न आया डाकिया अब तक ये दिन भी लग गया ढलने
असम्भव है, पता मुझको लिखा हो खत नहीं तुमने
न भेजा डाक से तुमने अगर तो किस तरह भेजा
लिखा था प्यार में डुबा मधुर जो एक सन्देशा
ह्रदय की बात को तुमने जो ढाला शब्द में लिख कर
मेरी नजरों की सीमा से अभी तक है वो अनदेखा
लगा है रोक रख रक्खा किसी उलझे हुए पल ने
असम्भव है, पता मुझको लिखा हो खत नहीं तुमने
कहा तुमसे था उड़ती हो हवा की लहरिया चूनर
तभी तुम शब्द लिख देना उमड़ती गंध भर भर कर
पड़ें जो पांखुरी पर भोर में आ ओस की बून्दें
तुम्हें लिखना है सन्देशा उन्हीं की स्याहियाँ कर कर
लगीं प्राची में अँधियारे की अब तो बूँद भी झरने
असम्भव है, पता मुझको लिखा हो खत नहीं तुमने
न छोड़ा है मेरी अँगनाई में पाखी ने ला कर पर
न कोई मेघ का टुकड़ा दिशा से आ सका चल कर
न आकर बोल ही पाया मेरी छत पर कोई कागा
न तारों ने उकेरा है कोई सन्देश अम्बर पर
मेरी आतुर प्रतीक्षा का न रीता घट सका भरने
असम्भव है, पता मुझको लिखा हो खत नहीं तुमने
ये संभव पत्र भेजा हो नयन की एक थिरकन ने
तरंगों में पिरोया हो विचारों के विलोड़न ने
मेरी नजरों की सीमा से परे ही रह गया कैसे
जो सन्देशा पठाया है किसी नूतन प्रयोजन से
लगी है चेतना मेरी उठी शंकाओं से लड़ने
असम्भव है,पता मुझको लिखा हो खत नहीं तुमने
Monday, January 10, 2011
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6 comments:
:)
अद्भुत लगा आपका यह मनवा लेना कि संदेशा तो भेजा ही है तुमने, प्रिये।
राकेश भाई...नमस्कार...क्या कहूँ...शब्द नहीं रहे मेरे पास इस अद्भुत रचना की प्रशंशा के लिए...आपकी रचनाएँ मुझे नतमस्तक कर देती हैं...विलक्षण भाषा और भाव गूंध देते हैं आप इनमें...आप सदा यूँ ही लिखते रहें...इश्वर से ये ही एक प्रार्थना करता हूँ...
चाह कर भी आपसे सीहोर आ कर नहीं मिल पाया...उम्मीद है क्षमा करेंगे...वैसे इसमें नुक्सान मेरा ही हुआ है...जिसकी भरपाई न जाने कब हो.
नीरज
... bahut badhiyaa !!
हमेशा की तरह:
अद्भुत!!
:)
ये संभव पत्र भेजा हो नयन की एक थिरकन ने
तरंगों में पिरोया हो विचारों के विलोड़न ने
मेरी नजरों की सीमा से परे ही रह गया कैसे
जो सन्देशा पठाया है किसी नूतन प्रयोजन से
प्रयोजन जैसे शब्द का भी गीत में आपने कितना बेहतरीन प्रयोग किया है...अद्भुत राकेश जी...आज की गीत भी बहुत भावपूर्ण ..बधाई..
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