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Showing posts from October, 2011

रँगी निशा की कजरी चूनर

पावस के जाने पर प्राची में ज्यों किरण भोर की निखरे जैसे गंगा की लहरों पर संध्याओं में सोना बिखरे आवाज़ें उठ रहे शोर की ढल जायें ज्यों जलतरंग में विधना कहे द्वार पर आकर,अपना भाग्य स्वयं तू लिख रे कुछ ऐसी अनुभूति संचयित होने लगी मेरी निधियों में मेरे नयनों के आँगन में आ जब सँवरे चित्र तुम्हारे पारिजात की कोमल गंधों ने गुलाब की रंगत लेकर शहदीली भाषाओं ने रससिक्त व्याकरण में सज धज कर देहरी पर अगवानी में आ,सात रंग से रँगी अल्पना धोने लगे पंथ अम्बर से घड़े नीर के छलक छलक कर संध्या ले सिन्दूर,भोर ले कंकुम आतुर हुईं प्रतीक्षित पहले कौन तुम्हारा पाकर परस स्वयं का रूप सँवारे चन्दा ने पिघली चाँदी से रँगी निशा की कजरी चूनर मंगल दीप जला मंदिर ने खोले स्वत: बन्द अपने पट शहनाई ने गीत सुनाये,अलगोजे से तान मिलाकर भाव सिक्त बह रही हवा के कँपने लगे अधर रह रह कर रहे ताकते ध्यान केन्द्र कर,फूल पत्तियां,सुरभि वाटिका मुस्कानों से भीगी वाणी,किसे तुम्हारी प्रथम पुकारे आशा ने छू पाजेबों की रुनझुन को फिर ली अंगड़ाई पथ गुलाब का पाटल होने लगा तुम्हारी छू परछाईं चिकुरों पर से फिसल थिरकती किरणों ने कर दिया उजाला लिखने लगा शब्द ही नूतन …

रोशनी चारदीवारियों में न सीमित रहे

दीप दीपावली के जलें,रोशनी
चारदीवारियों में न सीमित रहे
मन में खुशियों की उमड़ी हुई नर्मदा
तोड़ तटबन्ध सब,वीथियों में बहे

पंथ जिनको कभी अपने भुजपाश में
मानचित्रों ने बढ़ न सहारे दिये
जिनपे बिखरी हुई बालुओं के कणों
के प्रतीक्षाऒं में जल रहे हैं दिये
जिनसे परिचय नहीं प्राप्त कर पाये हैं
एक पल के लिये भी कदम आपके
दृष्टि में अपनी पाले हुये शून्यता
रह गये दूर हर एक आभास से

उन पथों की प्रतीक्षाओं का अन्त है
इस दिवाली पे स्वर आपका यह कहे
दीप दीपावली के जलें,रोशनी
चारदीवारियों में न सीमित रहे

दीप की ओट में छुप के जीता रहा
और सहसा ही  तन कर खड़ा हो गया
वह  तिमिर, एक झपकी पलक पर चढ़ा
और आकाश से भी बड़ा हो गया
इससे पहले कि वह और विस्तार ले
आप के,देश के,काल के भी परे
आओ प्रण लें कि इस वर्ष मिल हम सभी
उसके आधार के काट फ़ेंकें सिरे

खोखली नींव पर, रावणी दंभ का
शेष प्रासाद, इस ज्योति को छू ढहे
दीप दीपावली के जलें,रोशनी
चारदीवारियों में न सीमित रहे

उंगलियाँ जब उठायें बताशा कोई
याकि मुट्ठी कोई भी भरे खील से
फुलझड़ी की चमक हाथ में झिलमिले
रोशनी बात करती हो कंदील से
उस घड़ी ये न भूलें,कई हाथ हैं
जिनको इनका कभी भी …

शारदा के कमल पत्र से गीतकलश पर झरी चारसौपचासवीं बूँद

कुछ भी तो नहीं बदला. सूरज आज भी आधी सुबह तक बादलों से ढका हुआ था.वादी में आज भी कोहरा उतरा हुआ था ,ट्रेफ़िक की भीड़ उसी गति से बढ़ रही थी और कैलेन्डर ने वैसे ही प्याज के छिलके की तरह एक और दिन उतार कर रख दिया था अलार्म उसी समय बोला था और दिनचर्या भी पिछले सप्ताह की कार्बन कापी बन कर रह गई थी पर फिर भी कुछ एक अजीब सा अहसास मन को घेरे हुए था. काफ़ी देर असमंजसों से जूझने के बाद भी कुछ हासिल न हुआ तो माँ शारदा के श्री चरणों में सर झुका कर उनके कमल पत्र से एक बूँद चुन ली. वह बूँद गीत कलश पर कमल पत्र से उतरी हुई चारसौपचासवीं बूँद---आपके समक्ष प्रस्तुत है:-



