Wednesday, July 28, 2010

एक अगन सी रोम रोम में

तुम कुछ पल को मिले और फिर बने अपरिचित विलग हो गये
तब से जलने लगी निरन्तर एक अगन सी रोम रोम में

सुलग रहा अधरों पर मेरे स्पर्श एक पल का अधरों का
भुजपाशों में रह रह करके आलिंगन के घाव सिसकते
दॄष्टिपात वह प्रथम शूल सा गड़ा हुआ मेरे सीने में
काँप काँप जाता है तन मन उन निमिषों की यादें करते

ग्रसता है विरहा का राहू आशाओं का खिला चन्द्रमा
जब जब भी पूनम की निशि को निकला है वह ह्रदय व्योम में

आंखों में उमड़ी बदली में धुंधला गये चित्र सब सँवरे
ज्वालामुखियों के विस्फ़ोटों सी फूटीं मन में पीड़ायें
बरसी हुई सुधा की बून्दें सहसा हुईं हलाहल जैसे
कड़ी धूप मरुथल की होकर लगी छिटकने चन्द्र विभायें

दिन वनवासी हुए धधकते यज्ञ कुंड सी हुईं निशायें
आहुति होती है सपनों की एक एक हो रहे होम में

चढ़े हुए सूली पर वे पल जो बीते थे साथ तुम्हारे
बिखरे हैं हजार किरचों में चेहरे सब संचित अतीत के
प्रतिपादित कीं तुमने नूतन परिभाषायें भाव शब्द की
मैने जैसे सोचे न थे निकलेंगे यों अर्थ प्रीत के

अर्थ भावनाओं के जितने वर्णित थे मन की पुस्तक में
एक एक कर सन्मुख आये, आये पर ढल कर विलोम में

Monday, July 26, 2010

दीपक एक नहीं जल पाया

शब्दों के ताने बाने बुन लिख तो लिये गीत अनगिनती
सूखे अधरों पर आकर के एक नहीं लेकिन सज पाया

उगी भोर ने सन्नाटे के सुर में अपना राग सँवारा
दोपहरी ने उठा हुआ हर एक प्रश्न हर बार नकारा
संध्या बीती टूटी हुई आस्थाओं के टुकड़े चुनते
रातें व्यस्त रहीं सपनों के अवशेषों के धागे बुनते

जीवन की इस दौड़ धूप में, उठा पटक में उलझे सब पल
अब अंतिम भी विलय हो रहा,किन्तु न दीप एक जल पाया

जब भी मुड़ कर करना चाहा है परछाईं का अवलोकन
उठी हुई आंधी आकर के गई धूल से भर दो लोचन
हैं सपाट राहें, पांवों का चिह्न एक भी कहीं न दिखता
रही गज़ल हर बार अधूरी, दुविधा ग्रस्त ह्रदय क्या लिखता

संचित थे जो रंग तूलिका करती रही खर्च बिन चाहे
श्वेत-श्याम बस शेष तभी तो इन्द्रधनुष अब बन न पाया

बिछे हुए नयनों के आगे सीमाहीन अँधेरे आकर
लहर लहर उद्वेलित होता, सांसों का उथला रत्नाकर
टूटी हुई कमानी लेकर कितनी देर घड़ी चल पाये
आड़ी चौताली धड़कन पर कैसे कोई सुर सध पाये

सरगम के सातों सुर योंतो चिर परिचित से लगे सदा ही
नित्य बुलाया, कोई लेकिन आकर स्वर के साथ न गाया

Monday, July 19, 2010

बात बस इतनी सी थी

उठे प्रश्न अनगिन नयनों में,जबकि बात बस इतनी सी थी
मेरे होंठ गई थी छूकर,हवा चूमने अधर तुम्हारे

हुईं चकित जो नजरें सहसा,उनको यह था ज्ञात नहीं
मेरा और तुम्हारा नाता कल परसौं की बात नहीं
संस्कृतियों के आदिकाल से नवदिन के सोपानों तक
एक निमिष भी विलग अभी तक हुआ हमारा साथ नहीं

असमंजस उग आये हजारों,जबकि बात बस इतनी सी थी
मेरे पग के चिह्न वहीं पर बने,जहाँ थे कदम तुम्हारे

निशियों का तम ले सत्यापित करे समय संबंधों को
अपने हस्ताक्षर अंकित कर,पूनम के उजियारों पर
एक हमारी घुलती सांसों से गति पाकर बहे सदा
पुरबायें, अठखेली सी करती नदिया के धारों पर

उठे हजारों आंधी अंधड़,जबकि बात बस इतनी सी थी
धराशायी हो गयी दृष्टि पल भर थे चूमे नयन तुम्हारे

जो रह जाता दूर प्राप्ति की सीमा से,वह मात्र कल्पना
इसी भ्रान्ति में जीते हैं वे जो बस प्रश्न उठाया करते
पूर्ण समर्पण के भावों में मानस जिस पल ढल जाता है
सीमायें भी खींचा करतीं सीमा रेखा डरते डरते

सांझ सिंदूरी रह न पाई,जबकि बात बस इतनी सी थी
नयन सुरमई हुए स्वयं ही, द्वार आ गये सपन तुम्हारे

Monday, July 12, 2010

सरगम की तलाश में कोई

उगी भोर से ढली सांझ तक आवारा मन भटका करता
सरगम की तलाश में कोई गीत नहीं पर गा पाता है

