तुम्हारा ही तो है न प्रियतम बोलो

चलते चलते दिन के रथ की गति जब धीमी हो जाती है
जलते हुए दीप ले आते पास बुला संध्या की बेला
लौटा करते थके हुए वनपाखी जब नीड़ों को अपने
जब हो जाता है एकाकी मन सहसा कुछ और अकेला


उस पल खोल क्षितिज की खिड़की, कजरारी चूनरिया ओढ़े
झांका करता चित्र तुम्हारा ही है क्या वो प्रियतम बोलो


कोहनी टिका खिड़कियों की सिल पर रख गाल हथेली अपने
निर्निमेष देखा करती हैं शरद चन्द्र की जिसे विभायें
जिसकी आंखों के काजल की हल्की सी कजराई पीकर
असमानी चूनर अम्बर की हो जाती सावनी घटायें


उसमें जो बूटा बन लिखती मचल मचल बिजली की रेखा
वह इक नाम तुम्हारा ही तो है न मुझको प्रियतम बोलो


दोपहरी पर अकस्मात जब छाने लगती गहन उदासी
अनबूझी चाहत को लेकर रह जाती हैं सुधियाँ प्यासी
आईने की धुंध सोख लेती है सारी आकॄतियों को
आने वाला हर पल लगता हो जैसे बरसों का बासी

भित्तिचित्र में संजीवित हो जो मुस्काता दॄष्टि थाम कर
वह इक बिम्ब तुम्हारा ही तो है न मुझको प्रियतम बोलो


समय पॄष्ठ पर कभी हाशिये पर जब कुछ पल रुक जाते हैं
शब्द अचानक अँगड़ाई ले ढल जाते हैं नूतन क्रम मे
भोज पत्र के सभी उद्धरण न्याय नहीं कर पाते हैं जब
और कथाओं के नायक भी पढ़ जिसको पड़ जाते भ्रम में


शिलालेख के हस्ताक्षर सा इतिहासों की छाप अमिट बन
जो अंकित है  नाम तुम्हारा ही तो है न प्रियतम बोलो

Comments

प्रेम से अनुरक्त व्यंजना।
padmsingh said…
अद्भुद !

मनोहर

प्रेमासिक्त
बहुत देर से पहुँचा पर जब तक आया नही था चैन नही मिल पा रहा था ..बार बार सोच रहा था कि आपकी कविताएँ नही जैसे कोई बहुत बड़ी चीज़ छूट रही हो..आज मन खुश हो गया...इस साल में पहली बार आप के ब्लॉग पर आ पाया....और वहीं गति,वहीं लय,और वहीं लाजवाब भाव.....अद्भुत रचना....इतनी बेहतरीन गीत के लिए धन्यवाद राकेश जी...प्रणाम

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