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Showing posts from March, 2010

गीत में जो ढल रहा है, मैं स्वयं ही हूँ अनावॄत

घिस गई  जो पिट गई जो बात वह गाता नहीं हूँगा चुके जिसको हजारों लोग, दोहराता नहीं हूँभाव हूँ मैं वह अनूठा, शब्द की उंगली पकड़ करचल दिया जो पंथ में तो लौट कर आता नहीं हूँगीत में जो ढल रहा है, मैं स्वयं ही हूँ अनावॄतकोई कॄत्रिम भाव मैने आज तक ओढ़ा नहीं हैगीत का सर्जक मुझे तुमने कवि अक्सर कहा हैऔर कितनी बार सम्बोधन मेरा शायर रहा हैमैं उच्छॄंखल आंधियों की डोर थामे घूमता हूँकिन्तु मेरा साथ उद्गम से सदा जुड़ कर रहा हैमैं विचरता हूँ परे आकाशगंगा के तटों केपर धरा की डोर को मैने अभी तोड़ा नहीं हैमैं उफ़नती सागरों की लहर को थामे किनारामैं संवरती भोर की आशा लिये अंतिम सितारामैं सुलगती नैन की वीरानियों का स्वप्न कोमललड़खड़ाते निश्चयों का एक मैं केवल सहारामैं वही निर्णय पगों को सौंपता जो गति निरन्तरऔर जिसने मुख कभी बाधाओं से मोड़ा नहीं हैजो अँधेरे की गुफ़ा में सूर्य को बोता, वही मेंवक्ष पर इतिहास के करता निरन्तर जो सही, मैंउग रहा जो काल के अविराम पथ पर पुष्प मैं हूँशब्द ने हर बार स्वर बन कर कथा जिसकी कही ,मैंमैं सितारा बन निशा के साथ हर पग पर चला हूँव्यर्थ का सम्बन्ध कोई आज तक जोड़ा नहीं है जन्म लेत…

हिना की रंगत हथेलियों पे

तुम्हारे अधरों की सिहरनों ने लकीर हाथों की जब से छू ल
तभी से रंगत हिना की गहरी हुई है मेरी हथेलियों पे

नयन के दर्पण में आ के संवरीं हजार झीलें उषा की झिलमि
कपोल पर आ लगीं थिरकने सिन्दूर घोले हुए विभायें
अधर कीथिरकन में थरथरा कर अटकती वाणी लगी है खोने
लगीं सिमटने हैं पगतली में उमड़ उमड़ कर सभी दिशाये


तुम्हारे होठों ने जो कहा है बिना सुरों की उंगलियां थामे
वे बात किस्सों में ढल गईं हैं, मेरी सखी के सहेलियों के

उमड़ता है बांसुरी का इक सुर अजाने मन की गहन गुफ़ा में
शिरा में आकर लगे मचलने हैं ज्वार पल पल ही शिंजिनी के
पलक पे आ कर टिकी हुइ है बड़े वज़न की लो एक गठरी
औ पैंजनी से झनक रहे हैं बदन में स्वर जैसे सनसनी के

तुम्हारी नजरों ने मेरी नजरों से जो कहा है तरंग में बो
न जाने क्यों उससे जन्म होने लगे अचानक पहेलियों के

लगा है कंगन कुछ खुसपुसाने, नजर झुका कर अंगूठियों से
लिखे है उंगली के पोर पर कुछ दुपट्टा रस में भिगोई बातें
लगा अटकने है होठं की आ गली में मेरा सुनहरा आंचल
खिली है निशिगंधायें दुपहरी , बना दिवस को रँगीन रातें

तुम्हारे भीने परस ने छू कर मुझे कहा है जो मौन स्वर में
संवरने आंखों में लग गये हैं, जो स्वप्न …

बादल का टुकड़ा निचोड़ कर.

दॄष्टि तुम्हारी चूम गई थी आकर जहाँ नयन को मेरे
यह पागल मन अब भी अटका हुआ उम्र के उसी मोड़ पर

ताजमहल की परछाईं में बतियाता था मैं लहरों से
अधलेटा, सर टिका हथेली पे अपनी मैं अलसाया सा
गंध भरे बादल का टुकड़ा आया एक पास था मेरे
जैसे गीत हवा का गाया मौसम ने हो दुहराया सा

सुधियों को सम्मोहित करके साथ उड़ा ले गया कहीं पर
वह एकाग्रचित्तता की मेरी तन्द्रायें सभी तोड़ कर

