँदनी की किरन, रात भर एक जो नाम लिखती रही वर्तनी से उसी की पिघलते हुये, पाटलों पर सुधा थी बरसती रही चाँद छूकर उसे और उजला हुआ, रोशनी भी सितारों की बढ़ने लगी आपका नाम था, छू पवन झालरी गंध बन वाटिका में विचरती रही बादलों ने उमड़ते हुये लिख दिया ,व्योम पर से जिसे बूँद में ढाल कर टाँकती है जिसे गंध पीकर हवा, मन के लहरा रहे श्वेत रूमाल पर एक सतरंग धनु की प्रत्यंचा बना जो दिशाओं पे संधान करता रहा आपका नाम है जगमगाता हुआ नित्य अंकित हुआ है दिवस भाल पर

आप--सितम्बर

ट्रेन की सीट पर थे बिखर कर पड़े,कल के अखबार की सुर्खियों में छिपा शब्द हर एक था कर रहा मंत्रणा,इसलिये नाम बस आपका ही दिखा जो समाचार थे वे सभी आपकी गुनगुनाती हुई मुस्कुराहट भरे और विज्ञापनों में सजा चित्र जो वो मुझे एक बस आपका ही लगा शोर ट्रेफ़िक का सारा पिघलते हुये, यूँ लगा ढल गया एक ही नाम में भोर आफ़िस को जाते हुये थी लगा,और यूँ ही लगा लौटते शाम में पट्ट चौरास्तों पर लगे थे हुये, चित्र जिनमें बने थे कई रंग के चित्र सारे मुझे आपके ही लगे, मन रँगा यूँ रहा आपके ध्यान में

आप-क्रम

रात की खिड़कियों पे खड़े सब रहे, स्वप्न उतरा नहीं कोई आकर नयन
नैन के दीप जलते प्रतीक्षा लिये, कोई तो एक आकर करेगा चयन
चाँदनी की किरन में पिरोती रही, नींद तारों के मनके लिये रात भर
आप जब से गये, कक्ष सूना हुआ, सेज भी अब तो करती नहीं है शयन

-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o

गुनगुनाने लगीं चारदीवारियाँ, नृत्यमय अलगनी पे टँगी ओढ़नी
देहरी हस्तस्पर्शी प्रतीक्षा लिये, है प्रफ़ुल्लित हो सावन में ज्यों मोरनी
थिरकनें घुँघरुओं की सँवरने लगीं, थाप तबला भी खुद पे लगाने लगा
आपके पग हुये अग्रसर इस तरफ़, धूप की इक किरन छू कहे बोरनी

-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-

भोर आई जो प्राची की उंगली पकड़ , याद आया मुझे नाम तब आपका
ओढ़नी लाल संध्या ने ओढ़ी जरा, चित्र बनने लगा नैन में आपका
दोपहर की गली से गुजरते हुये, बात जब पत्तियों से हवा ने करी
चाँदनी के सितारों पे बजता हुआ, याद आया मुझे कंठस्वर आपका

आप--अगस्त २०१२

आपके होंठ से जो फ़िसल कर गिरी मुस्कुराहट कली बन महकने लगी रंगतों ने कपोलों की जो छू लिया तो पलाशों सरीखी दहकने लगी स्वप्न की क्यारियाँ, पतझरी चादरें ओढ़ कर मौन सोई हुईं थीं सभी आपकी गंध ने आ जो चूमा इन्हें पाखियों की तरह से चहकने लगी< ----------------------------
सूर्य को अर्घ्य थे आप देते हुये अपने हाथों में जल का कलश इक लिये मंत्र का स्वर उमड़ता हुआ होंठ पर एक धारा के अभिनव परस के लिये बन्द पलकों पे उषा की पहली किरन गाल पर लालिमा का छुअन झिलमिली दृष्टि हर भोर अपनी उगाती रही बस उसी एक पल के दरस के लिएय.

उन्हें आज ही कहना अच्छा

ठहरे हुआ नीर जब दर्पण बनता, तो धुंधला ही बनता गतियाँ भले रहें मंथर ही, पर उसका है बहना अच्छा भिन्न दिखाते आकृतियों के आकारों को सुधि के टुकड़े प्रतिपल बदले अनुपातों के रह रह रहे बदलते क्रम में अपने ही बिम्बों से डोरी बँधी हुई परिचय की टूटे खींचे हुए स्वयं के अपने ही मिथ्या व्यूहों के भ्रम में कुछ सन्दर्भ बदल देये हैं स्थापित हर इक परिभाषा को इसीलिये जो शब्द पास हैं, उन्हें आज ही कहना अच्छा हुई दृष्टि संकुचित दायरों की सीमाओं में जब बन्दी तब मरीचिकाओं के संभ्रम आकर छा जाते वितान पर किन्तु उतरती हुई कलई की खुलती हैं जब झीनी परतें प्रश्नचिह्न लगने लगते हैं,सम्बन्धों की हर उड़ान पर हुआ प्रशंसा से अनुमोदित गर्व चढ़ा जिन कंगूरों पर उन आधारहीन कंगूरों का सचमुच है ढहना अच्छा प्रसवित अनुमानों से होते,हुए संचयित निष्कर्षों में खो देती हैं पंथ स्वयं का सत्य बोध की सीधी रेखा नयनों के दरवाजे पर तब दस्तक देते थके रोशनी और दृश्य हर एक स्वयं को रह जाता करके अनदेखा क्षणिक सांत्वना के स्पर्शों से जो अनुभूति बने दुखदायी मन को अपने उसका होकर एकाकी ही सहना अच्छा

