Posts

Showing posts from December, 2009

इस नये वर्ष में

चाँदनी से बना अल्पना द्वार पर
इस नये वर्ष का आओ स्वागत करें

आस सपने नये आस के रच रही
कोई क्रम फिर न दुहराये गत वर्ष का
वो अनिश्चय, वो संशय की काली घटा
हर निमिष यों लगा युद्ध का पर्व था
अर्थ की नीतियों की जड़ें खोखली
फिर न रह पायें बीते दिनों की तरह
दीप विश्वास के प्रज्ज्वलित कर उगे
इस नये वर्ष की दीप्तिमय हो सुबह

आओ धुंधले पड़े जितने आकार हैं
रंग भर कर उन्हें इन्द्रधनुषी करे


कामना सज रही है ह्रदय में नई
इस नये वर्ष की भोर की रश्मियां
वॄष्टि बन कर सुधा की बरस जायें औ
शांत हों हर तरफ़ जल रही अग्नियाँश
कर रही है विभाजित ह्रदय की गली
चन्द रेखायें दीवार जो खींचकर
भोर उनका तिमिर पी उजेरा करे
स्नह के एक संकल्प से सींचकर

आओ गत वर्ष की याद के पल उठा
विस्मृति के कलश में संजो कर भरें

इस नये वर्ष में फूल जो भी खिले
गंध केवल लुटाता रहे प्रीत की
रागिनी सरगमें छेड़ती बस रहे
फ़ाग की और मल्हार की गीत की
शब्द ओढ़ें नई भूमिका फिर लिखें
इक कथानक नया, एक अध्याय का
पंक्तियों में झलकता रहे आ जहां
भाव अपनत्व के सिर्फ़ पर्याय का.

आओ हर नैन के कैनवस पर यही
चित्र रंगीन हम मिलके चित्रित करें.

क्या भूलूं क्या याद रहा है

दोछत्ती पर रखी हुई थी
एक टोकरी यादों वाली
आज सफ़ाई करते करत
झाडन उसको जरा छू गया
बीते हुए दिवस तितली ब
सजे कक्ष की दीवारों पर
कल का खर्च हुआ हर इक पल
फिर से संचित आज हो गया
और लगे नयनों में तिरने
बरगद,पीपल, वे चौपालें
वे बिसायती वे परचूनी
औ; लकड़ी कोयले की टालें
नानबाई वह चौबुर्जा का
वह नुक्कड़ वाला हलवाई
गरम जलेबी और इमरती
खुरचन रबड़ी दूध मलाई
फिर से उड़े याद के पंछी
मन अम्बर उड़ कर कनकौए
धोबी माली और जुलाह
कहते हुए कहानी नऊए
लड़िया,रिक्शे,बग्घी तांगे
टेम्पो ठेला और फ़टफ़टिया
ओझा,पीर,सयाने,पंडित
ईदगाह, बेगम का तकिया
माली मालिन, ग्वाले ग्वालिन
वे हकीमजी वह पंसारी
वो अफ़ीमची, वह भंगेड़ी
चौपड़ पर बैठा नसवारी
कुंए,पोखर,ताल, तलैय्या
भड़भूजा,भटियारी तेली
सीपी शंख जड़े दरवाज़े
हल्दी रंग में छपी हथेली
बनते हुए चाक पर अविरल
दिवले,कुल्लड़ और सकोरे
मनिहारी चूड़ियां लाख की
सर्राफ़ा, चान्दी के तोड़े

पर क्यों अब इनको अपनापन
देने से मन घबराता है
शाखा से बिछुड़ा पत्ता फिर
कब शाखा से जुड़ पाता है

इसीलिये फिर से समेट कर
एक नई चादर ओढ़ा दी
और दिलासा दिया स्वयं को
वे यादें सब सपना ही थीं

उठ आये हैं प्रश्न हज़ारों

तुमने मुझसे कहा लिखूं मैं गीत तोड़ कर सब सीमायें
मैं लिखने बैठा तो मन में उठ आये हैं प्रश्न हज़ारों

क्या मैं लिखूं न समझा जाये जिसे एक परिपाटी केव
आंसू क्रन्दन मुस्कानें या उपज रही पीड़ा की बातें
प्रीतम के भुजपाशों के पल, दृष्टि साधना के मोहक क्षण
या फिर आंखों के सावन में घिरी हुईं विरहा की रातें

