सम्भव नहीं कल्पना को अब

संभव नहीं रहा लिख पाऊँ गीत नया कोई शतरूपे
क्योंकि कल्पना के पाखी के पंख किसी ने नोच लिये हैं

ये बहेलिया वक्त न जाने क्या मंतव्य लिये आया है
कैद कर रहा अरमानों के पल पल पंछी कई, जाल में
एक साध ज्यों करवट लेकर आतुर होकर पंख तौलती
उसे बांध कर रख लेता है ये अपने विस्तॄत रूमाल में

वैसे तो आंखों से बह कर आंसू शब्द बना करते थे
किन्तु आजकल बहते आंसू पलकों ने ही पोंछ लिये है

रचती है षड़यंत्र व्यस्तता नित्य घड़ी की सुईयों से मिल
दिन के सारे  प्रहर झपकती पलकों में ही खो जाते हैं
नीड़ छोड़ते पंछी के स्वर सरगम के झूले पर झूलें
इससे पहले, ढली सांझ के रंगों में घुल खो जाते हैं

वे जो पल मॄगशावक से अठखेली करते दिन-उपवन में
समय बाज ने फ़ैला अपने डैने सभी दबोच लिये हैं

भावों की पुस्तक का कोई पन्ना खुलता नहीं आजकल
शब्द लेखनी की गलियों से दूर भटकते हैं आवारा
संशोधित हो गये व्याकरण के सब नियम लगा है ऐसे
इसीलिये शायद कागज़ पर बनता नहीं छन्द दोबारा

हम वह नहीं प्रेरणा कोई जिन्हें कंठ स्वर दे जाती है
वे हैं और लेखनी के जो संदर्भों में  क्रोंच लिये हैं

Comments

Udan Tashtari said…
है अद्भुत लेखनी कि कुछ कहा न जाये/// मगर


संभव नहीं रहा लिख पाऊँ गीत नया कोई शतरूपे
क्योंकि कल्पना के पाखी के पंख किसी ने नोच लिये हैं


-यह भी तो देखो कि यह सहा न जाये!!
राकेश भाई साहब आपका ये गीत भी आपके अन्‍य गीतों की ही तरह शब्‍द सौंदर्य से भरपूर है । परिमल काव्‍य की यदि आज बात करें तो परिमल काव्‍य में आप आज के दौर के सबसे सशक्‍त हस्‍ताक्षर हैं । आपके गीतों में जो लालित्‍य होता है जो भाषागत सौंदर्य होता है वो आजकल देखने को ही नहीं मिलता है । आपकी कलम यूंही नये नये गीतों का सृजन करती रहे यही कामना है ।
सुबीर जी क कहने के बाद क्या रह गया कहने को बहुत सुन्दर गीत् है बधाई
Babli said…
वाह वाह क्या बात है! बहुत ख़ूबसूरत गीत् लिखा है आपने ! इस उम्दा गीत् के लिए बधाई!
गज़ब.....गज़ब ....गज़ब.......!!

आज समीर जी के ब्लॉग पे सुना आपको .....!!
rakesh ji..main kya kahu bade bade logo ki baten sun raha hoon mai to is baare me kuch kah hi nahi sakata kyonki sachchi ko shabd kya de aur yah bilkul sach hai ki saraswati ji ki aap par mahan kripa hai jobhi likh dete hai wah amar ho jata hai..

yah geet bhi asha ke anurup laazwaab..bahut bahut dhanywaad
रंजना said…
रचती है षड़यंत्र व्यस्तता नित्य घड़ी की सुईयों से मिल
दिन के सारे प्रहर झपकती पलकों में ही खो जाते हैं
नीड़ छोड़ते पंछी के स्वर सरगम के झूले पर झूलें
इससे पहले, ढली सांझ के रंगों में घुल खो जाते हैं

Adbhud abhivyakti.....ye bhaav to pratyek samvedansheel ke hriday me umdate hain,jab samany dincharyaon me ulajh man saarthak shrijan ko samay nahi nikaal paata..par is tarah is peedaa ko koi aap saa sundar abhivyakti nahi de sakta....
Shardula said…
सुबीर जी की बात से पूर्णत: सहमत हूँ.
यह वह ज़मीन है जहां जिस भी भाव के बीज गिरते हैं, चाहे दुःख के, चाहे सुख के, बस पारिजात ही खिलते हैं !
Shar said…
भावों की पुस्तक का कोई पन्ना खुलता नहीं आजकल
शब्द लेखनी की गलियों से दूर भटकते हैं आवारा
संशोधित हो गये व्याकरण के सब नियम लगा है ऐसे
इसीलिये शायद कागज़ पर बनता नहीं छन्द दोबारा

हम वह नहीं प्रेरणा कोई जिन्हें कंठ स्वर दे जाती है
वे हैं और लेखनी के जो संदर्भों में क्रोंच लिये हैं

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