पर घटा कोई भी द्वार आई नहीं

आके सावन गली से गुजरता रहा पर घटा कोई भी द्वार आई नहीं धूप ने जिन पथों को प्रकाशित किया वे सदा दूर मेरे पगों से रहे कोई ऐसी किरण ना मिली आज तक एक पल के लिये बाँह आकर गहे एक टूटे सितारे की किस्मत लिये व्योम की शून्यता में विचरता रहा और मौसम की सूखी हुई डाल से नित्य दिनमान पत्ते सा झरता रहा एक मुट्ठी खुली,आँजुरी ना बनी नीर की बूँद हाथों में आई नहीं इक मयुरी करुण टेर उठती हुई तीर नदिया के आ लड़खड़ाती रही प्यास चातक की उलझी हुई कंठ से आई बाहर नहीं, छटपटाती रही पी कहां स्वर भटकता हुआ खो गया फ़िर ना लौटाई कोई क्षितिज ने नजर ठोकरें खाते,गिरते संभलते हुये क्रम में बँध रह गया ज़िन्दगी का सफ़र. तार झंकारते थक गईं उंगलियां एक पाजेब पर झनझनाई नहीं आईना बिम्ब कोई ना दिखला सका दूर परछाईयाँ देह से हो गईं अजनबी गंध की झालरें टाँक कर रिक्त इक पालकी ही हवा ढो गई एक रेखा दिशाओं में ढलती रही एक ही वृत्त के व्यास को बांध कर रात ठगिनी हुई साथ में ले गईं नींद की गठरियाँ पीठ पर लाद कर दूर जाते हुये रोशनी कह गई सांझ तक की शपथ थी उठाई नहीं

शा्यद हल हो अब मुश्किल कुछ

जीवन के इस समीकरण की गुत्थी को प्रतिदिन सुलझाते लेकिन हर इक बार लगा यह हो जाती है और जटिल कुछ उत्तरदायित्वों के लम्बे चौड़े श्यामपट्ट पर रह रह साँसों की खड़िया लिख लिख कर कोशिश करती सुलझाने की किन्तु सन्तुलित कर उत्तर तक पहुँच सकें इससे पहले ही साँझ घोषणा कर देती है मिले समय के चुक जाने की खिन्न ह्रदय असफ़ल हाथों से आशा की किरचें बटोरता जिन पर अंकित रहता, संभव अब के उत्तर जाये मिल कुछ हो कर आती नई सदा ही सम्बन्धों की परिभाषायें परिशिष्टों में जुड़ जाते हैं नियम नये कुछ अनुबन्धों के लिखे हुए शब्दों से कोई तारतम्य जुड़ पाये इससे पहले ही लग जाते बन्धन और नये कुछ प्रतिबन्धों के ढूँढ़ा करती है नयनों की बीनाई उस पगडंडी को जिसके अंत सिरे की देहरी से होता अक्सर हासिल कुछ फ़ैले हुए निशा के वन में कहीं झाड़ियों में वृक्षों पर चिह्न नहीं मिलता परिचय का,दिखते हैं आकार भयावह कन्दीलें बन लटके तारे लगता कुछ इंगित करते हैं कोशिश करता बंजारा मन समझ सके कुछ उनका आशय प्राची के महलों में जलते हुए दिये की चन्द लकीरें आसगन्ध बिखरा जाती हैं,शा्यद हल हो अब मुश्किल कुछ

कोई जिज्ञासा नहीं है

भाव ले ढलते नहीं हैं शब्द अब मेरे अधर के सूत्र में बँध पायें इससे पूर्व रह जाते बिखर के टिक नहीं पाती किसी भी बिन्दु पर भटकी निगाहें सिन्धु से आता नहीं मैनाक अब कोई उभर के डोरियों से बँध धुरी की चल रहे हैं वृत्त में बस शेष क्या है जानने की कोई जिज्ञासा नहीं है दिन निहारे भोर उगते ही निरन्तर दर्पणों को एक बासी अक्स फ़िर फ़िर सामने आता सँवर कर तह रखी रेखाओं की अनगिन परत के बीच खोया एक अनुभव,बात कहने को नहीं आता निखर कर जानते बीता हुआ कल, आयेगा कल रूप बदले और जो है आज उसकी कोई परिभाषा नहीं है यूँ ह्रदय तो नित्य भिंचता है समय की मुट्ठियों में और बींधे रश्मियों से धूप की दिन का धनुर्धर शूल के आघात पाना है नियति का पृष्ठ अंतिम है नहीं संभावना यह दृश्य अब आये बदल कर पीर की बजती हुई शहनाई के मद्दम सुरों में व्यक्त मन का हाल कर पाये,कोई भाषा नहीं है बुझ चुके जयदीप जिनको आस ने रह रह जलाया आंधियों में ढल गईं हर रोज ही बहती हवायें पल दिवस के,पल निशा के चौघड़ी की चौसरों पर कर रहें हैं मात देने को निरन्तर मंत्रणायें पूर्व बिछने के, बिसातों पर हुई है हार ही तय कोई भी अनुकूल होकर पड़ सके, पासा नहीं है

और उत्तर हैं उलझते प्रश्न अपने आप से कर

एक गतिक्रम में बँधे पग चल रहे हैं निर्णयों बिन भोर ढलती,सांझ-होती रात फ़िर आता निकल दिन ढल गया जीवन स्वयं ही एक गति में अनवरत हो उंगलियाँ संभव नहीं विश्रान्ति के पल को सकें गिन अर्थ पाने के लिये उत्सुक निगाहें ताकती हैं व्योम के उस पार, लेकिन लौटतीं हैं शून्य लेकर टूट कर जाते बिखर सब पाल कर रक्खे हुए भ्रम पत्थरों से जुड़ रहे आशीष को ले क्या करें हम केन्द्र कर के सत्य को जितने कथानक बुन गये थे आज उनका आकलन है गल्प की गाथाओं के सम पूछती है एक जर्जर आस अपने आप से यह क्या मिला यज्ञाग्नि को भूखे उदर का कौर लेकर कौन रचनाकार?देखे नित्य निज रचना बिगड़ते बन रहे आकार की रेखाओं को निज से झगड़ते हो विमुख क्यों कैनवस से कूचियाँ रख दे उठाकर देखता है किसलिये दिनमान के यूँ पत्र झड़ते प्रश्न ही करने लगे हैं प्रश्न से भी प्रश्न पल पल और उत्तर हैं उलझते प्रश्न अपने आप से कर

