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Showing posts from November, 2011

पढ़ कर सुनाये गुनगुनाते

पृष्ठ पर किसने हवा के याद के कुछ गीत लिख करपांखुरी से कह दिया पढ़ कर सुनाये गुनगुनातेजलतरंगों से सिहरती धार की अवलोड़ना मेंहो रही तट की प्रकम्पित सुप्त सी अवचेतना मेंझाड़ियों पर टँक रही कंदील में जुगनू जलाकरसांझ को ओढ़े प्रतीची के अधर पर स्मित जगा करकौन है जिसने उड़ाकर बादलों की चादरों कोबून्द को सन्देश भेजा द्वार पर अपने बुलातेदोपहर में ओक-मेपल के तले इक लम्ब खींचेकौन पल भर के लिये आकर रुका है आँख मींचेफ़ेंकता है कौन पासे धूप से बाजी लगाकररंग भरता है धुंधलके में अजाने कसमसाकरडालता है कौन मन की झील में फ़िर कोई कंकरतोड़ता है इन्द्रजाली स्तंभनों को हड़बड़ातेएक पल लगता उसे शायद सभी पहचानते हैंऔर है मनमीत यह भी बात सब ही जानते हैंकिन्तु दूजे पल बिखरते राई के दानों सरीखाछूट जाता हाथ से पहचान पाने का तरीकाप्रश्न यह अनबूझ कब से सामने लटका खड़ा हैऔर हल कर पायें रहतीं कोशिशें बस छटपटाते

तीन देवों का आशीष तीनों दशक

तीन देवों का आशीष तीनों दशकहर दिवस था सुधा से भरा इक चषकहर निशा स्वप्न के पुष्प की क्यारियाँभोर निर्झर घने रश्मियों के अथकआज इस मोड़ पर याद आने लगेऔर पल झूम कर गुनगुनाने लगेदीप के साथ जलती अगरबत्तियांधूप,तुलसी प्रसादी कलश नीर केक्षीर का सिन्धु,गोकुल दधी के कलशपात्र छलके हुए पूनमी खीर केचन्दनी शीत मं घुल हिनाई महककेवड़ों में भिगोते हुए वेणियाँकामनाओं की महकी हुई रागिनीमंत्र पूरित स्वरों की पकड़ उंगलियाँआज जैसे विगत छोड़ आये निकटऔर फिर बांसुरी सी बजाने लगेदोपहर ला खिलाती रही पंथ मेंफूल गमलों में बो सुरमई सांझ केसांझ ने ओढ़नी पर निशा की रखेचिह्न दीपित हुये एक विश्वास केमानसी भावना ताजमहक्ली हुईधार रंगती रही नित्य परछाईयाँसांस की रागिनी प्रीत की तान परछेड़ती थी धुनें लेके शहनाईयांदृश्य वे सब लिये हाथ में कूचियाँचित्र फिर कुछ नये आ बनाने लगेएक आवारगी को दिशा सौंप करवाटिकायें डगर में संवरती रहींध्येय की फूलमालाओं को गूँथतीभोर अंगनाई में आ विचरती रहीपल के अहसास की अजनबी डोर नेनाम अपने लिये इक स्वयं चुन लियाथे बिखरते रहे झालरी से फिसलभाव ,मन ने उन्हें सूत्र में बुन लियादृष्टि के दायरे और विस्तृत हु…

लिखा था तुमने खत में.

आये वे पल यादअचनक बहुत दिनों के बादचले थे चार कदम तुम साथएक अनजाने पथ में

सपनों के प्याले फिर से लग गये छलकनेआशाओं के पंछी लगे गगन में उड़नेमहक भर गई नये दिवस की आ सांसों मेंरजनीगंधा दोपहरी में लगी महकने

होंठ पर आया था जब नामहँसी थी यमुना तट पर शामथिरकने लगे नृत्य में पांवउस घड़ी वंशीवट में

सौगंधों की रेशम डोरी फिर लहत्राईपीपल पत्रों ने सारंगी नई बजाईमंदिर की चौखट पर संवरीं वन्दन्वारेंअम्बर ने थी पिघली हुई विभा बरसाई

लगे थे बजने मधुरिम गीतउमड़ती थी हर पग में प्रीतगये हैं एकाकी पल बीतलिखा था तुमने खत में.

समय चक्र की फिर परिवर्तित गति आवाराजो धो गई ह्रदय का सजा हुआ चौबाराबहती हुई हवा ने मिलन बांसुरी पर जबडूबा हुआ विरह में ही हर राग संवारा

अटक कर रही नजर उस मोड़ गया था मन को कोई झिंझोड़ चले तुम गए मुझे थे छोड़चढ़े फूलों के रथ में

पत्थरों के देवता पे कुछ असर हुआ नहीं

अर्चना के दीप नित्य अनगिनत जलाए थेप्रार्थना के गीत  भोर सांझ   गुनगुनाये थे शीश टेकते रहे थे चौखटों पे भोर सांझ भक्ति में डुबो के फूल पांव पर चढ़ाए थे पत्थरों के देवता पे कुछ असर हुआ नहींहम जहां थे बस वहीं अड़े हुए ही रह गए

अंत हो सका नहीं है रक्तबीज आस काछिन्न हो गया अभेद्य जो कवच था पास कावक्त हो पुरंदरी खडा हुआ आ द्वार परकुण्डलों को साध के वो ले गया उतार कर लेन देन का हिसाब इस तरह हुआ कि हमदान तो दिये परन्तु हो ऋणी ही रह गये

ढूँढ़ते जिसे रहे हथेलियों की रेख मेंवो छुपा हुआ रहा सदा ही छद्म वेश मेंहम नजर के आवरण को तोड़ पर सके नहींअपने खींचे दायरों को छोड़ पर सके नहींदिवासपन मरीचिकाओं से बने थे सामनेएक बार फिर उलझ के हम वहीं ही रह गए

प्रश्न थे हजार पर न उत्तरों की माल थीज़िंदगी से जो मिली, वो इस तरह किताब थीहल किये सवाल किन्तु ये पता नहीं चलाकौन सा सही रहा, है कौन सा गलत रहा जांचकर्ता मौन ओढ़ कर अजाने ही रहेअर्थ कोशिशों के घोष्य बिन हुए ही रह गए