नहीं नहीं ये सब कुछ जाने कितनी बार गया दोहराया
ढूँढ़ रहा हूँ भाव कभी जो सिमटा नहीं शब्द की धारों

हां ये विदित थकी हैं कलमें केवल एक बात दुहराते
फूल, पांखुरी, चन्दन, पुरबा, सावन झूले, गाता पनघट
ब्रज के रसिया, मादक सपरी, भोपा बाऊल की स्वर लहर
और वही इक थिरकी पायल, एक वही कालिन्दी का तट

एक धरोहर, लिखना जिसके आगे शायद कठिन बहुत है
या लकुटी और कांवरिया पर राज तिहुँ पुर कौ तज डारौं

संध्या निशा भोर दोपहरी यदि न लिखूं तो बाकी क्या है
आन्दोलन की चीख पुकारें, रोटी का रोजी का रोना
टुटे हुए स्वप्न के अवशेषों को रह रह कर बुहारना
और ज़िन्दगी की गठरी को बोझ समझ कर कांधे ढोना

तथाकथित इक प्रगतिवाद की सम्भव है ये बनें इकाई
बाँधा है सम्बोधन दे देकर संग परिवर्तन के नारों

सम्भव नहीं कल्पना को अब

संभव नहीं रहा लिख पाऊँ गीत नया कोई शतरूपे
क्योंकि कल्पना के पाखी के पंख किसी ने नोच लिये हैं

ये बहेलिया वक्त न जाने क्या मंतव्य लिये आया है
कैद कर रहा अरमानों के पल पल पंछी कई, जाल में
एक साध ज्यों करवट लेकर आतुर होकर पंख तौलती
उसे बांध कर रख लेता है ये अपने विस्तॄत रूमाल में

वैसे तो आंखों से बह कर आंसू शब्द बना करते थे
किन्तु आजकल बहते आंसू पलकों ने ही पोंछ लिये है

रचती है षड़यंत्र व्यस्तता नित्य घड़ी की सुईयों से मिल
दिन के सारे  प्रहर झपकती पलकों में ही खो जाते हैं
नीड़ छोड़ते पंछी के स्वर सरगम के झूले पर झूलें
इससे पहले, ढली सांझ के रंगों में घुल खो जाते हैं

वे जो पल मॄगशावक से अठखेली करते दिन-उपवन में
समय बाज ने फ़ैला अपने डैने सभी दबोच लिये हैं

भावों की पुस्तक का कोई पन्ना खुलता नहीं आजकल
शब्द लेखनी की गलियों से दूर भटकते हैं आवारा
संशोधित हो गये व्याकरण के सब नियम लगा है ऐसे
इसीलिये शायद कागज़ पर बनता नहीं छन्द दोबारा

हम वह नहीं प्रेरणा कोई जिन्हें कंठ स्वर दे जाती है
वे हैं और लेखनी के जो संदर्भों में  क्रोंच लिये हैं

गीत रागिनी आ गाती है

स्वप्न तुम्हारे हो जाते हैं जब आकर पलकों में बन्दी
तब संभव है कहाँ दूसरा चित्र नयन में बनने पाये
नाम तुम्हारा ढल जाता है जब हर अक्षर के सांचे में
तब फिर गीत दूसरा कैसे यह मेरा पागल मन गाये

ओ परिभाषित तुमसे ही तो सब सन्दर्भ जुड़े हैं मेरे
मेरे चेतन अवचेतन के हर पल में बस व्याप्त तुम्ही हो

आरोहित होती सरगम की सुरलहरी जब अँगड़ाई ले
उठती है तब बोल तुम्हारे पिरो रागिनी में जाती है
और तुम्हारे बिखरे कुन्तल से फ़िसली कजराई लेकर
आंखों में आंजा करती है सांझ, निशा में ढल जाती है

ओ प्रभावमय दिवस निशा का है गतिमान चक्र तुमसे ही
मानस के पट पर जो कुछ है ज्ञात और अज्ञात तुम्ही हो

पगतलियों के चुम्बन से यों मांग सजा लेती हैं राहें
लग जाती है खिलने चारों ओर स्वयं फूलों की क्यारी
पैंजनियों से बातें करने को लालायित हुई हवायें
अपने साथ भेंट में लेकर आती गंधों भरी पिटारी

ओ मधुशिल्पित ! स्पर्श तुम्हारा करता सुधापूर्ण जीवन को
जो अनाम वह तुमही तो हो और सर्व विख्यात तुम्ही हो