भूमिका लिख दी नये इक गीत की

भोर के सन्देश ने आ
प्रष्ट पर पहले, दिवस के
भूमिका लिख दी नये इक गीत की
कुछ नई सरगम सृजित करके सुरों में
अर्थ दे झंकार को नव, नूपुरों में
गंध के उन्माद में फीकी हुईं थीं
वर्ण रक्तिम को पिरो कर पान्खुरों में
तोड़ दीवारें पुरातन रीत की
भूमिका लिख दी नई इक गीत की

मंदिरों की आरती का सुर बदल कर शंख की ध्वनि में नया उद्घोष भर कर कंपकंपाती दीप की इक वर्त्तिका में प्राण संचारित किये आहुति संजोकर व्याख्या की आस्था की नीत की भूमिका लिख दी नये इक गीत की

धूप चैती मखमली को जेठ की कर मानकों को दृष्टि के थोड़ा बदल कर हो चुकीं निस्पन्द तम में चेतनाओं में नई इक ज्योति का अव्हान भर कर सौम्यता लेकर गगन इक पीत की भूमिका लिख दी नये इक गीत की
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चित्र वह एक तेरा रहा प्रियतमे

भोर से सांझ नभ में विचरते हुए
कल्पना के निमिष थक गये जिस घड़ी
फूल से उठ रही गंध को पी गई
खिलकिहिलाती हुई धूप सर पर खड़ी
मन का विस्तार जब सिन्धु में चल रहे
पोत के इक परिन्दे सरीखा हुआ
और सुधियां लगीं छटपटा पूछने
आज अभिव्यक्तियों को कहो क्या हुआ


उस समय तूलिका ने बनाया जिसे
शब्द के आभरण से सजाया जिसे
सरगमों के सुरों से संवारा जिसे
चाँदनी ने तुहिन बन निखारा जिसे



चित्र वह एक तेरा रहा प्रियतमे
नाम बस एक तेरा रहा प्रियतमे



पंथ के इक अजाने किसी मोड़ पर
चल दिये साये भी साथ जब छोड़ कर
झांकते कक्ष के दर्पणों में मिला
अक्से भी जब खड़ा पीठ को मोड़कर
मार्ग नक्षत्र अपना बदल कर चले
सांझ आते, बुझाने लगी जब दिये
रात की ओढ़नी के सिरों पर बँधे
रश्मियों के कलश थे अंधेरा किये


उस समय व्योम में जो स्वयं रच गया
किंकिणी बन हवाओं के पग जो बँधा
गंध की वेणियों में अनुस्युत हुआ
भर गई जिसकी द्युतियों से हर इक दिशा


चित्र वह एक तेरा रहा प्रियतमे
नाम बस एक तेरा रहा प्रियतमे

फ़िर से दीप जला आना है

गये हुए कल की परछाई आज आज फिर बन आई है और सान्झ के ढलते ढलते इसको फिल कल बन जाना है बदले तो परिधान, मूर्ति की रंगत नहीं बदलती लेकिन नये मुखौटों के पीछे छुप रहते वही पुराने पल छिन रँगे सियारों की रंगत की लम्बी उम्र नहीं है होती कच्चे धब्बों को बारिश की पहली बून्द बरस कर धोती कभी नयापन कुछ कुछ, उगती नई भोर के सँग आयेगा यद्यपि है आधारहीन आशा, पर मन को बहलाना है दृष्टि छली जाती है हर दिन नये नये शीशे दिखलाकर फ़िर फ़िर बर्फ़ जामाई जाती, है जम चुकी बर्फ़ पिघलाकर कोल्हू के पथ से जुड़ लर ही रहीं यात्रायें सारी अब बीती उम्र प्रतीक्षाओं की फिर फिर कर दोहराते ये सब कुछ भी नहीं छुपा परदे में सारा सत्य नजर के आगे लेकिन फिर भी छुपा कहीं कुछ कह कर मन को समझाना है नित प्रपंच विश्वासघात में र्स्क्र उल्स्झ क्स्र कोमल मन को फिर फिर आशावसन मिलतेन है नया मुलम्मा ओढ ओढ कर मंडी में जाने पर सारी आशायें बिखरा जाती हैं जब होता है ज~झात सभी हैं खोटे सिक्के, रखे जोड़ कर पीपल का पत्ता पल भर को पूजा मेम सज तो जात अहै लेकिन उसको कल आते ही मिट्ती में ही मिल जान अहै टीके के सँग अक्षत का दाना सज कर होता है गर्वित बाद निम…

आती तो है याद

आती तो है याद चहलकदमी करती इक गौरेय्या सी
किन्तु देख कर बाज व्यस्तताओं के चुपके छुप जाती है


धड़कन की तालें लगतीं हैं दस्तक मन के दरवाजे पर
सांसों में घुल कर आती है गंध किसी भीने से पल की
बरगद की छाया मे लिपटी चन्द सुहानी मधुमय घड़ियां
खींचा करती है नयनों में छवि इक लहराते आँचल की


तोड़ दिया करता है लेकिन तन्द्रा को आ कोई तकाजा
और स्वप्न की डोली उस पल आते आते रुक जाती है


