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Showing posts from March, 2011

अधलिखी कोई रुबाई गुनगुनाता जा रहा हूँ.

बन्द द्वारे से पलट कर लौट आते स्वर अधर के
दॄष्टि के आकाश पर आकर घिरीं काली घटायें
थाम कर बैठे प्रतीक्षा को घने अवरोध के पल
लीलने विधु लग गया है आज अपनी ही विभायें
किन्तु मैं दीपक जला कर आस की परछाईयों में
अधलिखी  कोई रुबाई गुनगुनाता जा रहा हूँ.

सिन्धु मर्यादाओं के तट्बन्ध सारे तोड़ता साबिछ रहा आकाश आकर के धरा की पगतली मेंराजपथ को न्याय के जो पांव आवंटित हुए थेरह गये हैं वे सिमट कर के कुहासों की गली में

किन्तु मैं निज को बना कर यज्ञकुंडों की लपट सादर्पणों में साध के बस झिलमिलाता जा रहा हूँ

उत्तरों की सूचियों का नाम लेकर प्रश्न बैठेदोपहर ने ढूँढ ली है छांह निशि की चूनरी मेंरक्तवर्णी पंकजों के पात सारे झर चुके हैंआज  मणियाँ हो गईं मिश्रित  समर्पित घूघरी में
और मैं भटके हवा की डोर में अटके तृणों साबिन किसी कारण कोई गाथा सुनाता जा रहा हूँ
हैं उजालों के मुखौटे ओढ़ कर आते  अंधेरेदे रहा इतिहास रह रह दंश अनगिनती दिवस कोवे अधर जो जल चुके हैं एक दिन पय स्पर्श पाकरचाहते तो हैं नहीं पर थामते प्याला विवश हो
और मैं धुंधलाये पन्ने धर्मग्रंथों के उठाकरदिन फ़िरेंगें, ये दिलासा ही दिलाता जा रहा हूँ
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चैतिया सारंगियां अब लग गईं बजने

हवा में गन्ध आकर कोई मोहक लग गई घुलनेक्षितिज पर बादलों के बन्द द्वारे लग गये खुलनेधरा ने श्वेत परदों को हटा कर खिड़कियाँ खोलींगमकती ओस से पाटल कली के लग गये धुलने

नगर से मौसमों के दूर जाता है शिशिर का रथपुलकती चैतिया सारंगियां अब लग गईं बजने

लगे हैं कुनमुनाने पालने में शाख के पल्लवहुआ आरम्भ फ़िर से पाखियों का भोर में कलरवउठी है कसमसाकर, धार नदिया की लगी बहनेहवा को चूम पाना दूब को होने लगा सम्भव

अंगीठी सेक कर पाने लगी है धूप अब गरमीबगीचे के सभी पौधे चढ़ा आलस लगे तजने

लगा है धूप का साम्राज्य विस्तृत और कुछ होनेसिमटने लग गया है अब निशा के नैन का काजलसँवरने लग गये पगचिह्न निर्जन पंथ पर फिर सेविचरते हैं गगन में दूध से धुल कर निखर बादल

लगीं लेने उबासी तलघरों में सिगड़ियां जलतींउठे कम्बल स्वयं को लग पड़ें हैं ताक पर धरने

वह हो गया स्वयं परिभाषित

यद्यपि कर न सका है ये मनकभी समय की परिभाषायेंसाथ तुम्हारे जो बीता हैवह हो गया स्वयं परिभाषित

उगी भोर जब अँगनाई मेंपाकर के सान्निध्य तुम्हाराशहदीले हो गये निमिष सबपल पल ने छेड़ी बाँसुरियाकिरन तुम्हारे दर्शन का पापारस परस, सुनहरी हो लीफूलों पर लाकर उंड़ेल दीनभ ने ओस भरी गागरिया

प्राची ने खिड़की के परदेहटा निहारा जब नदिया कोलहर लहर में गोचर तब थीसिर्फ़ तुम्हारी छवि सत्यापित

