वहीं वापिस बुलाने को

तुम्हारे गीत जो पुरबाईयां आकर सुनाती थीं
तुम्हारा चित्र नभ में जो बदरिया आ बनाती थी
तुम्हारा नाम जो तट को नदी आकर सुनाती थी
वो कलियाँ जो तुम्हारी छाँह पाकर मुस्कुराती थीं
मेरी सुधियों के आँगन में समन्दर पार कर करके
अचानक आ गईं, मुझको वहीं वापिस बुलाने को
 
जहाँ पर भावनाओं की सदा गंगा उमड़ती है
जहाँ पर भोर के संग रागिनी नूतन मचलती है
जहाँ पर गंध के झोंके तुम्हारी बात करते हैं
जहाँ अपनत्व की भाषा बिना शब्दों सँवरती है
जहाँ की वाटिकाओं के गुलाबों की यही आशा
तुम्हारे कुन्तलों में गुँथ सकें, जूड़ा सजाने को
 
मिला था पथ तुम्हारा राह मेरी से जहाँ आकर
जहाँ फ़ूटा अधर से था प्रथम परिचय रँगा आखर
जहाँ दस उंगलियों ने छू लिया था एक पुस्तक को
जहाँ झेंपी निगाहें,रह गये थे होंठ मुस्का कर
जहाँ पर उम्र के उस गांव की चौपाल रहती है
प्रतीक्षा में, कोई आये नया किस्सा सुनाने को
 
जहाँ पीपल तले अब भी शपथ जीवन्त होती है
जहाँ अब भी चुनरिया उंगलियों का बन्ध होती है
जहाँ पर दॄष्टि करती है नये इक ग्रंथ की रचना
जहाँ की रीत में पदरज सिरों पर धार्य होती है
जहाँ पर आस्थायें प्राण का संचार कर अब भी
बनाती ईश पत्थर को, सहज ही सर नवाने को

Comments

जहाँ पर आस्थायें प्राण का संचार कर अब भी
बनाती ईश पत्थर को, सहज ही सर नवाने को

इसी आस्था के प्रवाह में बहता संसार।
Udan Tashtari said…
जहाँ पर उम्र के उस गांव की चौपाल रहती है
प्रतीक्षा में, कोई आये नया किस्सा सुनाने को

भाई जी, अद्भुत!! आनन्द आ गया...
***Punam*** said…
जहाँ पर भावनाओं की सदा गंगा उमड़ती है
जहाँ पर भोर के संग रागिनी नूतन मचलती है

बहुत सुन्दर.....
Shardula said…
टेरता है कोई फिर उस पार के मेरे सवेरे

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