यों लगता है मंत्र पढ़े थे एक दिवस जो सम्मोहन ने
घुलकर कंठ स्वरों से लिपटी हुई एक सारंगी पर आ
उनके शब्द ,तान लय सब कुछ जुड़ जाते दिन के चिह्नों से
बतियाने लगते हैं मेरे बँटे हुए निमिषों में आ गा


असमंजस की भूलभुलैय्या सी खिंच जाती है पल छिन में
और अचानक स्म्ध्या आकर धुंधुआसी हो झुक जाती है


अर्थ बदल कर खो जाते हैं संचित सारे सन्देशों के
चाहत होती और दूसरे सन्देशे ले आयें कबूतर
बहती हुई हवा की पायल में जो खनक रहीं झंकारे
उनको बादल का टुकड़ा अम्बर से आ लिख जाये भू पर


उगती है हर बार अपेक्षा सावन में खरपतवारों सी
आशाओं की रीती गागर बार बार फिर चुक जाती है

बना अंतरा एक गीत का

मन के कोरे पृष्ठों को जब हस्ताक्षर मिल गया तुम्हारा बिखरी हुई कहानी बँध कर ग्रन्थ बन गई एक प्रीत का टुकड़े टुकड़े अंश अंश में वाक्य अधूरे आधे ही थे कोई बिन्दु नहीं था ना ही चिह्न कोई भी था विराम का कल के वासी अखबारों में छपे हुए मौसम का विवरण जैसा था अधलिखा कथानक, नहीं किसी के किसी काम का जब से छूकर गई तुम्हारी दृष्टि अधूरी पड़ी इबारत अनायास ही लय में बँध कर बना अंतरा एक गीत का मुद्राओं के बिन वटवे सा था छाया मन में खालीपन सन्नाटे घेरे रहते थे परिचय के सारे तारों को भटक भटक कर अभिलाषायें लौटीं थकी शून्य सँग लेकर जिसके बस में नहीं जगाये सुप्त नींद में, झंकारों को पर जब मेरा नाम तुम्हारे स्वर में रँग अधरों से फ़िसला वह कारण बन गया सहज ही, खामोशी की बातचीत का जिनसे रही अपरिचित अनुभव की अब तक की अर्जित पूँजी वह अनुभूति तरंगें बन कर लगी दौड़ने आ नस नस में सँवरी पुष्पवाटिकायें अनगिनती इक सूनी क्यारी में मधुरस पूरित गंध घुल गई जीवन के हर पल नीरस में मौसम की मुस्कान सजीली अँजी दिवस के नयनों में आ निशिगंधा ने दिन में खिल कर किया चलन इक नई रीत का-

छंद गीतों के संवरते हैं नहीं अब सुर में

छंद गीतों के संवरते हैं नहीं अब सुर में कोई मिसरा-ए-ग़ज़ल होंठ पे नहीं आता आपका मुझसे तकाजा कि नया गीत रचूं शब्द गूंगे हैं हुए गाता अगर क्या गाता खँडहर होती मुंडेरों पे चढ़े बैठे जो देखते जो हैं नहीं किरणें उभरते दिन की अपनी मुरझाई हुई सोच में उलझे उलझे सोचते ज़िन्दगी मोहताज है उनके ऋण की उनके कहने पे दिवस उगता है रातें ढलती कौम के होके खुदा गफलतों में रहते हैं अपने कमरे से परे झाँक नहीं देखा कभी कान को अच्छी लगे बात वही सुनते हैं कब्र में पांव मगर छोड़ते नहीं कुर्सी कितना लालच है समझ में ये नहीं आ पाता आपका मुझसे तकाजा कि नया गीत रचूं शब्द गूंगे हैं हुए कुछ भी कहा न जाता वक्त बदला न बदल पाए नजर के भ्रम पर अपने दर्पण में ही देखा हैं किये अपने को मरुथली हिरना के सांचे में ढले बैठे हैं मान कर एक हकीकत बिखरते सपने को चीरते मानवियत आज भी शमशीरों से रक्त की प्यास नहीं बुझती वरस बीत गये उनके साये में धुली साँस आंसुओं में सदा आंख के घट भी लगे अब तो सभी रीत गये एक चादर को चढ़ाये हैं रखे करघे पर सूत पर एक भी बालिश्त भर नहीं काता आपका मुझसे तकाजा कि नया गीत रचूं शब्द गूंगे हैं हुए कुछ भी कहा…

झालरी कोई हवा की लग रहा कुछ कह रही है

कल्पना के चित्र पर ज्यों पड़ गई इंचों बरफ सी रह गईं आतुर निगाहें एक अनचीन्हे दरस की फिर किरण की डोर पकडे बादलों के झुण्ड उमड़े कसमसाने लग गईं बाहें कसक लेकर परस की शून्य में घुलते क्षितिज की रेख पर से आ फिसलती झालरी कोई हवा की लग रहा कुछ कह रही है आ रही लगता कही से कोई स्वर लहरी उमड़ कर किन्तु सुनने की सभी ही कोशिशें असमर्थ लगतीं दृष्टि की धुँधलाहटों से जागती झुंझलाहटों मे कोई भी तस्वीर खाकों से परे अव्यक्त लगती उम्र की पगली भिखारिन, साँस का थामे कटोरा धड़कनों के द्वार पर बस झिड़कियाँ ही सह रही है खींचती है कोई प्रतिध्वनि उद्गमों के छोर पर से व्योम के वातायनों में कोई रखता नाम लिख कर मौसमों की टोलियों को पंथ का निर्देश देता कोई हँसता है हथेली में नई फिर राह भर कर लड़खड़ाते पांव लेकर मानचित्रों में भटकती प्राप्ति की हर साध ढलती सांझ के सँग ढह रही है यूँ लगे,हैं फ़ड़फ़ड़ाते पृष्ठ कुछ खुलकर विगत के बह गये इतिहास बन कर शब्द पर सारे लिखे ही ढेरियां हैं मंडियों में सब पुरानी याद वाली और हर सम्बन्ध का बर्तन रहा है बिन बिके ही उंगलियों पर गिनतियों के अंक की सीमाओं में बँध याद की दुल्हन दिवस…
सुनो सुनयने ! शब्द नहीं अब लिखते गीत तुम्हारा कोई इसीलिये रख दी है मैने आज ताक पर कलम उठा कर