संध्या की आँखों का सुरमा पिघल ढल गया था रंगों में
ढलते सूरज ने किरणों की कूची लेकर चित्र उकेरा
नीड़ लौटते पाखी ने जब छेड़ दिये थे सरगम के सुर
लेने लगा उबासी था जब पूरे दिन का थका सवेरा

जल्दी में था घर जाने की, इसीलिये ही दिन का सारथि
गया प्रतीची ले रथ अपना, चित्र तुम्हारा पास छोड़ कर

घुली हवाओं के झोंकों में ज्यों अनुभूति अजानी अद्भुत
वैसे चित्र तुम्हारा नयनों के पाटल पर बना अचानक
मिले नयन से नयन तरंगित हुई भावनाओं की डोरी
मन के पृष्ठों पर फिर सँवरे एक एक कर कई कथानक

होठों पर मेरे आ उतरी छुअन किसी नन्ही पांखुर की
या फिर रखा हवा ने कोई बादल का टुकड़ा निचोड़ कर.

मैं नया इक गीत लिख दूँ आज मुझ से कह रहा है

जाये रच परछाईयों के पांव में भी जब महावर

धूप की अंगनाई में पायल हवा की झनझनाये
दोपहर की थाम उंगली सांझ करती नॄत्य हो जब
वीथिका में गंध की सारंगियों पर फूल गाये
उस घड़ी लगता तुम्हारा चित्र मेरे सामने आ
मैं नया इक गीत लिख दूँ आज मुझ से कह रहा है

कह रहा परवाज़ दूँ मैं कल्पनाओं के विहग को
सुघर मोती से रखे हैं ओसकण पर जो पगों को
शब्द नूतन कुछ रचूँ मैं बाँध जो विस्तार पाये
जो विमोहित कर रहा है एक छवि से सकल जग को
और मेरी   लेखनी के कोष में संचित अभी तक
मैं उजागर आज कर दूँ फिर मुझे यह कह रहा है

आज लिख दूँ फिर तुम्हारे अरुण अधरों की कहानी
गाऊँ जो में गात में महकी हुई है रात रानी
कुन्तलों में ले रहीं आकर शरण अनगिन अमायें
इन्द्र की अलकापुरी की भेंट जो प्रतिमा सुहानी
शब्द पुलकित हो रहा है भाव की भीनी सुरा से
और अपने आप ही फिर गीत बन कर बह रहा है

कह रहा है गीत में रच दूँ तुम्ही को मैं सजाऊँ
छंद में बुनकर तुम्हारा नाम ही बस गुनगुनाऊँ
जो कुमुदिनी ने बतायें हैं मधुप को भेद निशि में
कह रहा है बस उन्हीं को मैं सुनूँ, तुमको सुनाऊँ
दॄष्टि लेकिन नैन से जाकर तुम्हारे जब मिली है
तब मेरी क्षमताओं का पाला हुआ भ्रम ढह रहा है

शब्द से …

गीत कलश से छलकी तीन सौ पचासवीं बूँद--आपके सामने

जिसे देख कर के अजन्ता बनी थी

मचलती हुई इस हवा के इरादे
मेरे हमनशीं जो अगर नेक होते
नहीं छेड़ती फिर ये ज़ुल्फ़ें तुम्हारी
न अठखेलियाँ चूनरी से ही करती

ये सोई हुई थी कहीं झाड़ियों में
किसी फूल की पंखुरी में सिमट कर
जगा कर गया एक खुशबू का झोंका
तुम्हारे पगों से चला था लिपट कर
उसे पी के बहकी हुइ आ गई ये
तुम्हारी गली ले कदम लड़खड़ाते
बजाने लगी सीटियां मद में डूबी
रही एक ही नाम को गुनगुनाते

जो डूबी न होती मदिर गंध में ये
तो आपा न अपना जरा भूल पाती
न भुजपाश में अपने तुमको पकड़ती
न हीं गाल पर आके चुम्बन ही जड़ती

किसी एक चंचल किरन ने घटा पर
जो खींची थी तस्वीर इक दिन तुम्हारी
वादियों में बनी झील के आईने में
तरंगों ने पुलकित हुए जो उभारी
था उससे छिटक छू गया एक जलकण
खनकती हुई झालरी का किनारा
तो जैसे मिली सोमरस की सुराही
उसे इसने गट गट गले से उतारा

अगर पी न होती सुधा रूप की तो
न सुधि को बिसारे गगन में विचरती
न खोती नियंत्रण स्वयं पर से अपना
न फिर फिर संभलती न फिर फिर ही गिरती

शराफ़त का यूँ तो रही ओढ़कर ये
दुशाला,चली आई जब इस डगर पर
मगर आज करने लगी है शरारत
जो तुम आ गईं सामने थी संवर कर
गई भूल प्रत…