Monday, May 30, 2011

आवाज़ कोई द्वार आकर

हो गया विचलित अचानक सांझ में यह वावला मन
दे रहा है यूँ लगे,आवाज़ कोई द्वार आकर
 
देखता हूँ द्वार पर दहलीज पर है शून्य केवल
दूब को सहलायें ऐसे भी नहीं थिरकें हवायें
ओढ़ कर सूना अकेलापन बिछी पगडंडियाँ हैं
लौट आती हैं क्षितिज से रिक्त ही भटकी निगाहें
 
शान्त इस निस्तब्धता में किन्तु जाने क्यों निरन्तर
लग रहा सरगम सुनाती नाम कोई गुनगुनाकर.
 
शाख पर से झर बिखर कर रह गया है पर्ण अंतिम
शोषिता सिकता हुई है मौन अब होकर समर्पित
झाड़ियां तटबन्ध पर जैसे लिये बैठीं समाधी
छुप गईं जाकर क्षितिज के पार हर बदरी अचम्भित
 
रुद्ध तारों पर हुए हैं साज के गूँजे हुए स्वर
किन्तु लगता छुप रहा कोई मुझे रह रह बुलाकर
 

एक पल जो खींचता है डोरियां सुधि की सहज ही
शुष्क मरुथल में अचानक प्राण आकर सींचता है
हैं ललकती सिन्धु की उच्छल तरंगे बाँह भर लें
जो अचानक पीठ पीछे आ पलक को मींचता है
 

चाहता हूँ देख पाऊँ मैं उसे अपने नयन से
किन्तु रहता है घटा की ओट में छुप वह प्रभाकर

1 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

शब्दों का भावमयी उपवन।