मिलते जितने शब्द आजकल मुझे राह में चलते चलते सब के सब क्षतिग्रस्त और हैं पहने हुये पीर के गहने कातरता के उमड़े बादल रहते सदा नयन के नभ पर तार तार हो चुकी भावनाओं के केवल चिथड़े पहने

भाव सभी लुट चुके मार्ग में इस जंगल में चलते चलते शायद यही नियति है रहते बार बार खुद को समझाकर

टूटी हुई मात्राओं की बैसाखी पर बोझ टिका कर चलना दूभर, चार प्रहर अब खड़े नहीं होने पाते हैं ठोकर खा गिर पड़े स्वरों का उठना संभव हुआ नहीं है सभी अनसुने रहे गीत वे मौन सुरों में जो गाते हैं

मरुथल से उठ रहे चक्रवातों की गति में उलझा सा मन बार बार लौटा करता है परिधियों पर चक्कर खा कर

बदले हुये समय ने बदला शब्दों के सारे अर्थों को उपमायें सब व्यर्थ हो गईं अलंकार बिखरे नदिया तट काजल,कुमकुम और अलक्तक चूड़ी,कँगना,तगड़ी,पायल शेष नहीं है शब्दकोश में ना तो पनघट ना वंशीवट

बिसराये सब पेड़ नीम के, पीपल के , वे इमली वाले जिनकी छाँव सुला देती थी एक दुपहरी को थपका कर

बेसुर इक हो चुकी बाँसुरी के छिद्रों से बही हवा का परिचय कितना हो पाता है सारंगी…

ये कलम गीत में आप ही ढल सके

गीत लिखते हुये ये कलम थक गई
एक भी तुम मगर गुनगुनाये नहीं
गीत के शब्द में खुद कलम ढल सके
इस तरह से कभी मुस्कुराये नहीं

छन्द के बन्द में कुन्तलों की लटें
बाँधती तो रही ये मचलती हुई
रागिनी की लहर पे रिराती रही
रूप की ज्योत्सनायें छिटकती हुई
राग की सीढियों पर सजाये हुये
थिरकनें बन अधर की तरंगें बही
कर अलंकार जड़ती रहीं शब्द में
बोलियाँ कंठ्स्वर बन उभरती हुईं

नृत्य करने लगे आप ही यह कलम
स्वर के घुँघरू कभी झनझनाये नहीं

रात को नित सजा कर नयन कोर पर
रूप की धूप से दिन उगाते हुये
झुकती उठती हुई दृष्टि की पालकी
से उमंगों की क्यारी सजाते हुये
अल्पना में हिनाई हथेली सजा
कंगनों की खनक से सजा झालरी
गात से उड़ रही सन्दली गंध से
वाटिकायें नई नित बनाते हुये

नित्य बुनती रही कुछ कशीदे नये
तुमने लेकिन इधर पग बढ़ाये नहीं

चाल को ढाल चौपाईयां कर दिया
रख पिरो दीं सवैयों में अंगड़ाईयां
मुक्तकों में बुने यष्टि के मोड़ फिर
कर अलक्तक,कवित्तों की शहनाअईयाँ
करके अतुकांत असमंजसों को रखा
नज़्म में रँग दिये कामना के सिरे
और गज़लें बिछाते रहे पंथ में
चूमने के लिये चन्द परछाईयाँ

कोई मुखड़ा नये गीत का बन सके
शब्द तुमने कभी वो स…

शब्द बोले बिना हों जिसे कह गये

पुस्तकों के पलटते हुये पृष्ठ हम
प्यार के गीत को ढूँढ़ते रह गये भावना के बुने अक्षरों में ढले शब्द बोले बिना हों जिसे कह गये जानते खोज होगी निरर्थक यहाँ कोई अनुभूतियाँ ढाल पाता नहीं चाहतों में उलझ कर सतह पर रहा डूब गहराईयाँ कोई पाता नहीं तालियों कीअपेक्षा में बन्दी हुई भावना होंठ की कोर छूती नहीं सिर्फ़ नक्कारखाना बनीं महफ़िलें मौन पीते हुये बैठ तूती रही पीढियों से लगाई हुई आस के जितने सम्बन्ध थे, वे सभी ढह गये छन्द से नित्य बढ़ती रहीं दूरियाँ शब्द की,भाव की और फ़िर अर्थ की सरगमों की कतारें भटकती रही पर दिशा एक भी तो नहीं पा सकीं आस पंचम पे नजरें टिकाये रही सीढियाँ छू नहीं पाई आरोह की कोर पर से फ़िसलती रही पृष्ठ की दृष्टि पल के लिये हाशिये न टँकी शब्द अध्याय की बंदिशों में बँधे एक के बाद इक टूट कर बह गये जो रहे सामने वे उच्छृंखल रहे कोई अनुशासनों के गले ना लगा कोई परिचय की गलियों में आया नहीं नाम चेहरे पे चिपका हुआ रह गया शब्द के झुंड थे, स्वर बहा ना सके ठोकरें खाते खाते गिरे भूमि पर और दुहराई फ़िर से कहानी यही दूसरे पृष्ठ ने खुद ही खुद झूम कर जोकि अनुभूति की मौन पीड़ाओं को बन्द अव्यक…

