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Showing posts from September, 2009

कपोल चूमे पिया तुम्हारे

ज्यों पूर्णिमा को घिरीं अचानक घटायें श्यामल आ चन्द्रमा पे
बिखरते कुन्तल ने आज वैसे कपोल चूमे पिया तुम्हारे

ज्यों दूध, केसर घुले हुए में पड़ी परत हो इलायची की
या राधिका के बदन पे पड़ती हो श्याम परछईं श्याम की ही
ज्यों पर्वतों के हिमाच्छादित  शिखर पे उमड़ें धुंये के बादल
दिवस के तीजे प्रहर में उतरे आ पालकी ढलती शाम की ही

ज्यों बाग में आ मधुप ने चुम्बित किये अधर कलियों के सुकोमल
कुछ वैसे चंचल चिकुर मचल कर अधर को चूमें पिया तुम्हारे

सुबह की पहली किरन ने झांका निशा की जैसे हटा के चादर
ज्यों चमके बिजली घनी घटाओं में जो कि उमड़ी हो सावनों में
हो चमकी यमुना नदी के तट पर थिरकती परछाईं ताजंमहली
या रास करती दिखे है गोपी नदी किनारे सघन वनों में


हटा के गहरा तना कुहासा हो खोलता पट उषा के दिनकर
सुबह की लाली आ केश छितरा अधर को चूमे पिया तुम्हारे


लिया दिशाओं ने आँज काजल हो जैसे चौदहवीं यामिनी को
या नभ की मंदाकिनी के तट पर घिरे हों आकर घने कुहासे
खिला हो नीरज अमावसी इक निशा के यौवन में मुस्कुराकर
या संगे मरमर को आबनूसी शिला में जड़कर कोई तराशे


अंधेरे मन की गहन गुफ़ा में छनी हो आकर के रश्मि कोई
हैं चित्र संवर…

किसी भी गीत को गाते नहीं हैं

कसमसाते, छटपटाते स्वर गले के आ अधर पर
किन्तु जाने क्यों किसी भी गीत को गाते नहीं हैं

गीत बन गोविंद चढ़ते बाँसुरी पर जिन पलों में
वे सभी पल आज सहसा ही अपिरिचित हो गये है
प्रीत के पुंकेसरी कण जो उड़ाती थीं हवायें
आज वे चढ़ कर घटाओं के परों पर खो गये हैं
वादियों में शांत हो लेटी हुई पगडंडीयाँ अब
हैं गई कतरा, न देती पगतली पर दस्तकें भी
चिमनियों से उठ रहे अलसाये बल खाते धुँए में
गुंथ गई हैं हलचलों की सोई जागी करवटें भी

हाथ में लेकर कटोरा शब्द की लाठी संभाले
जो खड़ा है भाव उससे नैन मिल पाते नहीं हैं


थरथराती कल्पना की टूटती लेकर उड़ानें
फिर धराशायी हुई है भावना मन की अकेली
पंथ पनघट के विजन हैं हैं सभी चौपाल उजड़ी
शून्य में केवल खड़ी है देह की खेंडहर हवेली
उंगलियों के पोरुओं पर अक्षरों के चंद मनके
घूम फिर कर फिर उसी प्रारंभ पर आ रुक गये हैं
जो कभी तन कर खड़े थे देवदारों से बड़े बन
वे सभी संकल्प जाने क्यों अचानक झुक गये हैं

भेजती रहती निगाहें स्वप्न को अविरल निमंत्रण
पर क्षितिज पर धुंध में आकार बन पाते नहीं हैं

जल रही हैं नित अपेक्षायें दिये सी जगमगाती
आस के भ्रम को उगी किरणें सुबह की तोड़देतीं
साध करती है निरन्तर वैर सुधि …

देहरी पर दीपक जलते तो हैं पर सभी उधार के

कितनी बार आस के पंछी उड़े व्योम में वपिस लौटे

भरने को उड़ान लम्बी सी, पंख रहे हैं उनके छोटे
मुट्ठी में हो कैद रह गये स्वप्न सभी विस्तार के
मुरझा गये फूटने से पहले ही अंकुर प्यार के


जीवन की नौटंकी में था सूत्रधार अलसाया कोहरा
टँगा हुआ था मावस्या का अंधियारा होकर के दोहरा
नेपथ्यों में विलय हो गई कथा पटकथायें निर्देशन
मुख्य भूमिका चुरा ले गया पिटा वक्त से जो था मोहरा


दॄश्य दीर्घा में बैठे आ आलोचक व्यवहार के
मुरझा गये फूटने से पहले ही अंकुर प्यार के


टीका लगा तिमिर को कितनी बार विदा कर कर के भेजा
रंग वही लेकिन भर पाया पागल इस मन का रंगरेजा
शीशे के टुकड़ों से बिम्बित हुई न आकर किरणें, भटकीं
गंध बिखर उड़ गई हवा में कितना उसको रखा सहेजा


खिले नही अँगनाई में बोये पौधे कचनार के
मुरझा गये फूटने से पहले ही अंकुर प्यार के


आयातित होते प्रकाश पर रहा नहीं अधिकार हमारा
हुआ नहीं अपना पहले से ले आखिर तक कोई सितारा
फूटे हुए कुमकुमों में था शेष नहीं अवशेष ज्योति का
संचय की झोली में आकर रह नहीं पल भी उजियारा


देहरी पर दीपक जलते तो हैं पर सभी उधार के
मुरझा गये फूटने से पहले ही अंकुर प्यार के