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Showing posts from October, 2010

होंठ पर कुछ यूँ ही थरथराता रहा

गीत गाने मचलती रही रागिनी
शब्द पर होंठ पर छटपटाता रहा

रात के चित्र में रंग भरते हुये
चाँद के हाथ से गिर गई तूलिका
कोई तारा प्रकाशित नहीं हो सका
चाँदनी ने लिखी थी नहीं भूमिका
दॄष्टि की हर किरन पी गया था क्षितिज
मोड़ पर आई नीहारिका खो गई
और मंदाकिनी के तटों में उलझ
रह गई जो चली पंथ में सारिका

फिर अँगूठा दिखा उग रही भोर को
खिलखिलाते हुए तम चिढ़ाता रहा

ज्योति को पत्र लिख कर बुलाते हुये
पास की रोशनाई सभी चुक गई
शब्द के शिल्प गढ़ते हुए लेखनी
चूर थक कर हुई दोहरी झुक गई
अर्थ सन्देश के सब बदल तो दिये
मेघ ने दोष माना नहीं है मगर
कुमकुमों से सजी पालकी जो चली
गांव की राह से भी परे रुक गई

राख जल कर हुई आस की वर्त्तिका
रंग उसका गगन को सजाता रहा

डोरियाँ खींचते थक गई उंगलियाँ
सामने से अवनिका हटी ही नहीं
दीर्घा मंच के मध्य में थी तनी
धुंध गहरी ज़रा भी छँटी ही नहीं
पात्र नेपथ्य में ही छुपे रह गए
और अभिनीत पूरी कहानी हुई
पीर की पूँजियाँ खर्च करते रहे
किन्तु निधि से ज़रा भी घटी ही नहीं

शब्द चादर दिलासों की ओढ़े हुए
आँख में स्वप्न फिर ला सजाता रहा

हो रहे सब दिवस-रात यायावरी
कोई गंतव्य लेकिन कहीं भी नही

जब मेंहदी से रची हथेली

तुमने अपने दोपट्टे को आज जरा सा लहराया तो
एक बदरिया अपने घर से घड़े सुरभि के भर कर चल दी

अनियंत्रित हो घूम रहे थे जब मधुवन में पांव तुम्हारे
कलियों के कानों में बन कर गीत ढला भंवरों का गुंजन
सरगम की तंत्री को झंकृत करते करते लगी नाचने
दूब, तुम्हारे कोमल पग की महावर का पाकर के चुम्बन

लटका ही रह गया शाख पर चंचल एक हवा का झोंका
भूल गया वह तुम्हें देखकर, अपने घर जाने की जल्दी

शांत झील के दर्पन में था उभरा आकर बिम्ब तुम्हारा
तो लहरों ने सिहर सिहर कर छेड़ी मधुरिम नीर तरंगें
हुए रंगमय और अधिक कुछ तितली के पंखों के बूटे
सारंगी    लग   गईं  बजाने    पोर   पोर   में   नई   उमंगें

और हुआ रक्ताभ, सांझ की दुल्हन का घुँघटाई चेहरा
जैसे लाली ले कपोल से अपने, तुमने उस पर मल दी

चिकुरों से काजल ले नभ ने अपने नयन किये कजरारे
काया की कोमलता लेकर खिले फूल हँसते सैमल के
अभिलाषाओं की इक गठरी अनायास खुल कर बिखराई
भाव पिरोने लगे ह्रदय में कुछ सपने फिर स्वर्ण कमल के.

और लगे अँजने आँखों में आ आ कर वे निमिष रजतमय
जब मेंहदी से रची हथेली पर चढ़ जाया करती हल्दी.

