Posts

Showing posts from July, 2009

याद तुम्हारी ही बरसाये

फिर सावन की ॠतु आई है फिर अम्बर पर बादल छाये
केवल एक तुम्हारी यादें, हर उमड़ा बादल बरसाये


मल्हारों में घुल कर गाती हैं जो भीगी हुई हवायें
या रिमझिम झीलों की लहरों से जा जा कर जो बतियाये
संदलबदए ! नाम तुम्हारा है, जिसको चाँदी की रेखा
बनकर कलम श्याम पन्ने पर आ अंबर के लिखती जाये


मीठा सा अहसास उभर कर मुझे बाँह में भरता जाये
केवल एक तुम्हारी यादें, हर उमड़ा बादल बरसाये


खिड़की के शीशे पर नाचा करते इन्द्रधनुष अनगिनती
एक तुम्हारी छवि ही रँग कर निज रंगों में दिखलाते है
बून्दों की दस्तक खोला करती है द्वार नयन के फिर से
जोकि तुम्हारी छवि प्रवेश के बाद स्वयं ही भिड़ जाते हैं


उठी धरा से सौंधी खुश्बू गंध तुम्हारी बन छा जाये
केवल एक तुम्हारी यादें, हर उमड़ा बादल बरसाये


उमड़ी हुई घटायें देती हैं आवाज़ें, खुल जाते हैं
आधे लिखे हुए गीतों की पुस्तक के सारे ही पन्ने
और तुम्हारे चित्रण वाले गीत पूर्ण हौं इससे पहले
छलकी भावों की गागर से नये गीत लगते हैं बनने


लेकिन फिर भी जाने कैसे गीत अधूरा हर रह जाये
केवल एक तुम्हारी यादें हर उमड़ा बादल बरसाये

जाने क्यों ?

जाने क्यों हर गीत अचानक लगता है रह गया अधूरा
जाने क्यों लगता है कह कर भी कुछ तो कहना है बाकी
जाने क्यों लगता है मदिरा सुधि ने जितनी पी है कम है
जाने क्यों लगता है प्याला छोड़ रही है रीता साकी

जाने क्यों लगता है मुट्ठी बन्द, अभी भी खुली हुई है
जाने क्यों लगता है सपबा और एक बनना नयनों में
जाने क्यों लगता है अब भी है श्रंगार अधूरा मन का
जड़े कल्पनाओं में , बाकी शेष अभी है कुछ गहनों में

जाने क्यों लगता है बातें मेरी अभी अधूरी हैं सब
यद्यपि निशा लगी है ढलने तुमसे वे सब कहते कहते
जाने क्यों लगता है मन का पर्वत अब भी है वैसा ही
चाहे वर्षों बीत गये हैं एक पीर में उसे पिघलते

जाने क्यों लगता है परिचय के पश्चात अपिरिचित हो तुम
जाने क्यों लगता है मेरे होकर, नहीं हुए तुम मेरे
जाने क्यों लगता है हर एक रोज उषा आती है जब जब
सूरज के सँग ले आती है और उमड़ते घने अँधेरे

जाने क्यों लिखकर भी ऐसा लगता, लिखा नहीं है कुछ भी
जाने क्यों हर बार शब्द ये मेरे, अक्षम हो जाते हैं
तुम यदि समझ सको तो आकर मुझको भी बतलाते जाना
कहाँ छन्द बनने से पहले भाव ह्रदय के खो जाते हैं

बीन के पांखुर पांखुर

फूल उम्मीद के खिलते ही रहे हर सुबह
सांझ ले जाती रही बीन के पांखुर पांखुर
बात होठों पे मचलती तो रही शब्द बने
साथ देने को गले से न उठा लेकिन सुर

हमने गमलों में सदा चांद किरण बोई हैं
और चाहा है खिलें फूल सितारों के ही
हमने आशायें दिवाली के दियों में पोईं
और चाहा है रहें राह बहारों की ही
स्वप्न की झील में रातों को लगाते गोते
सूर्य से रोज सुबह मांगा है मोती हमने
ओस की बून्दों में ढूँढ़े हैं सदा हीरकनी
चाह का शैल नहीं पल भी दिया है गलने

