Monday, January 25, 2010

केवल एक तुम्हीं हो कारण


सरगम की सीमा ने अपनी सीमा  तुम्हें देख कर ,मानी
कहा आठवें सुर की संरचना का एक तुम्ही हो कारण
 
रूप न कर पाई वाणी जब सातों सुर लेकर के वर्णित
शब्दों के अनथके प्रयासों ने केवल असफ़लता पाई
लहरों ने रह रह कर छेड़ी जलतरंग की मधुर रागिनी
जो कि तुम्हारे थिरके अधरों की रेखा तक पहुँच न पाई
 
उस पल भाषा ने नव अक्षर रच कर यह सन्देश सुनाया
शायद बिखरे असमंजस का हो पाये अब सहज निवारण
 
सुर से लेकर शब्दों तक की सीमा में ही गूँजा करती
जागी हुई भोर की परछाईं में घुलती हुई आरती
एक शिल्प के आकारों में कुछ गहराई और भर सके
मंदाकिनियां नभ से आकर प्राची के हैं पग पखारती
 
किन्तु शिल्प में ढले खंड भी पाषाणों के कह देते हैं
संभव नहीं तुम्हारे अंशों जितना भी पायें विस्तारण
 
प्रतिबिम्बित हो बरखा की बून्दों से किरन धूप की कोई
खींचा करती रंग पिरोकर चित्र कामना के, अम्बर में
सतरंगी पुष्पित कमान की प्रत्यंचा के सिरे थाम कर
आस बनाती तुम जैसी हो अभिलाषायें भर कर कर में
 
लेकिन रंगों का फ़ीकापन हो असहाय समर्पित होता
नये रंग के बीज मंत्र का तुमसे ही होता उच्चारण
 

Thursday, January 21, 2010

माँ शारदा के चरणों में सादर नमन

श्वेत पत्रों से पंकज के फिसली हुई ओस की बूँद ढल स्याहियों में गई
बीन के तार के कम्पनों से छिटक एक सरगम आ सहसा कलम बन गई
फिर वरद हस्त आशीष बन उठ गया बारिशें अक्षरों की निरंतर हुईं
शब्द की छंद की माल पिरती हुई आप ही आप आ गीत तब बन गई.

माँ  शारदा के चरणों में सादर नमन

Thursday, January 14, 2010

आँगन हो गया पराया

जकड़े हुए हमें अपनी कुंडलियों में यादों के विषधर
रजनी गंधा जहां महकती थी आँगन हो गया पराया

जीवन की सीमाओं पर अ
पौधे उगे नागफ़नियों के
सिंचित किये दूध से हमने
उपजे होकर फ़ेनिल सपने
लहरें उमड़ी निगल गईं हैं
नावें सब कोमल भावों की
और तीर हैं फ़न फ़ैलाये
तत्पौर हुए साध को डँसने

पायल की हर इक थिरकन पर उठने लगीं उंगलियां जग क
लेकिन क्या घुँघरू ने कहना चाहा कोई समझ न पाया

पग डगमग हैं निष्ठाओं क
बैसाखी पर नैतिकतायें
मूल्यों की परिभाषायें अब
सुबह शाम नित बदला करतीं
किरणों पर शीशे रख कर जो
रंगा सोच कर चित्र बनेगा
उसमें एक अकेली पीड़
सात रंग में सजी संवरती

तारों से उठती सरगम में सभी तलाशे रागिनियों को
लेकिन तार शब्द जो बोले उनको कोई नहीं सुन पाया

किसका आधिपत्य कितना है
किस पर कब निर्धारित होता
आज पास में जो है अपना
कल है संभव नजर न आये
बदल रहे मौसम की मर्जी
किस दिन क्या वह रूप संवार
भादों बने मरुथली, कार्तिक
संभव है सावन बरसाये
कभी कभी ऐसा लगता है छाई हुई धुन्ध को चीरूँ
और पुन: खड़काऊँ साँकल उसकी द्वार न जो खुल पाया

उत्तरदायित्वों के शव पर
कोई नहीं बहाता आँसू
आक्षेपों के तीर निरन्तर
इनदूजे पर छोड़े जाते
अपनी सुविधा वाली राहे
चुन कर सब ही बैठ गये हैं
दोषारोपण किया राह पर
अगर न मंज़िल का पथ पाते

यों चरित्र हमको अवाक इक दर्शक का ही मिला हुआ है
और नयन ने जो कुछ कहना चाहा कोई नहीं पढ़ पाया

Monday, January 11, 2010

हर पल साथ रहे तुम मेरे

ओस में डूब कर फूल की पंखुड़ी भोर की इक किरण को लगी चूमने
गंध फिर तितलियों सी हवा में उड़ी, द्वार कलियों के आकर लगी घूमने
बात इतनी हुई एक पत्ता कहीं आपके नाम का स्पर्श कर आ गया
यों लगा आप चलने लगे हैं इधर, सारा उपवन खुशी से लगा झूमने
 
xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx
 
पतझड़ के पहले पत्ते के गिरने की आहट से लेक
अंकुर नये फ़ूटने के स्वर तक तुम साथ रहे हो मेरे

