चाह थी पांव का एक बिछुआ बनूँ
हार तूने बना वक्ष पर रख लिया
तेरे अपनत्व के ऐसे उत्कर्ष को
मन ये मेरा कहे शुक्रिया शुक्रिया
मैं था कंकर बना पगतली में चुभा
तूने कंगन बना हाथ में धर लिया
मैं हलाहल गरल था समय सिन्धु का
तूने शिव की तरह कंठ में भर लिया
लौह के खंड को तेरा पारस परस
स्वर्ण के पात्र में ढालता जा रहा
एक भटके हुए शब्द को बांध कर
स्वर तेरा ये मधुर गीत कर गा रहा
रेत के एक अणु से रहा सूक्ष्म जो
तूने विस्तार देकर सितारा किया
होंठ असमर्थ हैं बोल कुछ भी सकें
और मन ये कहे शुक्रिया शुक्रिया
पांव भटके हुए, पा दिशायें सकें
ये अकेले सफ़र में है संभव नही
एक निर्देश जो पंथ का मिल सके
तब ही संकल्प में भर सके ताजगी
तूने निष्ठाओं को और आयाम दे
चेतना को नई रोशनी सौंप दी
डगमगाते हुए निश्चयों में नई
तूने विश्वास की कोंपलें रोप दीं
राह की हर विषमता विलय हो गई
थी कड़ी धूप, तूने घटा कर दिया
तेरे अनुराग की इस मधुर छांह को
मन ये मेरा कहे शुक्रिया शुक्रिया
Monday, June 21, 2010
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8 comments:
राकेशजी, अच्छी सार्थक रचना है। बस कुछ टाइपिंग की गडबडी दिखायी दे रही हैं, एक बार पुन: जाँच लें।
रचना के भाव और सौंदर्य की तो क्या कहूँ...
पहले भी कह चुकी हूँ....आपकी श्रृंगार की कविताओं में जो मधुरता शील सौंदर्य और कोमलता हुआ करती है....बस मन रसाभोर और श्रद्धानत हो जाता है...
कृपया वर्तनी की शुद्धता परख लें...
आनन्द आ गया...बहुत कोमल एवं सुन्दर..हम आपसे कहें ऐसा ही पढ़वाते रहें ..शुक्रिया शुक्रिया!
ापकी रचनाओं को खाली समय मे बैठ कर पढती हूँ गहरे भाव और सुन्दर अभिव्यक्ति आभार।
:)
इतनी सुंदर रचना के लिए शुक्रिया !! शुक्रिया
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राकेश जी..आज बस केवल आप की कविता पढ़ने के मन से ही बैठा हूँ..बहुत दिन हो गये थे सो आप याद आने लगे..
बहुत अच्छी लगी आप की यह रचना भी..सुंदर गीत के लिए हार्दिक बधाई
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