Posts

Showing posts from December, 2011

एक पत्थर को हम पोत सिन्दूर से

जोकि बस में नहीं था किसी के कहींआस बस इक उसी की लगाते रहेबुझ गई आखिरी दीप की वर्त्तिकारोशनी लड़खड़ाते हुए गिर पड़ीरात के गर्भगृह में रही बन्दिनीभोर के हाथ में थी लगी हथकड़ीस्वर प्रभाती के सब मौन हो रह गयेआरती की नहीं घंटियाँ बज सकींदिन चढ़े देर तक सोई थी नीड़ मेंएक चिड़िया गई सांझ से थी थकीऔर हम सरगमों पर सजा, रात भरका है मेहमाँ अंधेरा ये गाते रहेथी टिकी उत्तरी ध्रुव के अक्षांश पररात की चादरें थीं बहुत ही बड़ीसंशयों में घिरी दूर के मोड़ सेताकती रह गई धूप सहमी बड़ीद्वार पर आगमन के पड़ी आगलेंजो कि क्षमताओं की रेख से थीं अधिकऔर था सामने हंस ठठाता रहाखिल्लियाँ सी उड़ाते दिवस का बधिकअपने विश्वास की चिन्दियाँ देखतेहम हवा की मनौती मनाते रहेकोई आ पायेगा धुन्ध को चीर करजानते थे नहीं शेष संभावनाकिन्तु फिर भी कहीं आस की ले किरनहम छुपाते रहे पास का आईनाइक अविश्वास पर फिर मुलम्मा चढ़ामूर्तियों को नमन नित्य करते हुएजो कि अनभिज्ञ अपने स्वयं से रहेउन नक्षत्रों की गतियों से डरते हुएएक पत्थर को हम पोत सिन्दूर मेंभोर संध्या में मस्तक नवाते रहे

खुद ना प्रश्न चिह्न बन जायें

कुछ प्रश्नों क्रे उत्तर मैने दिये नही बस इस कारण से
मेरे उत्तर नव प्रश्नो का कारण कहीं नहीं बन जायें

घड़ी प्रहर पल सभी रहे हैं प्रश्नों के घेरे में बन्दी
घटते बढ़ते गिरते उठते साये तक भी प्रश्न उठाते
गति में रुके हुए या मुड़ते पथ की हर सहमी करवट पर
हर पग की अगवानी करते प्रश्न चिह्न ही बस टँग जाते

गायन वादन रुदन हँसी के स्वर सब प्रश्नों के अनुचर हैं
चाहे जितनी बार छेड़ कर देखें स्वर की नय़ी विधायें

ऐसा भी तो नहीं प्रश्न के उत्तर ज्ञात नहीं हौं मुझको
लेकिन मेरे उत्तर भी तो करते रहे प्रश्न ही आकर
जब भी करी व्याख्या कोई, झुकी कमर को दिये सहारा
खड़े हो गये सन्मुख मेरे प्रश्नचिह्न आकर अकुलाकर

झुकी हुई नजरें बिछ जाती हैं हर एक दिशा में पथ की
इनसे दामन साफ़ बचाकरे कहो किस तरफ़ कदम बढ़ायें

प्रश्न प्रश्न ही रहते चाहे उत्तर का आवरण ओढ़ लें
उत्तर भी समझाया जाये अगर, नहीं हो पाता उत्तर
क्यों,कब,कहाँ,किसलिये,किसने,कैसे क्या जब शब्द उठे तो
मौन कंठ रहना चाहा है पल में पूर्ण समर्पण कर कर

प्रश्नों के उत्तर,उत्तर के प्रश्न और फिर उनके उत्तर
इनके रचे  व्यूह में घिर हम खुद  ना प्रश्न चिह्न बन जायें

चित्र बन रह जायें जब इतिहास

बोझ से लगने लगें सम्बन्ध के धागे जुड़े जबआस हो कर के उपेक्षित द्वार से खाली मुड़े जबकैद में बन्दी अपेक्षा की रहें सद्भावनायेंस्वार्थ के पाखी बना कर झुंड अम्बर में उड़ें जबतब सुनिश्चित संस्कृतियों की हमारी वह धरोहरजो विरासत में मिली थी, खर्च सारी हो गई हैछू न पायें याद की दहलीज को जब वे कहानीमुद्रिकायें भी रहा करती रहीं जिनमें निशानीअनकहे सन्देश लेकर थीं बहा करती हवायेंपास आ अनुभूतियों के रुत हुआ करती सुहानीजान लेना तब मुलम्मों से भरी यह चन्द्रिका सीपूर्णिमा के शब्द को भी अर्थ नूतन दे गई हैचित्र बन रह जायें जब इतिहास के सब स्वर्ण पन्नेअर्थ की अनुभूतियों से ध्यान लग जाये बिछड़नेमूल्य की भारी कसौटी हो परखती भावना कोसावनों को देख पत्ते वृक्ष से लग जायें झड़नेसौंप जो मिट्टी गई थी होंठ को भाषायें कोमलआज अपनी अस्मिता खोकर अनामिक हो गई हैशब्द कोशों से उधारी माँगती हो बात अपनेअर्थ को,हर व्याख्याके के पृष्ठ लगती हो पलटनेउलझनों के चक्रच्यूहों में घिरी संवेदना केदेख कर अपनी दशायें अश्रु ही रह पायें झरनेजान लेना तब हमारी उम्र की उपलब्धियों कोआज की पीढ़ी उठा ले ताक पर जा धर गई है

सुरभित इस मन का वृन्दावन

काजल की कजराई में जब डूबे कलम कल्पनाओं कीहस्ताक्षर उस घड़ी उर्वशी कर देती है मुस्कानों मेंअलकों में आ गुँथ जाते हैं मेघदूत वाले सन्देसेवाणी सरगम बन जाती है वंसी से उठती तानों मेंशतरूपे !-तुम दूर सदा ही हो भाषा की सीमाओं सेकर देता है निमिष ध्यान का, सुरभित इस मन का वृन्दावनयुग के महाकाव्य अनगिनती, अंकित आकाशी अक्षों मेंदृष्टि किरण से अनुबन्धित हो, सृष्टि प्रलय पलकों में बन्दीचितवन में चित्रित सम्मोहन के सब मंत्र मेनका वालेसांसों के कोमल स्पर्शों से, मलय वनों को मिले सुगन्धीकलासाध्य हर एक कला की तुम ही केवल एक उपासितचित्रकारिता हो नर्तन हो, हो गायन हो अथवा वादनकाल-सन्धि पर बने हुये हैं शिल्प एक तुमको ही अर्पितमीनाक्षी कोणार्क अलोरा, ताजमहल, सांची खजुराहोरंग कूचियों की अभिलाषा खींचें चित्र तुम्हारे ही बसशिलाखंद की यही कामना, मूर्ति तुम्हारी में ढलता होमृगनयने !हर काव्य कहानी और लेख का लख्श्य तुम्हीं बसशब्द शब्द पर भाव भाव पर रहा तुम्हारा ही आच्छादन