जब जब ढलती हुई सांझ ने अपना घूँघट जरा निकाला
चन्द्रज्योत्सना वाले मुख पर इक झीना सा परदा डाला
उड़ी धुन्ध के धुंधुआसे दर्पण में चित्र संवारे मैने
और ओढ़नी से तारों की बिन्दु बिन्दु को रखा संभाला

बढ़ते हुए निशा के पथ में मैने रखा हाथ वह थामे
जिसकी शुभ्र कलाई छूकर अस्त हुए स्वयमेव अंधेरे

दिन का दीपक जला जिस घड़ी प्राची की पूजा थाली में
गंध उगाने लगी फूल जब सूखे कीकर की डाली में
दोपहरी आचमन कर गई बही धार के गंगाजल का
और तीसरा पहर अटक कर रहा पीतवर्णी बाली में

तब तब बन कर शलभ रहा मैं साथ ज्योति की अँगड़ाई के
नहीं मेघ की परछाईं फिर डाल सकी आंगन में डेरे

गति के चलते हुए चक्र में कोंपल फिर उगती झर जाती
और शेष हो रह जाती है एक बार जल कर के बाती
एक बार उद्गम से निकला नहीं लौटता कोई वापिस
और बात शब्दों में ढल कर बचती नहीं खर्च हो जाती

लेकिन साथ तुम्हारा मेरे संचय की इक अक्षय निधि है
तॄण भी एक न कम हो पाता बीते संध्या और सवेरे

Wednesday, January 06, 2010

भाषा नयन की लिख रहा हूँ

 चाहता हूँ मैं लिखूँ कुछ प्रीत के नूतन तराने
भाव में डूबे हुए कुछ बिम्ब ले लेकर सुहाने
किन्तु वर्णन न्यायसंगत हो नहीं पाता तनिक भी
शब्द जितने पास मेरे, हो चुके हैं सब पुराने

इसलिये अब शब्द बिन भाषा नयन की लिख रहा हूँ
आईना हूँ आपको अपने सरीखा दिख रहा 

खींचता हूँ आज रेखाचित्र मैं नीले गगन पर
टाँकत हूँ भावना की कूचियाँ लेटे पवन पर
गंध की उमड़ी हुई जो लहर में सिमटे हुए हैं
रंग भरता हूँ वही मैं एक कलिका के बदन पर

उड़ रही इक कल्पना का थाम कर आभास झीना
मैं क्षितिज पर बिन किसी आधार के ही टिक रहा हूँ

ढाल; देता हूँ कलम को अब भवों की भंगिमा में
शब्द्कोशों को समाहित कर नयन की नीलिमा में
धड़कनों में बुन रहा हूँ मैं अधर की थरथराहट
घोलता अभिव्यक्ति चेहरे पर उभरती अरुणिमा में

भाव यूँ तो गूढ़ हूँ मैं, किन्तु परिभाषित रहा हूँ
आईना हूँ आपको अपने सरीखा दिख रहा हूँ

Monday, January 04, 2010

सात पग साथ मिल तुम मेरे जो चले

धूप के चन्द छींटे मिलें साध ये
एक लिपटी हुई थी सदा ही गले
मिल गई दोपहर हमको बैसाख की
सात पग साथ मिल तुम मेरे जो चले


चाँदनी का पता पूछते पूछते
रात आती रही रात ढलते रह
एक भोली किरण पंथ को भूल कर,
आ इधर जायेगी आस पलती रही
बन के जुगनू सितारे उतरते हुए
राह को दीप्त करते रहे मोड़ पर
सांझ को नित्य ही कातती रात थी,
अपना चरखा वहीं चाँद पर छोड़कर



यों लगा सांझ भी चाँदनी हो ग
रात की मांग में जड़ सितारे गये
भोर के दीप फिर जगमगाने लगे
तय  किये हमने मिल जब सभी फ़ासले


सिन्धु के तीर पर मैं बिछा था हुआ
पग परस के लिये आतुरा रेत सा
सीपियों का निमंत्रन अधूरा रहा
शंख का एक ही शेष अवशेष था
मोतियों सी भरी एक थाली लिये
तुम उमड़ती हुई बन लहर आ गये
बात तट से तरंगे कभी जो करीं
तुम उन्हें रागिनी में पिरो गा गये


यों मिलन की बजी जलतरंगे नधुर
रागमय हो गई प्राण की बांसुरी
पंचियों के परों से बरसते हुए
सुर नये आ गये ताल में फिर ढले


तुलसियों पर जले दीपकों से जुडी
मन्नतें एक वरदान में ढल गई
साध जो सांझ की वन्दना में घुली
एक आशीष बन शीश पर खिल गई
चातकी प्यास थी एक ही बूँद की
स्वाति का एक सावन उमड़ आ
एक पांखुर उठाने बढे हाथ थे
बाह  में पूर्ण मधुवन सिमट आ गया

डोर बरगद पे बाँधी, बनी ओढ़नी
आस ने जो रखे, वे कलश भर गये
छांह में पीपलों की संवरने लगे
फिर वही पल रहे जो थे मंडवे तले