नई अभिव्यक्तियों की भूमिकायें अब बनाओ

नैन की बीनाईयों पर धूल की परतें जमें जब बादलों के चन्द टुकड़े केश में आकर घुलें जब हाथ, शाखा इक तराशी का न पल भर हाथ छोड़ें कोई रह रह भूलता सा याद में आने लगे जब तब सुनो, यह मौन शब्दों में समय बतला रहा है प्रीत की कविता नहीं अब नीति के कुछ गीत गाओ गाओ वह जो एकतारे से कहे मीरा दिवानी गाओ वह जो कुंज में वृन्दावनी हो सांझ गाये छेड़ दो वह रागिनी जो सूर के स्वर में घुली है गाऒ वह सुन कर जिसे खुद रागिनी भी गुनगुनाये और यदि अक्षम तुम्हारा स्वर न गाने में सफ़ल हो तो किनारे पर खड़े हो,धार के सपने सजाओ प्रीत की अनुभूतियों को और कितने शब्द दोगे और कितने दिन सपन के बीज बो निज को छलोगे पीटते कब तक रहोगे जा चुके पग की लकीरें कब तलक इक वृत्त में तुम बन्द कर पलकें चलोगे ज़िन्दगी के पंथ के इस आखिरी विश्राम-स्थल पर कुछ नई अभिव्यक्तियों की भूमिकायें अब बनाओ हो गया ओझल नजर से उस दिवस में खोये क्यों तुम शाख को क्या देखते हो, हो चुके नि:शेष विद्रुम एक भ्रम की हो गईं धुन्धली घनी परछाईयों में और कितनी देर तक तुम हो रहोगे इस तरह गुम अब नये इक साज के निर्माण का आधार बन कर सरगमों को इक नया ध्याय दे देकर सजाऒ

यह मुझको अनुमान नहीं था

सपनों की पगडंडी पर बस एक बार देखा था तुमको बस जायेगा चित्र तुम्हारा आंखों में, अनुमान नहीं था जीवन वन में रहा विचरता मर्यादा की ओढ़ दुशाला संस्क्रुतियों के दीप जला कर किया पंथ में शुभ्र उजाला गुरुकुल के सिद्धांत ईश का वचन मान कर शीष चढ़ाये लेकर कच की परम्परायें, सम्बन्धों का अर्थ निकाला लेकिन बरसों के प्रतिपादित नियम, निमिष में ढह जाते हैं पुष्प शरों की सीमा कितनी है ये मुझको ज्ञान नहीं था नारद का प्रण, तप की गरिमा, बन्धन सभी उम्र के टूटे एक दॄश्य ही सत्य रह गया,बाकी चित्र हुए सब झूठे याम,घड़ी पल, प्रहर समय की परिभाषायें शून्य हो गई पलकें पत्थर हुईं,दृश्य जो एक बार बन गये, न टूटे रात सौंप कर गई स्वप्न की जो इक स्वर्णिम रंगी चुनरिया उसे छीन ले जाये ऐसा कोई भी दिनमान नहीं था जाने क्यों परिचय अपना ही लगा अधूरा मुझको लगने न जाने क्या आस संजोये, होंठ लगे रह रह कर कँपने खुली हुई बाँहें अधीर हो उठीं पाश में भर लें कुछ तो दूरी के मानक जितने थे सभी लगे मुट्ठी में बँधने कब मरीचिकायें हो जाती हैं साकार इसे बतलाता किसी कोश में किसी ग्रंथ में कोई भी प्रतिमान नहीं था

यह अब हमको नहीं गवारा

जो पगडंडी ह्रदय कुंज से ,बन्द हुये द्वारे तक जाती उस पर चिह्न पड़ें कदमों के यह अब हमको नहीं गवारा अजनबियत की गहन धुंध ने ओढ़ लिया है जिन चेहरों ने उनके अक्स नहीं अब मन के आईने में बनें दुबारा सम्बन्धों के वटवृक्षों की जड़ें खोखली ही निकलीं वे रहे सींचते निशा दिवस हम जिनको प्रीत-नीर दे देकर सूख चुकीं शाखाओं को पुष्पित करने को कलमें रोपीं व्यर्थ भटकना हुआ रहे ज्यों मरुथल में नौकायें खे कर पता नहीं था हमें बाग यह उन सब को पी चुप रहता है भावों के जिन ओस कणों से हमने इसका रूप संवारा छिली हथेली दस्तक देते देते बन्द पड़े द्वारे पर देहरी पर जाकर के बैठी रहीं भावनायें बंजारी झोली का सूनापन बढ़ता निगल गया फ़ैली आंजुरिया और अपेक्षा, ओढ़ उपेक्षा रही मारती मन बेचारी चाहे थी अनुभूति चाँदनी बन आगे बढ़ कंठ लगाये किन्तु असंगति हठी ही रही उसने बार बार दुत्कारा उचित नहीं है हुये समाधिस्थों को छेड़े जा कोई स्वर जिसने अंगीकार किया है एकाकीपन, हो एकाकी अपनी सुधियों के प्याले से हम वह मदिरा रिक्त कर चुके भर कर गई जिसे अहसासों की गगरी ले कर के साकी वह अनामिका की दोशाला, जिस पर कोई पता नहीं है पहुँच कहो कैसे सकता अब उस तक कोई भी हरकारा.