अरुणाई हो जाती बदरी  पाकर परछाईं कपोल कीपहन  अलक्तक के गहने को संध्या हुई और सिन्दूरीसुईयाँ सभी घड़ी की उस पलभूल गईं अपनी गति मंथरनिर्निमेष हो अटक गई, तयकर न सकी सूत भर दूरी

अनायास ही चक्र समय काठिठक रहा तुमको निहारताचित्र दृष्टि ने खींच दिया जोनहीं स्वप्न में था अनुमानित

आस का पात्र बस झनझनाता रहा

दिन उगा,ढल गया,रात आई,गईसाँस का कर्ज़ बढ़ता ही जाता रहा
काल के चक्र से बँध गये थे कदमएक क्षण के लिये भी कहीं न रुकेनीड़ विश्रान्ति को था कहीं पर नहींअनवरत चल रहे पांव हारे थकेपंथ पाथेय में राह देता रहाधुन्ध में डूब गन्तव्य ओझल रहादृष्टि छू न सकी दूर फ़ैला क्षितिजभार पलकों का कुछ और बोझल रहा

इक भुलावा कि गति ज़िन्दगी से बँधी
फ़िर भ्रमित कर हमें मुस्कुराता रहा

शेष होते दिवस की खड़ी  सांझ लेअपने हाथों में बस आरती के दियेहर सुबह की उगी धूप ने हर घड़ीये छलावे हमें भेंट में ला दियेमरुथली मेघ थे छत डगर की बनेधूप जलती रही जेठ को ओढ़करऔर हम कैद से मुक्त हो न सकेअपनी खंडित धरोहर का भ्रम तोड़कर

सीढ़ियों से निराशा की गिरते हुएआस का पात्र बस झनझनाता रहा

हाथ जोड़े हुए शीश अपना झुकाहम समर्पण किये जब हुए थे खड़ेतो विदित हो गया साये अब हो गयेअपनी सीमाओं से कुछ अधिक ही बड़ेभीख मिल न सकी इसलिये, झोलियाँएक संकोच में खुल न पाईं कभीऔर झूठे हुए दम्भ दीवार बनएक दिन के लिये भी झुके न कभी

शून्य फ़ैली हथेली की रेखाओं परअपना हल लाके फिर फिर चलाता रहा

चाँदनी का नहीं कोई उल्लेख थाशब्द के कोष जितने रहे पास में
ओस की बून्द भी एक घुल न सक…

रात आई थी मगर आई उबासी लेती

हमने पट नैन के हर रोज खुले छोड़े हैंचाँदनी रात नये स्वप्न लिये आयेगीहोठ की गोख पे डाली नहीं चिलमन हमनेकोई सरगम ढली शब्दों में उतर आयेगीआस खिड़की पे खड़ी दिल की, गगन से आकरकोई बदली किसी पाजेब से टकरायेगीऔर तारों की किरन पर से फ़िसलती यादेंबूँद बरखा की लिये साथ चली आयेंगीगुनगुना उठेंगी कमरे में टँगीं तस्वीरेंपाँव क अलते को छू देहरी सँवर जायेगीकोई धानी सी चु्नर हाथ हवा का पकड़ेमेरी आंखों के दहाने पे लहर जायेगी

मगर ये हो न सका, स्वप्न नहीं लाई थीरात आई थी मगर आई उबासी लेतीपंथ फ़ागुन ने बुहारा था राग गाते हुएबात उसकी न समझ पाई, रही चुप चैतीऔर पाजेब के घुँघरू भी गये टूट बिखरतान बदली ने सुनाई तो झनझनाये नहींपाहुने यूँ तो बहुत द्वार पे आ आ के रुकेजिनकी चाहत रही दहलीज को, वे आये नहीं

पाहुने आये नहीं मांग लिये सूनी सीदेहरी बैठी ही रहीं श्वेत पहन कर साड़ीआज भी ताकती हैं सूनी कलाई उसकीएक कंगन ने जो चूनर पे बूटियाँ काढ़ीं