Monday, January 25, 2010

केवल एक तुम्हीं हो कारण


सरगम की सीमा ने अपनी सीमा  तुम्हें देख कर ,मानी
कहा आठवें सुर की संरचना का एक तुम्ही हो कारण
 
रूप न कर पाई वाणी जब सातों सुर लेकर के वर्णित
शब्दों के अनथके प्रयासों ने केवल असफ़लता पाई
लहरों ने रह रह कर छेड़ी जलतरंग की मधुर रागिनी
जो कि तुम्हारे थिरके अधरों की रेखा तक पहुँच न पाई
 
उस पल भाषा ने नव अक्षर रच कर यह सन्देश सुनाया
शायद बिखरे असमंजस का हो पाये अब सहज निवारण
 
सुर से लेकर शब्दों तक की सीमा में ही गूँजा करती
जागी हुई भोर की परछाईं में घुलती हुई आरती
एक शिल्प के आकारों में कुछ गहराई और भर सके
मंदाकिनियां नभ से आकर प्राची के हैं पग पखारती
 
किन्तु शिल्प में ढले खंड भी पाषाणों के कह देते हैं
संभव नहीं तुम्हारे अंशों जितना भी पायें विस्तारण
 
प्रतिबिम्बित हो बरखा की बून्दों से किरन धूप की कोई
खींचा करती रंग पिरोकर चित्र कामना के, अम्बर में
सतरंगी पुष्पित कमान की प्रत्यंचा के सिरे थाम कर
आस बनाती तुम जैसी हो अभिलाषायें भर कर कर में
 
लेकिन रंगों का फ़ीकापन हो असहाय समर्पित होता
नये रंग के बीज मंत्र का तुमसे ही होता उच्चारण
 

7 comments:

Shar said...

:)

निर्मला कपिला said...

बहुत सुन्दर रचना आभार्

Udan Tashtari said...

सुर से लेकर शब्दों तक की सीमा में ही गूँजा करती
जागी हुई भोर की परछाईं में घुलती हुई आरती
एक शिल्प के आकारों में कुछ गहराई और भर सके
मंदाकिनियां नभ से आकर प्राची के हैं पग पखारती


-अद्भुत रचना!! आनन्द आ गया!!भाई जी..शानदार!

विनोद कुमार पांडेय said...

raakesh ji har baar ek se badhkar ek aapne apne is naye pathak ko rachanaon aur bhavon se abhibhut kar diya bahut hi achchi lagai hai aapki rachnaye jitana aabhar vyakt kare kam hai...saadar prnaam swikaare...

ह्रदय पुष्प said...

सादर नमन

Shardula said...
This comment has been removed by the author.
Kavi Kulwant said...

ek se badh kar ek geet...
aap ka phir aana nahi hua kya?