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Showing posts from March, 2009

फिर क्या शेष अभीप्सित जीवन का

नीलकंठ का नाम हमें जब तूने दे ही दिया ज़िन्दगी
फिर क्या शेष अभीप्सित जीवन का है जो तुझको बतलायें

चाहत से यथार्थ के अंतर की दूरी पर कदम बढ़ाकर
सोचा था हम चलते जायेंगे इस पथ पर हँस कर गाकर
लेकिन तूने दिशा बोध के जो उपकरण दिये हाथों में
वे दिखलाते पग पग पर हैं बने हुए शत शत रत्नाकर

नाविक कहकर तूने हमको दे तो दी पतवार हाथ में
लेकिन साथ साथ सौंपी हैं लहर लहर भीषण झंझायें

अभिलाषाओं के दीपक में बटी हुई सपनों की बाती
महज कल्पना के तेलों से संभव नहीं तनिक जल पाती
तीली की हर लौ पर तूने लगा दिये सीलन के पहरे
और कह दिया हमें, हमारी संस्कॄतियों की है यह थाती

जितने भी मोहरे बिसात पर रखे हुए हैं, हैं अभिमंत्रित
उनके बस में कहाँ स्वयं ही चालें निर्धारित कर पायें

बाधाओं के समाधान की उत्सुकता भर कर बाहोँ में
उगते हुए दिवस, रजनी में ढलते रहे बिछी राहों में
पगडंडी ने साथ न पग का दिया किसी भी एक मोड़ पर
मॄगतृष्णायें रहीं सँवरती, आँखों में पलती चाहों में

प्रश्न अधूरे होते अक्सर, ये तो हर कोई स्वीकारा
लेकिन तेरे आधे उत्तर की गाथायें किसे सुनायें

अब सम्बन्ध कलम से मेरा

सम्बन्धों के अनुबन्धों की लगता अवधि हो गई पूरी
करती हैं विच्छेद उंगलियां अब सम्बन्ध कलम से मेरा

बही भाव के निर्झर से नित, अविरल एक शब्द की धारा
होठों ने कर लिया आचमन और कंठ स्वर ने उच्चारा
अलंकरण आ गये सजाने, सांचे में शिल्पों ने ढाला
अनुप्रासों ने दर्पण अपना दिखा दिखा कर रूप संवारा

लेकिन इक विराम की बिन्दी लगता है अब रोके पथ को
लगा उमड़ने धीरे धीरे मन अम्बर पर घना अंधेरा

सन्दर्भों से उपमाओं के जो सम्बन्ध रहे वे टूटे
सर्ग व्याकरण के जितने थे, एक एक कर सारे रूठे
शब्दकोश ने अपनी संचित निधि से दी कुछ नहीं उधारी
और पात्र जिनमें हम अक्षर रख सकते थे, सारे फूटे

वाणी हुई निरक्षर, कोई वाक्य नहीं चढ़ता अधरों पर
मेरी गलियों में आकर अब मौन, लगाये बैठा डेरा

बजे भावना की शहनाई पर न सजे बारात छन्द की
खिले हुए फूलों को छूकर बदली उमड़े नहीं गन्ध की
तारों का कम्पन ढलता ही नहीं किसी सरगम के सुर में
कला हुई विस्मॄत जो सीखी, कभी अन्तरों के प्रबन्ध की

धब्बा एक बना स्याही की केवल कागज़ पर दिखता है
कूची लेकर आज शब्द का मैने जब भी चित्र चितेरा

बजी नहीं कोई शहनाई

काजल पहरेदार हो गया
सपने रोके आते आते
रंग बिखर रह गये हवा में
चित्र रहे बस बन कर खाके
होठों की लाली से डर कर
मन की बात न बाहर आई
कंगन करता रहा तकाजा
लेकिन चुप ही रही कलाई

सोचा तो था बांसुरिया के रागों पर सरगम मचलेगी
जाने क्या हो गया बांसुरी कोई गीत नहीं गा पाई

महावर की खींची रेखा को
लांघ नहीं पाया पग कोई
पायल की बेड़ी में बन्दी
घुंघरू की आवाज़ें खोईं
बिछुआ पिसता रहा बोझ से
कुछ कह पाने में अक्षम था
रहा बोरला गुमसुम बैठा
पता नहीं उसको क्या गम था