पर दुपहरी में मरुस्थल के किसी पनघट सी
रिक्त रह जाती रही बांधी हुई हर आंजुर

कांच के टुकड़ों से छितरी हुई किरणें लेकर
हमने आशा की दुल्हन के हैं सजाये गहने
ज्ञात ये हो भी ग्या सूख रहे हैं उद्गम
एक निर्झर जो बहा उसको दिया है बहने
मानते आये निशा जब भी कदम रखती है
कुमकुमे आप ही जलते हैं रोशनी झरती
एक विधना की उंगलियों की थिरक है केवल
ज़िन्दगी जिसके इशारे पे रही है चलती

आज को भूल गये कल क्या लिये आयेगा
बस यही जान सकें होते रहे हैं आतुर

हम तमाशाई बने देख रहे हैं जीवन
पात्र बन पायें कभी, हो न सका है साहस
हम स्वयं राह बनायें न हुआ है चाहा
कोई निर्देश हमें देके दिखा जाये बस
अपनी बांहों में भरे एक कल…

शब्दों को गीतों में किस तरह सजाउँ

ओ सुलोचने छुआ नहीं है जिन्हें तेरे अधरों की स्मित ने
तू ही बतला उन शब्दों को गीतों में किस तरह सजाउँ

तेरे एक कंठ के स्वर से मिला जन्म है रागिनियों को
तेरी वाणी की थिरकन से सरगम ने आ आंखें खोलीं
तेरे दॄष्टि पात से उभरी भोर नई अँगड़ाई लेकर
तेरे कुन्तल लहराये तो रजनी की उतरी आ डोली

पलको के पीछे अब तक जो लेकिन सोई हुई सांझ है
नीरजनयने तू ही बतला कैसे उसका रूप दिखाऊँ

उठे हाथ अलसाये तेरे लहरें लगीं काँपने तट पर
पथरज ने पग चूमे तेरे, द्वारे पर बन गई अल्पना
आँचल की लहराती कूची ने रँग दिया क्षितिज रंगों में
त्रिवली की थिरकन से पाने लगती है विस्तार कल्पना

एक एक कण बँधा प्रकॄति का तेरे नयनों की चितवन से
कला साधिके ! सोच रहा हूँ उसको क्या दे नाम बुलाऊँ

तेरे अधर खुले तो पाया अर्थ नया कुछ गाथाओं ने
तेरी अर्ध निमीलित पलकें निशा दिवस को किये नियंत्रित
तेरे हाथों की मेंहदी के बूटों ने जब छेड़ा इनको
कंगन ने सारंगी बनकर नूतन राग किये अन्वेषित

लेकिन जो इक परछाईं के साये में घुल कर ही रह ली
ओ शतरूपे बतला कैसे उस प्रतिमा पर फूल चढ़ाऊँ

यह गीत आख़िर कौन गाता

मौन सरगम की अधूरी रागिनी का हाथ थामे
ज़िंदगी के तार पर यह गीत आख़िर कौन गाता

है अजानी सी किसी अनुभूति का यह स्पर्श कोमल
गंध की बदरी उमड़ कर कर आई कोई वाटिका से
पांखुरी को छु रही हो बूँद कोई ओस की ढल
दूब में सिहरन कोई जागी हुई चंचल हवा से

जानने की कोशिशें आती नहीं हैं हाथ मेरे
शिंजिनी में देह की है कौन आकर झनझनाता

सूर्य की पहली किरण की दुधमुँही अंगड़ाई जैसा
बालपन से रह रही मन में किसी परिचित कथा सा
है उतरता दॄष्टि की अँगनाई में बन कर दुपहरी
घेर कर जिसको खड़ा है भोर से जैसे कुहासा

बढ़ रही महसूसियत की खिड़कियों पर आ खड़ा हो
कौन है आकाश पर जो चित्र कोई खींच जाता

दर्पणों पर झील के लिक्खा हवा के चुम्बनों ने
जलतरंगों ने जिसे तट की गली में आ सुनाया
धूप का सन्देश उलझा शाख की परछाईयों में
मोगरे ने मुस्कुरा जो रात रानी को बताया

एक वह सन्देश जिसने केन्द्र मुझको कर लिया है
कौन है आ परिधि पर होकर खड़ा मुझको सुनाता