Monday, October 10, 2011

वहीं वापिस बुलाने को

तुम्हारे गीत जो पुरबाईयां आकर सुनाती थीं
तुम्हारा चित्र नभ में जो बदरिया आ बनाती थी
तुम्हारा नाम जो तट को नदी आकर सुनाती थी
वो कलियाँ जो तुम्हारी छाँह पाकर मुस्कुराती थीं
मेरी सुधियों के आँगन में समन्दर पार कर करके
अचानक आ गईं, मुझको वहीं वापिस बुलाने को
 
जहाँ पर भावनाओं की सदा गंगा उमड़ती है
जहाँ पर भोर के संग रागिनी नूतन मचलती है
जहाँ पर गंध के झोंके तुम्हारी बात करते हैं
जहाँ अपनत्व की भाषा बिना शब्दों सँवरती है
जहाँ की वाटिकाओं के गुलाबों की यही आशा
तुम्हारे कुन्तलों में गुँथ सकें, जूड़ा सजाने को
 
मिला था पथ तुम्हारा राह मेरी से जहाँ आकर
जहाँ फ़ूटा अधर से था प्रथम परिचय रँगा आखर
जहाँ दस उंगलियों ने छू लिया था एक पुस्तक को
जहाँ झेंपी निगाहें,रह गये थे होंठ मुस्का कर
जहाँ पर उम्र के उस गांव की चौपाल रहती है
प्रतीक्षा में, कोई आये नया किस्सा सुनाने को
 
जहाँ पीपल तले अब भी शपथ जीवन्त होती है
जहाँ अब भी चुनरिया उंगलियों का बन्ध होती है
जहाँ पर दॄष्टि करती है नये इक ग्रंथ की रचना
जहाँ की रीत में पदरज सिरों पर धार्य होती है
जहाँ पर आस्थायें प्राण का संचार कर अब भी
बनाती ईश पत्थर को, सहज ही सर नवाने को

4 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

जहाँ पर आस्थायें प्राण का संचार कर अब भी
बनाती ईश पत्थर को, सहज ही सर नवाने को

इसी आस्था के प्रवाह में बहता संसार।

Udan Tashtari said...

जहाँ पर उम्र के उस गांव की चौपाल रहती है
प्रतीक्षा में, कोई आये नया किस्सा सुनाने को

भाई जी, अद्भुत!! आनन्द आ गया...

***Punam*** said...

जहाँ पर भावनाओं की सदा गंगा उमड़ती है
जहाँ पर भोर के संग रागिनी नूतन मचलती है

बहुत सुन्दर.....

Shardula said...

टेरता है कोई फिर उस पार के मेरे सवेरे