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Showing posts from May, 2009

पढ़ा नहीं है पत्र तुम्हारा

खुला नहीं है बन्द लिफ़ाफ़ा अभी हवा का वन से आकर
इसीलिये ही पत्र तुम्हारा पढ़ा नहीं कोयल ने गाकर

ये तो है अनुमान मुझे क्या तुमने लिखा पत्र में होगा
एकाकीपन घेरे रहता है यादों के दीप जलाये
और एक आवारा बदली ठहरी हुई नयन के नभ पर
नीर भरी कलसी ढुलकाती है जब भी उसका मन आये

और लिखा होगा असमंजस जो उतरा है मन में आकर
इसीलिये ही पत्र तुम्हारा पढ़ा नहीं कोयल ने गाकर

आग लगाता मन में,होगा लिखा,यहां जब बरसे सावन
और उमड़ती गंधें चुभती कांटा बन बन कर सीने में
क्रूर पपीहा जाने क्योंकर मुझको अपना राग सुनाये
और शिला जैसी है बोझिल सांस सांस लगता जीने में

शायद ये भी लिखा पीर ही रखती है मुझको बहलाकर
इसीलिये ही पत्र तुम्हारा पढ़ा नहीं बुलबुल ने गाकर

चन्दन की ले कलम शहद में डुबो लिखे होगे जब अक्षर
और शब्द में उभरा होगा नाम स्वत: ही मेरा आकर
चूमी होगी उस पल तुमने सौ सौ बार हथेली अपनी
और पत्र फिर खोला होगा बन्द हुआ फिर से अकुलाकर

भेजा शायद एक फूल भी तुमने उस के साथ लगाकर
अब तक लेकिन पत्र तुम्हारा पढ़ा नहीं मौसम ने गा कर

प्रीत का पहला निमंत्रण

याद आया है मुझे वह प्रीत का पहला निमंत्रण
जो हवा ने गुनगुना कर द्वार पर मेरे पढ़ा था

स्वप्न जो अंगनाईयों में आंख की पलते रहे थे
वो लगा सहसा मुझे, साकार सब होने लगे हैं
और जो असमंजसों के पल खड़े थे, चित्र बन कर
कामना के ज्वार में घिरते हुए खोने लगे हैं

पैंजनी का सुर खनकने लग गया है आज फिर वह
कॄष्ण की जो बासुरी पर राग में ढल कर चढ़ा था

याद फिर आया अधर का थरथराना, मौन वाणी
याद वह संदेश, आये जो हवाओं के परों पर
दॄष्टि की किरणें,पिरोती अक्षरों की गूँथ माला
और मन की बात को रचती हिनाई उंगलियों पर

एक बूटा वह लगा है आज गाने गीत फिर से
पांव के नख से धरा के शाल पर जो आ कढ़ा था

दंत-क्षत पल्लू सुनाने लग गये हैं फिर कहानी
उंगलियों के चिन्ह फिर से छोर पर बनने लगे हैं
फिर किताबों में सुगन्धित हो गये हैं फूल सूखे
और गुलमोहर पुन: अब शाख से झरने लगे हैं

बात करने लग गया है एक वह रूमाल मुझसे
एक दिन जिस पर अचानक होंठ का चुम्बन जड़ा था

फिर संवरने लग गये हैं पात पीपल के सुनहरे
फिर घटाओं ने लिखा है बूँद से सन्देश कोई
फिर पखेरू बन उड़ी है कामना जीवन्त होकर
कल्पना फिर गुनगुनाने लग गई है दूध धोई

आज फिर वह भाव करने लग गया है नॄत्य मन में
जो कभ…

तीन सौवीं प्रस्तुति---सांझ का दिया जला नहीं

सूरज आज भी अपने समय पर ही निकला है और प्राची से ही निकला है, मौसम में भी कोई परिवर्तन नहीं. सब कुछ वैसे का वैसा ही है केवल एक बात अलग है. आज गीत कलश पर यह तीन सौवीं प्रस्तुति है.आपके स्नेह ने प्रेरणा बन कर इस यात्रा में निरन्तर गतिमय रहने का प्रोत्साहन दिया है और वही स्नेह मेरा मार्गदर्शक रहा है. आप सभी को आभार देते हुए प्रस्तुत है

साँझ का दिया जला नहीं


भोर जब हुई तो पंछियों ने गीत गाये थे
रश्मियों के तार छू हवा ने गुनगुनाये थे
पर छली थी दोपहर, सो एक घात हो गई
सांझ का दिया जला नहीं कि रात हो गई