आज फ़िर से लग गया है प्रश्न करने मन स्वयं से प्राप्ति का संचय भला है किसलिये इतनी उदासी

तय किये कितने समन्दर रोशनी की आस लेकर मिल गये कितने मरुस्थल पास का मधुमास देकर पथ विजन की शून्यता ने, जड़ गये पगचिह्न जैसे रिक्तता के फल समेटे,नीड़ में निर्वास लेकर

उड़ गये संकल्प होकर के धुंआसे आंधियों में ज़िन्दगी हो रह गई बस वेद की अन्तिम ॠचा सी

मोड़ यह कैसा जहाँ पर घुल गईं हैं सब दिशायें सोख लेता है गगन हर रात में बिखरी विभायें मंदिरों मे शयन पल के जल रहे अंतिम दिये सी …

वहीं वापिस बुलाने को

तुम्हारे गीत जो पुरबाईयां आकर सुनाती थीं तुम्हारा चित्र नभ में जो बदरिया आ बनाती थी तुम्हारा नाम जो तट को नदी आकर सुनाती थी वो कलियाँ जो तुम्हारी छाँह पाकर मुस्कुराती थीं मेरी सुधियों के आँगन में समन्दर पार कर करके अचानक आ गईं, मुझको वहीं वापिस बुलाने को जहाँ पर भावनाओं की सदा गंगा उमड़ती है जहाँ पर भोर के संग रागिनी नूतन मचलती है जहाँ पर गंध के झोंके तुम्हारी बात करते हैं जहाँ अपनत्व की भाषा बिना शब्दों सँवरती है जहाँ की वाटिकाओं के गुलाबों की यही आशा तुम्हारे कुन्तलों में गुँथ सकें, जूड़ा सजाने को मिला था पथ तुम्हारा राह मेरी से जहाँ आकर जहाँ फ़ूटा अधर से था प्रथम परिचय रँगा आखर जहाँ दस उंगलियों ने छू लिया था एक पुस्तक को जहाँ झेंपी निगाहें,रह गये थे होंठ मुस्का कर जहाँ पर उम्र के उस गांव की चौपाल रहती है प्रतीक्षा में, कोई आये नया किस्सा सुनाने को जहाँ पीपल तले अब भी शपथ जीवन्त होती है जहाँ अब भी चुनरिया उंगलियों का बन्ध होती है जहाँ पर दॄष्टि करती है नये इक ग्रंथ की रचना जहाँ की रीत में पदरज सिरों पर धार्य होती है जहाँ पर आस्थायें प्राण का संचार कर अब भी बनाती ईश पत्थर को, सहज ही सर नवाने को

निश्शब्द ही होकर खड़ा हूँ

क्योंकि लिखने के लिये अब शेष कुछ भी तो नहीं है कोष में थे शब्द जितने, हो चुके हैं खर्च सारे भावनाओं की धरा पर बूँद तो बरसें निरन्तर किन्तु जितने बीज बोये, रह गये हैं सब कुँआरे इसलिये मैं मौन प्रतिध्वनियाँ समेटे अंजुरी में आपके आ सामने निश्शब्द ही होकर खड़ा हूँ थे दिये बहती हवाओं ने मुझे पल पल, निमंत्रण उंगलियाँ अपनी बढ़ाईं थाम कर उनको चलूँ मैं एक जो सदियों पुरानी ओढ़ रक्खी है दुशाला फ़ेंक कर उसको नया इक आवरण निज पर रखूँ मैं किन्तु मुझको बाँध कर जो एक निष्ठा ने रखा है मैं उसी के साथ चलने की लिये इक ज़िद अड़ा हूँ मुस्कुराती गंध भेजी थी बुलाने को कली ने छेड़ कर वंशी बुलाया था लहर ने गुनगुनाकर बादलों के कर हिंडोले व्योम ने भी द्वार खोले और मधुबन मोहता था घुंघरुओं को झनझनाकर किन्तु मैं अपनी विरासत में मिली कोई धरोहर को बना कर कील अपने आप में जमकर पड़ा हूँ खींचती है आज भी अनजान सी डोरी कहीं से बाँधने को आज फ़िर आतुर कोई है पांव मेरे सांझ की धुलती गली में सुरमई छींटे उड़ाता टेरता है कोई फिर उस पार के मेरे सवेरे किन्तु में अभिव्यक्ति की असमर्थता की शाख पर से भाव के निष्प्राण पत्तों की तरह फ़िर फ़िर झड़ा हूँ.