Posts

Showing posts from October, 2009

स्वप्न तुम्हारे आकर जब से चूम गये मेरी पलकों को

स्वप्न तुम्हारे आकर जब से चूम गये मेरी पलकों को
निंदिया के आँगन में तब से महकी है क्यारी गुलाब की


संध्या ने समेट ली थी जब बिछी हुई किरणों की चादर
यायावरी दिवस के पल सब लौटे थके, नीड़ को अपने
अम्बर ने लटका दीं विधु की विभा कमन्दें बना बना कर
आये उन पर उतर रात की अमराई से चल कर सपने

जो छू आये चित्र तुम्हारे वे आये मेरी खिड़की पर
दुहराते गाथायें सारी परी कथा वाली किताब की

धवल कपोतों के पंखों पर अटके हुए हवा के झोंके
रुक कर लगे देखने जितने चित्र पाटलों पर बन पाये
सपनों के गलियारे में जो चहलकदमियाँ किये जा रहे
चित्र तुम्हरे, से ले लेकर गीत प्रीत में भिगो सुनाये

जागी हुई हवायें तंद्रित होकर लगीं साथ में बहने
गंगा की धारा में लहरें उलझीं हैं आकर चिनाव की

चादर की सिकुड़न से करवट के जो मध्य रही है दूरी
सिमट गये कुछ चंचल सपने उसमें चुपके चुपके आकर
सांसो की कोमल सरगम पर अपना रंग चढ़ा कर गहरा
अलगोजा लग गये छेड़ने जल तरंग के साथ बजा कर

सरगम की स्वर लहरी पकड़े रहे झूमते सकल निशा में
बने लहर नभ की गंगा के धीमे से ठिठके बहाव की

आधी रात रात रानी के साथ महकता है जब बेला
तब उनकी अवगुंठित गंधों में थे डूबे और नहाये
अंतिम प्रहर रात …

छलछला रह गया है जो, पानी लिखें

ज़िन्दगी के सफ़र में सपन बन गईपर अधूरी रही जो, कहानी लिखें
नैन के बाँध को तोड़ उमड़ा नहीं
छलछला रह गया है जो, पानी लिखें



पांव गतिमान थे साथ गति के सद
कोई मंज़िल नहीं, राह निस्सीम थ
एक पल को भी विश्राम दे न सकी
चाहना की उफ़नती रही थी नदी
उंगलियाँ तो बढ़ीं थीं क्षितिज थाम लें
किन्तु क्षमतायें बौनी हुई रह गईं
दी न स्वीकॄति कभी एक उस बात की
आईने की छवि जो कभी कह गई

जो छलावा बनी, बस लुभाती रही
पास आई नहीं, रुत सुहानी लिखें

आस के बीज बोये हुए, चुग गया
बन पखेरू समय, उम्र के मोड़ पर
कामना बन्धनों में बँधी रह गई
बढ़ नहीं पाई सीमाओं को तोड़कर
भाव मन के सभी थरथरा रह गये
शब्द में ढाल कर होठ कह न सके
आँधियाँ आ उड़ा ले गईं पास का
पल विफ़ल प्राप्ति के सिर्फ़ बह न सके

मान जिसको रखा अपनी परछाईं था
दुश्मनी उसने सीखी निभानी लिखें

पतझड़ी पत्र बन कर दिवस उड़ गये
नींद थी रात से वैर ठाने हुए
धूप के जितने टुकड़े गिरे गोद में
सावनी मेघ के थे वे छाने हुए
पंथ ने पी लिये थे दिशा बोध के
चिन्ह जो भी लगाये गये राह में
पथ खज़ूरों तले ही झुलसते रहे
छाँह का पल न आया तनिक बाँह में


पूरे दिन सुरमई रंग ओढ़े रहा
नभ हुआ ही नहीं आसमानी लिखें

दीपमालिका अब ऐसी हो

जो चषक हाथ धन्वन्तरि के थमा, नीर उसका सदा आप पाते रहें
शारदा के करों में जो वीणा बजी, तान उसकी सदा गुनगुनाते रहें
क्षीर के सिन्धु में रक्त शतदल कमल पर विराजी हुई विष्णु की है प्रिया
के करों से बिखरते हुए गीत का आप आशीष हर रोज पाते रहें
-------------------------------------------------------------------------------


दीप दीपावली के जलें इस बरस
यूँ जलें फिर न आकर अँधेरा घिरे
बूटियाँ बन टँगें रात की ओढ़नी
चाँद बन कर सदा जगमगाते रहें