दो घूँट चाँदनी पी लें

तारों भरे कटोरे से दो घूँट चाँदनी पी लें
पिरो शांति के पल साँसों में, जरा चैन से जी लें


संध्या के आँचल पर टांकें नई कथा चौपालें
मल्हारों की चूनर ओढ़े गायें नीम की डालें
नव दुल्हन की तरह लजाती खेतों की बासन्ती
सोने के आभूषण पहने हुए धान की बालें


बिम्ब यही दिखलायें केवल नयनों वाली झीलें
तारों भरे कटोरे में से जरा चाँदनी पी लें


हवा गुनगुनी,धूप सुनहरी, बरगद की परछाईं
एक एक कर सहसा सब ही यादों में तिर आईं
पगडंडी पर गीत गुनगुनाती कोई पनिहारिन
घूँघट में से झाँका करती चेहरों की अरुणाइ


कहीं ले गईं इन्हें उड़ा कर गये समय की चीलें
तारों भरे कटोरे से कुछ आज चाँदनी पी ले

अम्मा के हाथों की रोटी,ताईजी की बड़ियाँ
नानीजी की टूटी ऐनक दादाजी की छड़ियाँ
जीजी की साड़ी के बूटे ,सलमा पोत सितारे
मुन्नी के सुर की सरगम में गूंजी बाराखड़ियाँ

सुधियों में फिर आज जल उठीं बन कर के कंदीलें
तारों भरे कटोरे से दो घूँट चाँदनी पी लें

आज फिर गाने लगा है गीत कोई

खुल गये सहसा ह्रदय के बन्द द्वारे
कोई प्रतिध्वनि मौन ही रह कर पुकारे
और सुर अंगनाईयां आकर बुहारे
आ गई फिर नींद से उठ आँख मलती रात सोई
आज फिर गाने लगा है गीत कोई


लग गई घुलने नई सरगम हवा में
शब्द ढूँढ़े होंठ पर ठहरी दुआ ने
गुत्थियों में रह गये अटके सयाने
सिन्धु से ले बादलों में धूप ने फिर बून्द बोई
आज फिर गाने लगा है गीत कोई


लग गये कुछ दीप अपने आप जलने
पल प्रतीक्षा के लगे सारे पिघलने
आज को आकर सजाया आज कल ने
भावनायें खिल उठीं भागीरथी के नीर धोई
आज फिर गाने लगा है गीत कोई


सीप ने ज्यों तीर पर मोती बिखेरे
चित्र लहरों ने स्वयं पर ही उकेरे
हो रहे तन्मय,दुपहरी तक सवेरे
चेतना सुधि छोड़कर भीनी हवा के साथ खोई
आज फिर गाने लगा है गीत कोई

हवा के पंख पर चढ़ कर

रुका था जब दिवस का रथ प्रतीची में कहीं जाकर
छलकने को हुई आतुर सितारों की भरी गागर
विभा तत्पर हुई अपना जरा घूँघट हटाने ्को
दिया चल चाँद अलसाया गगन के पार जाने को

धुँये की कुछ लकीरों ने हवा पर चित्र खींचे थे
कलश के नीर ने जिस पल थकन के पांव सींचे थे
जगी थी दीप की लौ तुलसियों के आंगनीं में आ
रंगोली में टंगा आकर अंधेरों का था जब बूटा

तुम्हारा नाम उस पल घंटियों की गूँज बन कर के
हवा के पंख पर चढ़ कर मेरी अंगनाई में आया

उतर कर आ गईं दीवार से परछाइयां नीचे
लगा अहसास कोई मूंदता पलकें खडा पीछे
लगी गाने सितारों की मधुर झंकार नव गाना
मचल कर जुगनुओं ने शीश पर छप्पर कोई ताना

किसी नीहारिका के गाँव से सन्देश लेकर के
पकड कंदील की डोरी उतरकर नाम इक आया

क्षितिज के रंग पिघले कुछ नई आभाएँ ले लेकर
सिंदूरी पृष्ठ पर उभरे अचानक सुरमई अ्क्षर
सुरों ने शब्द में बुन कर बनाई गीत की चादर
दिशा ने ओढ़ ली संगीत में रँग कर उसे सादर

उमड़ती गंध की फ़गुनाई सी नटखट बदरिया ने
तुम्हारे नाम में रँग कर उसे फिर झूम कर गाया