राग बासंती सुनाने आ रही है

ढूँढतीं हों उंगलियाँ जब पथ दुपट्टे की गली में
पाँव के नख भूमि पर लिखने लगें कोई कहानी
दृष्टि रह रह कर फिसलती हो किसी इक चित्र पर से
सांस में आकर महकने लग पड़े जब रातरानी
 
तब सुनयने जान लेना उम्र की इस वाटिका में
एक कोयल राग बासंती सुनाने आ रही है

फूल खिलते सब,अचानक लग पड़ें जब मुस्कुराने
वाटिकाएं   झूम कर जब लग पड़ें कुछ गुनगुनाने
झनझनाने लग पड़ें पाजेब जब बहती हवा की
और मन को लग पड़ें घिरती घटा झूला झुलाने

उस घड़ी ये जान लेना प्रीत की सम्भाशीनी तुम
कोई रुत छू कर तुम्हें होती सुहानी जा रही है
 
देख कर छवि को तुम्हारी,लग पड़े दर्पण लजाने
झुक पड़े आकाश,छूने जागती अँगड़ाइयों को
भित्तिचित्रों में समाने लग पड़े   आकाँक्षायें
शिल्प मिलने लग पड़े जब काँपती परछाइय़ों को
 
जान लेना तब प्रिये, नव भाव की जादूगरी अब
कोई अनुभव इक नया तुमको कराने जा रही है.

Comments

ढूँढतीं हों उंगलियाँ जब पथ दुपट्टे की गली में---
बहुत खूबसूरत पँक्तियाँ। पूरा गीत मन मे आनन्द भर गया। बधाई आपको। सारस्वत सम्मान के लिये भी बहुत बहुत बधाई।
संकेतों से माध्यम से मधुरिम भविष्य का राग बाँचती कविता।
Akshita (Pakhi) said…
यह तो बहुत सुन्दर गीत है.

पाखी की दुनिया में भी आपका स्वागत है.

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