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Showing posts from December, 2010

सपने लिखते नयन पॄष्ठ पर

नयनों के कागज़ पर सपने लिखते आकर नित्य कहानी
नई स्याहियां नया कथानक, बातें पर जानी पहचानी

नदिया का तट, अलसाया मन और सघन तरुवर की छाया
जिसके नीचे रखा गोद में अधलेटे से प्रियतम का सर
राह ढूँढ़ती घने चिकुर के वन में उलझी हुई उंगलियां
और छेड़तीं तट पर लहरें जलतरंग का मनमोहक स्वर

और प्यार की चूनरिया पर गोटों में रँग रही निशानी

भीग ओस में बातें करती हुई गंध से एक चमेली
सहसा ही यौवन पाती सी चंचल मधुपों की फ़गुनाहट
नटखट एक हवा का झोंका, आ करता आरक्त कली का
मुख जड़ चुम्बन, सहसा बढ़ती हुई अजनबी सी शरमाहट

और मदन के पुष्पित शर से बिंधी आस कोई दीवानी

मांझी के गीतों की सरगम को अपने उर से लिपटाकर
तारों की छाया को ओढ़े एक नाव हिचकोले खाती
लिखे चाँदनी ने लहरों को, प्रेमपत्र में लिखी इबारत
को होकर विभोर धीमे से मधुरिम स्वर में पढ़ती गाती

सुधि वह एक, दिशाओं से है बाँट रही उनकी वीरानी

अर्थ हम ज़िन्दगी का न सम

अर्थ हम ज़िन्दगी का न समझे कभीदिन उगा रात आई निकलती रहीउम्र  थी मोमबत्ती जली सांझ कीरात के साथ लड़ते पिघलती रहीमुट्ठियाँ बाँध कर प्राप्त कर पायें कुछहाथ आगे बढ़े छटपटाते रहेजो मिला साथ, याचक बना था वहीआस सूनी निरन्तर कलपती रहीहम न कर पाये अपनी तरफ़ उंगलियाँदोष बस दूसरों पर लगाते रहेअपने दर्पण का धुंआ न देखा जराबस कथा तारकों की सुनाते रहेगल्प की सीढ़ियों पर चढ़ा कल्पनाहम नयन को सजाते रहे स्वप्न सेकर न पाये है श्रॄंगार मुस्कान काआंसुओं का ही मातम मनाते रहेबोध अपराध का हो न पाया कभीरश्मियां हमने खुद ही लुटाईं सदाभेजे जितने निमंत्रण थे मधुमास नेद्वार से हमने लौटा दिये सर्वदालौट आती रहीं रिक्त नजरें विवशशून्य में डूभ जाते क्षितिज से सदासान्त्वना का भुलावा स्वयं को दियाभाग्य में अपने शायद यही है बदा
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राग बासंती सुनाने आ रही है

ढूँढतीं हों उंगलियाँ जब पथ दुपट्टे की गली मेंपाँव के नख भूमि पर लिखने लगें कोई कहानीदृष्टि रह रह कर फिसलती हो किसी इक चित्र पर सेसांस में आकर महकने लग पड़े जब रातरानीतब सुनयने जान लेना उम्र की इस वाटिका मेंएक कोयल राग बासंती सुनाने आ रही है
फूल खिलते सब,अचानक लग पड़ें जब मुस्कुराने
वाटिकाएं   झूम कर जब लग पड़ें कुछ गुनगुनाने
झनझनाने लग पड़ें पाजेब जब बहती हवा की
और मन को लग पड़ें घिरती घटा झूला झुलाने

उस घड़ी ये जान लेना प्रीत की सम्भाशीनी तुम
कोई रुत छू कर तुम्हें होती सुहानी जा रही हैदेख कर छवि को तुम्हारी,लग पड़े दर्पण लजानेझुक पड़े आकाश,छूने जागती अँगड़ाइयों कोभित्तिचित्रों में समाने लग पड़े   आकाँक्षायेंशिल्प मिलने लग पड़े जब काँपती परछाइय़ों कोजान लेना तब प्रिये, नव भाव की जादूगरी अबकोई अनुभव इक नया तुमको कराने जा रही है.

आपके पाँव की झान्झारों से गिरी

चांदनी ओढ़ कर चांदनी रात में आप आये तो परछइयां धुल गईआपके पाँव की झान्झारों से गिरी जो खनक ,मोतियों में वही ढल गईभोर की वे  किरण दिन  पे ताला लगा,थी डगर पर गई सांझ की घूमनेआपको देखने की उमंगें संजो,रात की वे बनी  खिड़कियाँ खुल गईxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxnभोजपत्रों पे लिक्खे हुए मंत्र थे,ओस बन कर गिरे शतदली पत्र परशिव तपोभंग को एक उन्माद सा छा गया फिर निखरते हुए सत्र पर विश्वामित्री तपस्याएँ खंडित हुई आपकी एक छवि जो गगन में बनी आपका नाम बन सूर्य की रश्मियाँ हो गई दीप्तिमय आज   सर्वत्र पर