अटकी हुई तोड़िये की लहरों पर एक अकेली बोली
रह रह नजर झुका लेती थी जाने थी किससे शरमाई

तय तो करती रही अंगूठी
नथनी के मोती तक दूरी
उंगली रुकती रही होंठ पर
जाने थी कैसी मज़बूरी
आतुर बाजूबन्द रहा था
अपने एक बिम्ब को चूमे
लाल हुई कानों की लौ पर
बुन्दों का भी मन था झूमें

उत्कंठा कर रही वावली, जागी हुई भावना मन में
ध्यान लगाये सुना गूँज कर बजी नहीं कोई शहनाई

कोई गीत नहीं गा पाता

शब्द अटक रह गये अधर पर, वाणी साथ न देने पाती
हो विक्षुब्ध मन मौन पड़ा है, कोई गीत नहीं गा पाता

एक अनिश्चय निगल रहा है उगी भोर की अरुणाई को
और दिशायें छेड़ रही हैं असमंजस की शहनाई को
आशंका के घने कुहासे में लिपटा दिखता है हर पथ
हो जाता भयभीत ह्रदय अब देख स्वयं की ही परछाईं

विषम परिस्थितियां सुरसा सी खड़ी हुईं फ़ैलाये आनन
समाधान को बुद्धिमता का रूप नहीं लेकिन मिल पाता

दहला जाता है मन को अब दिखता रंग गुलाबों वाला
बुना भाग्य की रेखाओं पर एक गूढ़ मकड़ी का जाला
विश्वासों की नींव ढही जाती है बालू के महलों सी
पीता हुआ रोशनी हँसता केवल घिरा अँधेरा काला

दिशाबोध के चिन्ह घुल गये कुतुबनुमा भी भ्रमित हुई है
मुड़ने लगीं राह भी वापिस, उनको पंथ नहीं मिल पाता

बिखराता है तिनके तिनके पंछी स्वयं नीड़ को अपने
और विवश नजरों को लेकर बीना करता खंडित सपने
अभिमन्यु घिर चक्रव्यूह में, मदद मांगता है जयद्रथ से
ओझा कौड़ी फ़ेंक, नाग को करता है आमंत्रित डँसने

पासों के षड़यंत्र बढ़ गये, और समर्पित हुआ युधिष्ठिर
इतिहासों की गाथाओं से कोई सबक नहीं मिल पाता

धूप को वह पथ दिखाये

चाह तो है शब्द होठों पर स्वयं आ गीत गाये
स्वप्न आंखों में सजे तो हो मुदित वह गुनगुनाये

पॄष्ठ सुधियों के अधूरे, पुस्तकों में सज न पाते
उम्र बीती राग केवल एक, वंशी पर बजाते
हाथ जो ओढ़े हुए थे मांगने की एक मुद्रा
बांध कर मुट्ठी कहां संभव रहा कुछ भी उठाते

कर्ज का ले तेल बाती, एक मिट्टी का कटोरा
चाहता है गर्व से वह दीप बन कर जगमगाये

सावनों के बाद कब बहती नदी बरसात वाली
बिन तले की झोलियाँ, रहती रहीं हर बार खाली
मुद्रिकाओं से जुड़े संदेश गुम ही तो हुए हैं
प्रश्न अपने आप से मिलता नहीं होकर सवाली

ओस का कण धूप से मिलता गले तो सोचता है
है नियति उसकी, उमड़ती बन घटा नभ को सजाना

अर्थ तो अनुभूतियों के हैं रहे पल पल बदलते
इसलिये विश्वास अपने, आप को हैं आप छलते
मान्यताओं ने उगाये जिस दिशा में सूर्य अपने
हैं नहीं स्वीकारतीं उनमें दिवस के पत्र झरते

रात के फ़ंदे पिरोता, शाल तम का बुन रहा जो
उस प्रहर की कामना है धूप को वह पथ दिखाये

बोलने लग गये रंग

एक ही चित्र में रंग जब भर दिये, तूलिका ने ढली सांझ अरुणाई के
कालनिशि के तिमिर में नहाई हुई भाद्रपद की अमावस की अँगड़ाई के
फूल की गंध के प्रीत के छन्द के, तो लगा आपका चित्र वह बन गया
बोलने लग गये रंग सरगम बने ढल गये गूँज में एक शहनाई के