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Showing posts from June, 2011

मौसमों की रहीं चिट्ठियाँ सब फ़टी

एक पल चाँदनी की किरन साथ थीदूसरे पल घटा घिर उसे पी गईपीर नयनों की तकली पे कतते हुएसूत बन कर अधर की कँपन सी गईचिह्न सब कंठ की राह के मिट गयेस्वर भटकता रहा बन पतंगे कटीकुछ न अनुकूल था जो मिला सामनेमौसमों की रहीं चिट्ठियाँ सब फ़टीजितने सन्देश उत्तर को भेजा कियेउनके उत्तर सुनाती रही दक्षिनीकोई कारण समझ में नहीं आ सकाहो गई क्यों स्वयं से स्वयं अनबनीदूर फ़ैले हुए दृष्टि के व्योम परचित्र बनते संवरते बिगड़ते रहेकोई अहसास उंगली छुड़ाता रहापग दिशाहीन थे, किन्तु चलते रहेनीड़ पाथेय संध्या उगी भोर सबरह गये अर्थ के अर्थ में ही उलझराह की दूरियों का कहाँ अन्त हैऔर उद्गम कहाँ,आ सका न समझधूप को पी गई,दोपहर जब हुईपास में रह गई धुन्ध ही बस घनीकोई कारण समझ में नहीं आ सकाहो गई क्यों स्वयं से स्वयं अनबनीश्याम विवरों में खोते सितारे सभीलेख लिख भी नहीं पा सके भाल कारात की कोठरी में सिमट रह गयाएक निर्णय, दिवस के लिये,काल काराशियों ने रखे पांव घर में नहींअंक गणनाओं के शून्य में खो गयेजो फ़लित पल हुए,वे विजन ही रहेऔर जो शेष थे, हाथ से खो गयेकालिखों ने जकड़ पाश में रख लियेरंग चन्दन के कल तक रहे कंचनीकोई कारण समझ में नही…

हम कुशल क्षेम के पत्र लिखते रहे

आंसुओं में घुली पीर पीते हुएहम कुशल क्षेम के पत्र लिखते रहे एक पल के लिए भी न सोचा कभीहम व्यथाएं किसी और से जा कहें सांत्वना के हवाओं को आवाज़ दें फिर गले से लिपट साथ उनके बहेंहोंठ ढूंढें कोई अश्रु पी जाए जोकोई कान्धा,जहां शीश अपना रखें कोई अनुग्रह,अपेक्षाओं के डोर सेथाम कर हाथ में साथ बांधे रखें पंथ ही ध्येय माने हुए रख लियात्याग विश्रांति पल,नित्य चलते रहे भीड़ मुस्कान के साथ चलती सदाअश्रु रहता अकेला,यही कायदाइसलिए ढांप कर अश्रु अपने रखे था प्रकाशन का कोई नहीं फ़ायदा कारुनी द्रष्टि जो एक पल हो गईदूसरे पल विमुख ज्ञात हो जायेगी और फिर से स्वयं को ही इतिहास के अनवरत हो कहानी ये दुहारायेगी मंडियों में उपेक्षित हुए शूल हैंफूल ही सिर्फ दिन रात बिकते रहे

उस पल यादों के कक्षों के

लिखते हुए दिवस के गीतों को जब थकीं रश्मि की कलमें
एक लगी ठोकर से बिखरी दावातों की सारी स्याहीसिंदूरी हो गई प्रतीची ने लिख दिया आख़िरी पन्नाप्राची पर रजनी के आँचल की आ परछाई लहरेउस पल यादों के कक्षों के वातायन खुल गए अचानकऔर तुम्हारे साथ बिठाये क्षण सरे जीवंत हो गए
अमलतास की गहरी छाया गुलमोहर के अंगारों में जंगल के तट से लग बहती नदिया के उच्छल धारों में विल्व-पत्र पर काढ़े स्वस्ति के चिन्हों की हर इक रेखा मेंइतिहासों के राजमहल के लम्बे सूने गलियारों मेंसमय तूलिका ने जितने भी चित्रित किये शब्द के खाकेसुधियों के पन्नों पर अंकित हुए, प्रीत के ग्रन्थ बन गए
झुकी द्रष्टि पर बनी आवरण पलकों कजी कोरों पर ठहरेमन की गहराई से निकले डूब प्रीत में भाव सुनहरेलिखते हुए चिबुक पर उंगली के नख से नूतन गाथाएंसिरहाना बन गई हथेली की रेखाओं में आ उतारेअनचीन्ही इक अनुभूति के समीकरण वे उलझे उलझे एक निमिष में अनायास ही जन्मों के अनुबंध हो गए
जहां मोड़ पर ठिठक गए थे पाँव कहारों के ले डोलीजिन दहलीजों पर अंकित थी, शुभ शुभ श्गागुन लिए रंगोलीपायल के गीतों से सज्जित रहती थी इक वह अंगनाईजहाँ नीम की शाखाओं पर सुबह साँझ च…

संप्रेषणों में शब्द की सीमा

कभी अनुभूति के संप्रेषणों में शब्द की सीमाअजाने ही अचाहा भाव का कुछ अर्थ कर देतीबदलती सोच की परछाईं में उलझी हुई सुधियांअपेक्षित जो नहीं होता वही ला गंध भर देती

हुये जब दायरे सीमित हमारी चेतनाओं केन कहना जान पाते हम न सुनना जान पाते है

उमड़ते अश्रुओं के भाव जब जब शब्द में ढलतेतो शब्दों को भी निश्चित ही हुई अनुभूत पीड़ायें मगर हर शब्द का धीरज, सहन की शक्तिइ अद्भुत हैकिया बिलकुन न उन सब ने व्यथा अपनी जता जायें

दिये भाषाओं ने जो ज्ञान के मुट्ठी भरे मोतीवे बिंधतेतो हैं, माला में नहीं सम्मान पाते हैं

निरन्तर जो बहे झरने द्रवित हो शैल से मन केउन्हीं में खो गये हैं धार के खनके हुये नूपुरतटी की दूब ने सारंगियाँ बन तान जो छेड़ींरहा अवरोह में उनके भटकता कंठ का हर सुर

गयी सौंपी करों में ला हमारे एक जो वीणानहीं संगीत रचते ,तार केवल झनझनाते हैं