तीलियाँ हाथ में आ मशालें बनें
औ तिमिर पाप का क्षीण होता रहे
होंठ पर शब्द जयघोष बन कर रहें
और ब्रह्मांड सातों गुँजाते रहें

दांव तो खेलती है अमावस सदा
राहु के केतु के साथ षड़यंत्र कर
और अदॄश्य से श्याम विवरों तले
है अँधेरा घना भर रही सींच कर
द्दॄष्टि के क्षेत्र से अपनी नजरें चुरा
करती घुसपैठ है दोपहर की गली
बाँध कर पट्टियां अपने नयनों खड़ी
सूर समझे सभी को हुई मनचली

उस अमावस की रग रग में नूतन दिया
इस दिवाली में आओ जला कर धरें
रश्मियां जिसकी रंग इसको पूनम करें
पांव से सर सभी झिलमिलाते रहें

रेख सीमाओं की युग रहा खींचत
आज की ये नहीं कुछ नई बात हैअ
और सीमायें, सीमाओं से बढ़ गईं
जानते हैं सभी, सबको आ…

केवल तेरा नाम पुकारा

सरगम के पहले पहले सुर से जो जुड़ा, नाम तेरा है
इसीलिये प्रस्फ़ुटित स्वरों ने केवल तेरा नाम पुकारा

वीणा के कम्पित तारों से धुन जब जागे, तुझे पुकारे
प्राची के पट खोले ऊषा नित्य भोर में, तुझे निहारे
वनपाखी के स्वर में तू ही, तू हीन गुंजित मंत्र ध्वानि में
तेरा नाम गुनगुना कर ही लहरें तट के पांव पखारे

बही हवा की वल्लरियों में वंशी के पोरों को छूकर
तेरा ही बस एक नाम है तान तान ने जिसे उचारा


श्यामल घटा मधुप का गायन, जलतरंग की कोमल सिहरन
नयन दीर्घा से सम्प्रेषित, मौन तरंगों का आलोड़न
भावों का मॄदु स्पर्श, सुरीले अहसासों की फ़ैली चादर
और शिराओं में संवाहित होती हुई अजब सी झन झन

सन्देशों के आदिकाल से क्रमवत होती हुई प्रगति का
केवल तू ही उत्प्रेरक है, जिसने इनका रूप निखारा

मात्राओं ने सहयोगी हो शिल्प संवारा जब अक्षर का
ध्वनियों ने अनुशासित होकत, जब आकार लिया है स्वर का
भाषाओं की फुलवारी में महके फूल शब्द के जब जब
या कि व्याकरण की उंगली को पकड़े ह्रदय छंद का धड़का

तब तब उभरा है तेरा ही संबोधन, चित्रण औ’ गायन 
तेरा नाम सुवासित करता है गलियाँ, आँगन चौबारा

आवश्यक है क्या ?

पूजा दीप बना मंदिर में जल जाऊँ आवश्यक है क्या
तुमसे प्यार मुझे है सबको बतलाऊँ आवश्यक है क्या ?

किससे कहूँ तुम्हारा मेरा साथ- धार का है उद्गम से
तुमसे जुड़ा नाम रहता है ज्यों प्रयाग का जुड़ संगम से
चन्दन  के संग हो पानी का, हो प्रसाद का तुलसी दल से
वीणा के तारों की कंपन का रिश्ता होकर सरगम से

एक बात को सुबह शाम मैं दुहराऊँ आवश्यक है क्या ?
तुमसे प्यार मुझे है सबको बतलाऊँ आवश्यक है क्या ?

कहूँ ह्रदय हो तुम सीने में और तुम्हारी धड़कन हूँ मैं
तुम हो एक पैंजनी झंकॄत और तुम्हारी थिरकन हूँ मैं
तुम अज्ञात अबूझे हो तो मैं रहस्य हूँ कोई गहरा
हो तुम झोंका गंध भरा, तुमसे उपजी जो सिहरन हूँ मै

वर्णित करता तुम्हें गीत में, मैं जाऊँ आवश्यक है क्या ?
तुमसे प्यार मुझे है सबको बतलाऊँ आवश्यक है क्या ?

चढ़ते हुए दिवस की होती दोपहरी बनने की आशा
करूँ निकटता प्राप्त तुम्हारी पल पल पर बढ़ती अभिलाषा
आवारा हो गई हवाओं के सँग मचली हुई लहर सी
उड़ी उंमंगों का क्षितिजों का पार जानने की जिज्ञासा

लेकिन जो कुछ छुपा हुआ है,जान पाऊँ,आवश्यक है क्या ?
तुमसे प्यार मुझे है सबको बतलाऊँ आवश्यक है क्या ?