खुले हुए दालानों में आ कुर्सी पर थी हवा बैठती
अँगनाई में एक दरेंता दलता रहता था दालों को
छत पर बनते रहे कुरैरी, पापड़, टूटा करती बड़ियाँ
अलसाई दोपहरी आकर सुलझाती उलझे बालों को

लगता है अजनबी हो गया वह इक धुंधला चित्र ह्रदय का
किन्तु सुलगती शामों में वह गहरा गहरा हो जाता है

तिरते दॄश्य दीर्घाओं में नयनों की कुआ पूजन के
थिरक रहे कदमों का लेना फ़ेरे गिर्द चाक के अविरल
छत से लटके पलड़े पर से गिरी चाशनी बने बताशे
करघे का गायन रह रह कर करता हुआ रुई को कोमल

उन गलियों को जाने वाली राहें बीन ले गया अंधड़
आस उधर फिर भी जाने की मन ये छोड़ नहीं पाता है

गलियों के नुक्कड़ पर गाते ठन ठन पीतल,घन घन लोहा
हलवाई की भट्टी पर से आती खुशबू की बौछारें
रह रह पास बुलाती गूंजें मंदिर में होती आरति की
बन आशीषें बरसा करतीं दादी नानी की मनुहारें

इतिहासों में बंद हो गए पढी हुई पुस्तक के पन्ने
लेकिन झोंका एक हवा का,इन्हें सांझ छितरा जाता है

Friday, July 09, 2010

धुन अविराम बजाता जाउँ

इससे पहले माना जाऊं मैं अपराधी चुप रहने का
तुमको अपने मन की बातें चलो आज बतलाता जाऊं

भावों का सावन शब्दों की गागरिया में भरा सहेजा
अश्रु स्रोत पर रखी सांत्वना स्वप्न पुष्प में सजा सजा कर
गंधों की झालरी हवा में बुनी एक मनमोहक सरगम
और निरंतर छेड़ा उसको अभिलाषा में बजा बजा कर

लेकिन अब तक मिली नहीं है एक अनूठी वही रागिनी
उतर आये उंगली पर जिसको मैं अविराम बजाता जाऊं

गज़लें आकर लहराई हैं सुबह शाम अधरों पर मेरे
कतओं ने नज्मों ने मन के द्वारे आकर दी है दस्तक
दोहे मुक्तक और सवैये लिए पालकी नवगीतों की
कविताओं का एक सिलसिला रहा होंठ से मेरे मन तक

लेकिन ऐसा एक गीत वह आकर संवरा नहीं स्वयं ही
जो अधरों का साथ न छोड़े और जिसे मैं गाता जाऊं

हाथों में आ कलम शब्द के चित्र नये कुछ रँग देती है
नये रंग में घोल भावना रच देती है एक कहानी
लिखते निंदिया के झुरमुट में उगते हुए स्वप्न के जुगनू
खिलती हुई उमंगों कहतीं सुधियों में फ़ैली वीरानी

लेकिन कोई एक कहानी पूरी नहीं कलम कर पाती
जिसको चौपालों पर जाकर मैं हर शाम सुनाता जाऊँ

कलाकार को रहा अपेक्षित कोई करे प्रशंसा उसकी
और बोध के निर्देशन से दिशा पूर्णता की दिखलाये
संशय की धुंधों में डूबी हुई मनस्थितियों में आकर
दिनकर की किरणों से खोले पट को औ’ प्रकाश छितराये

कभी योग्यता का भ्रम होता, तो आईना कह देता है
पहले पूण स्वयं को कर लूँ, फिर कमियां जतलाता जाऊँ

Monday, July 05, 2010

एक वही है कविता मेरी

एक वही है मेरी कविता, मेरी कल्पना मेरी प्रेरणा
जिसके चित्र नयन के परदे पर आ प्रतिपल लहराते हैं

इन्द्रधनुष की परछाईं में उसको प्रथम बार देखा था
शरद पूर्णिमा की रंगत में गढ़ी हुई प्रतिमा चन्दन की
उसके अधरों के कंपन से जागे हुए सुरों को छूकर
प्राण पा गई ध्वनि, गूँजी बन मंत्र अर्चना में वंदन की

अनुरागी सुधियों के मेरे कोष राजसी में वह संचित
उसका पाकर स्पर्श रत्न भी और रत्नमय हो जाते हैं

बासन्ती चुम्बन से सिहरी हुई कली की निद्रित पलकें
जब खुलती हैं तब उसके ही चित्र संवरते हैं पाटल पर
गंधों की बांसुरिया बजती तान उसी के तन से लेकर
और नाम उसका ही मिलता लिखा बहारों के आँचल पर

शतरूपी वह रोम रोम में संचारित है निशा दिवस में
तार ज़िन्दगी की वीणा के, जिससे झंकारॆं पाते है

जिसके कुन्तल लहराते ही रँगीं अजन्तायें अनगिनती
गढ़ जाता खजुराहो पाकर नयनों का केवल इक इंगित
जुड़े हुए कर जिसके बनते एक गोपुरम पूजाघर का
जिसकी छवि से हो जाते हैं ताजमहल हर युग में शिल्पित

मनमोहन वह हुई प्रवाहित सदा लेखनी पर आ आकर
और शब्द उसके प्रभाव से स्वत: गीत बनते जाते हैं