संध्या का एकाकीपन

संजो रखे हैं पल स्मृतियों के मैंने मन की मंजूषा में और संवारा करता हूँ उनसे संध्या का एकाकीपन

वे पल जिनमें दृष्टि साधना करते करते उलझे नयना वे पल जिनमें रही नींद में सोई हुई कंठ की वाणी वे पल जिनमें रहे अपरिचित शब्द अधर की अंगनाई से रही छलकती जिनमें केवल रह रह कर भावों की हांडी

वे पल जब विपरीत दिशा में चले पंथ थे हम दोनों के और घिरे नयनों के कोहरे में आकर बरसा था सावन

वे उद्वेग भरे पल जिनमें रह न सका था मन अनुशासित वे रसभीने पल भाषाएँ कर न सकीं जिनको परिभाषित जिनकी सुरभि गंध भर भर कर महका देती अनगिन कानन वे पल जो उच्छ्रुंखल पल में,और हुए पल में मर्यादित

वे पल बाँध गए जो पल में जीवन का सम्पूर्ण कथानक वे पल जिनमें शेस्ध नहीं है कर पाना कोई सम्पादन

पल.पलांश में त्याग अपरिचय, जो हो गये सहज थे अपने पल जिनकी परछाईं करती है आंखों में चित्रित सपने पल जिनकी क्षणभंगुरता की सीमाओं की व्यापकता में कोटि कल्पनाऒं के नक्षत्री विस्तार लगे हैं नपने

हाँ वे ही पल आराधक से जो आराध्य जोड़ते आये उन्हीं पलों में सिक्त ह्रदय को करता रहता हूँ आराधन

तुमसे दूर कटे कैसे दिन

तुमसे दूर कटे कैसे दिन तुमने पूछा बतलाता हूं
मन की बात उमड़ आती है जिन शब्दों को मैं गाता हूँ झात तुम्हें मैने असत्य का थामा नहीं हाथ पल भर भी किन्तु सत्य की अप्रियता पर अक्सर गया आवरण डाला कह देता हूँ शान्तिमयी हूँ सकुशल कटते हैं दिन रातें मन को भावों को ओढ़ाये रहा मौन की मैं दोशाला केवल शब्दों का आडम्बर है यह भी तो ज्ञात मुझे है गीत गज़ल के सांचे में मैं, जिन शब्दों को बुन गाता हूँ कुछ बातों का अधरों पर आ पाना रहा असम्भव प्रियतम और संकुचित सीमाओं में रही बँधी अनुभूति सदा ही मन के जुड़े हुये तारों में आलोड़न से कहाँ अपरिचित चाहे तुम स्वीकार न कर पाओ इसको मेरे अनुरागी विषम परिस्थितियों में रहता चित्रलिखित होकर मेरा मन सत्य यही है आज पूछते हो तुम तो मैं दोहराता हूँ तुमने पूछा तो उग आये अनगिन प्रश्न अचानक मन में तुम्हें किस तरह रही अपरिचित तुमसे दूर दशा क्या मेरी दिन की बिछी हुई चादरिया कितनी है विस्तृत हो जाती बिना सिरे के कितनी लम्बी हो जाती है रात अँधेरी यद्यपि हुआ प्रकाशन दुष्कर मन की गहराई का प्रियतम फिर भी उन्हें शब्द देने की कोशिश मैं करता जाता हूँ.

अब गली के मोड़ पर है

कल्पवृक्षों के सुमन कुछ आन झोली में गिरे हैं आ मरुस्थल पर लगा ज्यों सावनी बादल घिरे हैं देवसलिला की लहर आईं उमड़ कर वीथियों में नयन झीलों में सपन सतरंगिया होकर तिरे हैं एक झोंका गंध का पट खोलकर वातायनों के कह गया है रथ तुम्हारा अब गली के मोड़ पर है लग पड़ी छँटने घिरी थी कक्ष में गहरी उदासी सांझ की अंगड़ाईयों में लग पड़ी घुलने विभा सी रश्मि की पाजेब बांधे नृत्यमग्ना हो प्रतीची हो गई है पुष्पधन्वा के शरों की कामना सी आतुरा होते नयन की दृष्टि को संगम अपेक्षित ज्ञात है बस झपझपाती सी पलक की कोर पर है सांस में सारंगियों के सुर लगे आकर विचरने धड़कनों की आस में लगने लगा विश्वास भरने श्वेत पाटल पर कुसुम के चन्द बासन्ती पराकण लग पड़े हैं चित्र में अनुराग के नव रंग भरने रह गया बँध कर कलाई से दिवस की शाख पर जो वह निराशा का प्रहर अब उंगलियों की पोर पर है दृष्टि बन रेखायें रह रह भित्तिचित्रों को निहारें थाल में अगवानियों के पुष्प की गंधें निखारें ध्यान की नारद सरीखी भ्रामरी को कर नियंत्रित मन निलय सज्जाओं की बारीकियां फ़िर फ़िर संवारे बांसुरी की टेर पर पाजेब की रुनझुन बिखरना एक स्मितमय अधर के बस थरथराते छोर पर है

गज़लों का उन्वान कर लिया

हमको जब सुकरात समझ कर दिया भेंट में गरल किसी ने हमने खुद को नीलकंठ तब कर कर उसका पान कर लिया आवश्यकता नहीं अगर तो नहीं अपेक्षायें हीं  होती जिसका जितना संचय, उसकी उतनी बढ़ीं लालसायें भी भोर गिनतियों की सीढ़ी पर चढ़ते चढ़ते विलय हो गयी और दिवस की गुत्थी में ही रहीं उलझ कर संध्यायें भी युग तो देता रहा निरन्तर अवसर राजमुकुट को थामे लेकिन वह आसीन कहाँ रह्ता जिसने अभिमान कर लिया दृष्टि सितारों पर रख कर जब चलते रहे पांव गतिमय हो तब तब अपने पग के चिह्नों का भी हमने किया आकलन भाव अगर इक तन कर मन में खड़ा हो गया ताड़ सरीखा तब तब हमने देखा अपनी परछाईं का सहज समर्पण ठोकर खा गिर पड़े शब्द जो रहे पंथ में अनदेखे ही हमने उन सब को चुन चुन कर गज़लों का उन्वान कर लिया इन्द्रधनुष की आभाओं में जब जब भी अटका था ये मन तब तब हमने याद कर रखी मन में रात अमावस वाली बुझे हुये दीपक की प्राणों की आहुति को दिया कंठ स्वर दृष्टि लगी उलझाने जिस पल, सजी हुई पूजा की थाली आतुर किसी पपीहे का स्वर हो या टेर मधुर वंसी की हमने अपने स्वर में इनको बो, वीणा की तान कर लिया

