आँगन हो गया पराया

जकड़े हुए हमें अपनी कुंडलियों में यादों के विषधर
रजनी गंधा जहां महकती थी आँगन हो गया पराया

जीवन की सीमाओं पर अ
पौधे उगे नागफ़नियों के
सिंचित किये दूध से हमने
उपजे होकर फ़ेनिल सपने
लहरें उमड़ी निगल गईं हैं
नावें सब कोमल भावों की
और तीर हैं फ़न फ़ैलाये
तत्पौर हुए साध को डँसने

पायल की हर इक थिरकन पर उठने लगीं उंगलियां जग क
लेकिन क्या घुँघरू ने कहना चाहा कोई समझ न पाया

पग डगमग हैं निष्ठाओं क
बैसाखी पर नैतिकतायें
मूल्यों की परिभाषायें अब
सुबह शाम नित बदला करतीं
किरणों पर शीशे रख कर जो
रंगा सोच कर चित्र बनेगा
उसमें एक अकेली पीड़
सात रंग में सजी संवरती

तारों से उठती सरगम में सभी तलाशे रागिनियों को
लेकिन तार शब्द जो बोले उनको कोई नहीं सुन पाया

किसका आधिपत्य कितना है
किस पर कब निर्धारित होता
आज पास में जो है अपना
कल है संभव नजर न आये
बदल रहे मौसम की मर्जी
किस दिन क्या वह रूप संवार
भादों बने मरुथली, कार्तिक
संभव है सावन बरसाये
कभी कभी ऐसा लगता है छाई हुई धुन्ध को चीरूँ
और पुन: खड़काऊँ साँकल उसकी द्वार न जो खुल पाया

उत्तरदायित्वों के शव पर
कोई नहीं बहाता आँसू
आक्षेपों के तीर निरन्तर
इनदूजे पर छोड़े जाते
अपनी सुविधा वाली राहे
चुन कर सब ही बैठ गये हैं
दोषारोपण किया राह पर
अगर न मंज़िल का पथ पाते

यों चरित्र हमको अवाक इक दर्शक का ही मिला हुआ है
और नयन ने जो कुछ कहना चाहा कोई नहीं पढ़ पाया

Comments

Udan Tashtari said…
कभी कभी ऐसा लगता है छाई हुई धुन्ध को चीरूँ
और पुन: खड़काऊँ साँकल उसकी द्वार न जो खुल पाया


उफ्फ!!

शब्द नहीं हैं पास मेरे..
भावना तुम जान लोगे..
हो अवाक बस ताकता हूँ..
क्या बात मेरी मान लोगे...


-गज़ब!!
Shar said…
:( ?
रंजना said…
उत्तरदायित्वों के शव पर
कोई नहीं बहाता आँसू
आक्षेपों के तीर निरन्तर
इनदूजे पर छोड़े जाते
अपनी सुविधा वाली राहे
चुन कर सब ही बैठ गये हैं
दोषारोपण किया राह पर
अगर न मंज़िल का पथ पाते

Kitna saty kaha aapne....

Rachna ki to kya kahun...iske barabri wale prashana ke shabd khoj pana asambhav hai...
itana bhavpurn aur adbhut kavita aaj tak hamare jaiso ke liye ek kalpana thi aaj samane paya..behtareen kavita ..sundar rachana..bahut bahut dhaywaad rakesh ji
Shardula said…
This comment has been removed by the author.
Shardula said…
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