जो गीत में आ ढले स्वयं ही वे भाव आते नहीं उमड़ कर
न जाने कैसी मनस्थिति है नहीं समझ में तनिक आ रहा
हजार किस्से अभाव के हैं हजार आंखें हैं डबडबाई
है पीर लिपटी हुई गज़ल में सुबकती मिलती है हर रुबाई
वही कहानी शताब्दी की, वही फ़साना गई सदी का
है एक वो ही पिटी कहानी हजार पन्नों में न समाई
है ज्ञात इतना तनिक भी चेतन नहीं शिखाओं को मिल सकेगा
न जाने फिर भी सितार लेकर है राग दीपक का मन गा रहा
है बूढ़े दिन की जो बेबसी वह खलिश जगाये ह्रदय में गहरी
लगा स्वयं ही सवाल करने सवाल अपनी ही अस्मिता पर
है क्या अमर, क्या अमिट यहां पर, कहां है ये जो यहां कहा है
औ’ क्या निरन्तर चला है गति में, हुआ है क्या जड़ बना यहां पर
मैं मंच पर हूँ या हूँ सभा में, पता नहीं ये चले तनिक भी
वो कौन गाता है रागिनी को, है कौन जो यह सुने जा रहा
रहे हो सीमित विवश पलों में समय के जितने रहे थे मानक
बदलते सन्दर्भों की पॄष्ठभूमि, नये ही रिश्ते बना रही है
सुबह से जुड़ती हुई दिशायें, लगी हैं अपनी बदलने सूरत
औ सांझ अपने समीकरण से लगे दुपहरी घटा रही है
लहरती चादर के रंग काले हुए हैं सातों ही रंग पीकर
न जाने भ्रम क्यों नजर का इनको सफ़ेद रह रह कहे जा रहा
Monday, June 28, 2010
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11 comments:
इस रचना के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें
जो गीत में आ ढले स्वयं ही वे भाव आते नहीं उमड़ कर
न जाने कैसी मनस्थिति है नहीं समझ में तनिक आ रहा
-आपके लिए हमें कोई संश्य नहीं है..आप कमंड करते हैं शब्दों को..:)
शानदार!
Oh!
मैं भ्रमित आभास के हर बिम्ब का विध्वंस करके
इक नये विश्वास का संकल्प बोता ही रहूँगा ...
प्रेरक अभिव्यक्ति के लिये धन्यवाद्
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
राकेश जी एक उम्दा रचना ..पहले कहीं कहीं कुछ शब्द समझ में नही आ पाते थे पर अब एक एक लाइन समझने लगा हूँ..बेहतरीन भाव से सजी एक बेहतरीन कविता..सुंदर गीत के लिए बधाई
पीड़ा को ज्यों आपने अभिव्यक्ति दी है, शब्द मन तक पहुँच इसे बोझिल कर गए हैं...
संपुष्ट सार्थक अभिव्यक्ति...
अतिसुन्दर रचना...
रहे हो सीमित विवश पलों में समय के जितने रहे थे मानक
बदलते सन्दर्भों की पॄष्ठभूमि, नये ही रिश्ते बना रही है
सुबह से जुड़ती हुई दिशायें, लगी हैं अपनी बदलने सूरत
औ सांझ अपने समीकरण से लगे दुपहरी घटा रही है
adbhut, bahut hi sunder..
राकेश भाई !
आपके बारे में दो शब्द लिखें हैं कृपया जब समय मिलें देखें अवश्य !
सादर
http://satish-saxena.blogspot.com/2010/07/blog-post.html
हजार किस्से अभाव के हैं हजार आंखें हैं डबडबाई
है पीर लिपटी हुई गज़ल में सुबकती मिलती है हर रुबाई ।
वही कहानी शताब्दी की, वही फ़साना गई सदी का
है एक वो ही पिटी कहानी हजार पन्नों में न समाई ।
कितना सच लिखा है आपने हर सदी वहीकहानी दोहरा रही है मगर इन्सान है कि इतिहास से कोई सबक लेना ही नही चाहता । उत्तम रचना ।
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