नीड़ ने बना रखी थी द्वार एक अल्पना
और हाथ में उंड़ेल रंग भर रही हिना
लौट कर कदम दिवस के जब इधर को आयेंगे
पल थके तिवारियों में आ के पसर जायेंगे
सिगड़ियों में आग जागने से मना कर गई
गुड़गुड़ी उठी न जाने किस घड़ी किधर गई
अलगनी पे जो अटक के रह गये थे तौलिये
एक पल में जाने कैसे पाग बन को सो लिये

पांव जो पखारती
आ थकन उतारती
गागरी बिखर के रिक्त इक परात हो गई
सांझ का दिया जला नहीं, कि रात हो गई

ज़िन्दगी बनी रही अधूरा इक समीकरण
एक संधि पे अटक गई समूची व्याकरण
प्रश्न पत्र में मिले जो प्रश्न थे सभी सरल
पर न जाने क्यों जटिल हुआ सभी का…

अंधियारे के शब्द कोश में मिलता नहीं सूर्य का परिचय

चढ़ा नकाब व्यस्तताओं का निगल रहा है दिन दोपहरी
और समय के गलियारे में भटक गई कविता कल्याणी

थिरक रहे पांवों में पायल मौन रहे कब हो पाता है
अंधियारे के शब्द कोश में मिलता नहीं सूर्य का परिचय
काई जमे ताल के जल से प्रतिबिम्बित न किरन हो सकी
खुली हाथ की मुट्ठी में कब हो पाता है कुछ भी संचय

तो फिर उथली पोखर जैसे मन में उठे भाव की लहरें
संभव यह तो कभी कल्पना में भी नहीं हुआ पाषाणी

कमल पत्र के तुहिन कणों का हिम बन जाना सदा असम्भव
और मील के पत्थर कब कब तय कर पाते पथ की दूरी
दर्पण की मरमरी गोद में भरते कहां राई के दाने
कहो रंग क्या दोपहरी का कभी हो सका है सिन्दूरी

प्रतिपादित चाणक्य नियम से बंधी रही हो सारा जीवन
सरगम नहीं उंड़ेला करती विष से बुझी हुई वह वाणी

बदला करती नहीं उपेक्षा कभी अपेक्षाओं की चादर
अपना चेहरा ढक लेने से सत्य नहीं ढँक जाया करता
हर मौसम बासन्ती ही हो ये अभिलाषा अर्थहीन है
पतझर को आना ही है तो बिना नुलाये आया करता

गति का नाम निरन्तर चेतनता के संग में लिखा हुआ है
चाहे न चाहे वल्गायें स्वयं थाम लेती हैं पाणी

अपने गीत सुनाता हूं मैं

छन्दों का व्याकरण अपरिचित होकर रहा आज तक हमसे और गज़ल का बहर काफ़िया, सब कुछ ही रह गया अजाना काव्य सिन्धु का तीर परे है बहुत हमारी सीमाऒं के सत्य यही है, क्षमतायें भी सीमित हैं हमने पहचाना किन्तु ह्रदय की सुप्त भावना में गिर कंकर एक भाव का शान्त लहर में कोई हलचल सहसा कभी जगा जाता है तो निस्तब्ध ह्रदय का पाखी मुखरित कर अपनी उड़ान को अपने स्वर की पीड़ित सरगम को झट से बिखरा जाता है गूँथ रखे हूं सरगम के मैं वो ही स्वर अपने शब्दों मे और उन्हीं को समो कंठ में अपने गीत सुनाता हूं मैं मंदिर की चौखट पर बिखरे हुए फूल की क्षत पंखुड़ियां रिसता हुआ उंगलियों में से बून्द बून्द कर अभिमंत्रित जल आशंका से ग्रस्त दीप की थर थर होती कंपित इक लौ डगमग होता हुआ धुंआसी हुई आस्थाओं का सम्बल शीश तिलक के पीछे अंकित चुपे हुए अनबूझ सन्देसे और आरती का स्वागत या विदा प्रश्न पर उलझे रहना अगरु धूम्र में लिपटे लिपटे छितरा जाती हुई आस का रह रह कर अपनी सीमा में छुपते हुए मौन हो रहना ये जो भाव दूर ही रहते आये देव चरण से अक्सर इन सबको समेट कर अपने संग में, अर्घ्य चढ़ाता हूँ मैं पांवों की ठोकर से बिखरे हुए देहरी पर के अक्षत पूजा की चौकी पर नव ग्रह …