सरगम की सीमा ने अपनी सीमा तुम्हें देख कर ,मानी
कहा आठवें सुर की संरचना का एक तुम्ही हो कारण
रूप न कर पाई वाणी जब सातों सुर लेकर के वर्णित
शब्दों के अनथके प्रयासों ने केवल असफ़लता पाई
लहरों ने रह रह कर छेड़ी जलतरंग की मधुर रागिनी
जो कि तुम्हारे थिरके अधरों की रेखा तक पहुँच न पाई
उस पल भाषा ने नव अक्षर रच कर यह सन्देश सुनाया
शायद बिखरे असमंजस का हो पाये अब सहज निवारण
सुर से लेकर शब्दों तक की सीमा में ही गूँजा करती
जागी हुई भोर की परछाईं में घुलती हुई आरती
एक शिल्प के आकारों में कुछ गहराई और भर सके
मंदाकिनियां नभ से आकर प्राची के हैं पग पखारती
किन्तु शिल्प में ढले खंड भी पाषाणों के कह देते हैं
संभव नहीं तुम्हारे अंशों जितना भी पायें विस्तारण
प्रतिबिम्बित हो बरखा की बून्दों से किरन धूप की कोई
खींचा करती रंग पिरोकर चित्र कामना के, अम्बर में
सतरंगी पुष्पित कमान की प्रत्यंचा के सिरे थाम कर
आस बनाती तुम जैसी हो अभिलाषायें भर कर कर में
लेकिन रंगों का फ़ीकापन हो असहाय समर्पित होता
नये रंग के बीज मंत्र का तुमसे ही होता उच्चारण