मन फ़िर से एकाकी

दोपह्री है दिन से रूठी आशाओं की गगरी फूटी परिवर्तन की बातें झूठीं विमुख हो चुकी है प्याले से अब सुधियों की साकी मन फिर से एकाकी जीवन की पुस्तक के पन्ने से अक्षर लग गये बिगड़ने तम के रंग लगे हैं भरने फिर लिख पाये ऐसी कोई नहीं लेखनी बाकी मन फ़िर से एकाकी जुड़े तार सारे ही बिखरे रंग पीर के गहरा निखरे हुए सपन सब टूटॆ ठिकरे जेठ किये बैठा बन्दी कर सावन की हर झांकी मन फ़िर से एकाकी

पहने हर संध्या ने मेरे गीतों के गहने

दिन के उजियारे हों चाहे , चाहे रातों के अंधियारे
प्रहर , दिवस हों सप्ताहों से जुड़ कर मिले हुए पखवारे
कोई ऐसा निमिष नहीं था जबकि साथ में उंगली पकडे
चले नहीं हों मेरे संग संग ओ स्वरूपिणे , चित्र तुम्हारे -o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o- पहने हर संध्या ने मेरे गीतों के गहने लौट रहा हो चरवाहा घर रुके नीड़ पर आ यायावर सबके अधरों पर आ आ कर सहज लगे बहने पहने हर संध्या ने मेरे गीतों के गहने हुई प्रतीची अरुणाई में जले दीप की अँगड़ाई में पछुआई सी पुरबाई में लगा धुँआ कहने पहने हर संध्या ने मेरे गीतों के गहने रक्त-पीत नदिय के जल में बिखरे रजनी के काजल में आज बीत बन जाते कल में होते पल तहने पहने हर संध्या ने मेरे गीतों के गहने

सांस को चिश्वास की पूँजी

निराशा के समन्दर के सभी तटबन्ध जब टूटॆ सपन हर आस की परछाईयों के नैन से रूठे अपरिचित हो गये जब सान्त्वना के शब्द से अक्षर सभी संचय समय के हाथ पल भर में गये लूटे

तभी जाते हुये अस्ताचली को जो किरन लौटी उसी की स्वर्णरेखा ने अगोचर सी डगर सूझी

अंधेरों ने हजारों चक्रव्यूहों को रचा बढ़ कर सुनिश्चय सो गया प्रारब्ध कह लड़ते हुये थक कर दिशा भ्रम ने लगाये आन कर दहलीज पर पहरे हवायें सोखने जब लग पड़ें हर एक उठता स्वर

तेरे अनुराग से जो बन्ध गयी इक ज्योति की डोरी वही बस दे रही है सांस को चिश्वास की पूँजी

डगर पीने लगे जब पगतली के चिह्न भी सारे अधर की कोर पर आकर टंके जब अश्रु ही खारे नजर क्र सब वितानों में विजन की शून्यता बिखरे निशायें सोख लें आकाशगंगा के सभी तारे

पलों की तब असहनीयताओं की उमड़ी हुई धारा समुख करती रही है एक छवि बस और न दूजी

लगे गंतव्य अपने आप को जब धुन्ध में खोब्ने दिशाओं के झरोखे जब धुंआसे लग पड़ें होने क्षितिज का द्वार सीमित हो पगों की उंगलियों पर आ दिवाकर भी दुपहरी में अंधेरा लग पड़े बोने

उठी इतिहास पृष्ठों से नये संकल्प की धारा गगन पर चित्र रचती है लिये कर आस की कूची

सांझ के पहले दिये से भोर के अंतिम दिये तक

पढ़ चुका दिन धूप के लिक्खे हुए पन्ने गुलाबी हो गई रंगत बदल कर मौसमों की अब उनावी धार नदिया की लगा जम्हाईयाँ लेने लगी है शाख पर है पत्र की बाकी नहीं हलचल जरा भी याद की तीली रही सुलगा नई कुछ बातियों को सांझ के पहले दिये से भोर के अंतिम दिये तक एक पल आ सामने अनुराग रँगता राधिका सा दूसरे पल एक इकतारा बजाती है दिवानी रुक्मिणी का नेह ढलता भित्तिचित्रों में उतर कर फिर हवायें कह उठी हैं सत्यभामा की कहानी छेड़ता है कोई फिर अनजान सी इक रागिनी को तोडती   है   जो ह्रदय  के तार बंसी के हिये तक बांधती है पांव को अदृश्य सी जंजीर कोई कोई मन का उत्तरीयम बिन छुये ही खींचता है एक अकुलाहट उभरने लग पड़े जैसे नसों में मुट्ठियों में कोई सहसा ही ह्रदय को भींचता है दृष्टि की आवारगी को चैन मिल पाता नहीं है हर जुड़े सम्बन्ध से अनुबन्ध हर इक अनकिये तक झिलमिलाते तारको की अधगिरी परछाईयों में घुल संवरते हैं हजारों चित्र पर रहते  अबूझे  कसमसाहट सलवटों पर करबटें ले ले निरन्तर चाहती है कोई तो हो एक पल जो बात पूछे खींच लेती हैं अरुण कुछ उंगलियाँ चादर निशा की वृत्त ही बस शेष रहता रेख के हर जाविये तक