निशा तुम्हारेही सपनों को लाती है नित झोली में भर
तथ्य यही आंखों से मैने सत्यापित करवाया प्रियतम
पा कर जिनका स्पर्श सुवासित हो जाती है किरन दूधिया
और रातरानी आंगन में फूल खिलाने लग जाती है
आशाओं के जुगनू के पर आशा से होते चमकीले
और सितारों की छायायें सावन गाने लग जाती हैं
उनकी गलियों से जो आये हर झोंका मलयज का होवे
यह प्रस्ताव गंध से मैने प्रस्तावित कर पाया प्रियतम
भाव ह्रदय के व्यक्त न होकर रह जाते हैं जब अनचीन्हे
सम्बन्धों के पथ में उगते संशय के बदरंग कुहासे
अवगुंठित होने लगते हैं धागे बँधे हुए रिश्तों के
धुँधलाने लगती तस्वीरें, बनी हुई जो चन्द्र विभा से
भाव ह्रदय के तुम तक पहुँचें, इसीलिये शब्दों को मैने
सरगम के रंगों में रँग कर विज्ञापित करवाया प्रियतम
ढलती हुई सांझ ने भेजा जिन सपनों को नेह निमंत्रण
उन्हें यामिनी बिठा पालकी अपने संग में ले आती है
लेकिन ढलती हुई उमर की निंदिया की स्मॄति की मंजूषा
उगती हुई भोर की चुटकी सुन कर खाली हो जाती है
मैं जब देखूँ स्वप्न तुम्हारे, ऊषा पलक नहीं खड़काये
सूरज से कह आज नियम यह प्रतिपादित करवाया प्रियतम
मन की भाषा कह पाने में शब्द सदा हो जाते अक्षम
और शब्द के सोचों से होठों तक अर्थ बदल जाते हैं
जागी हुई भावना मन की, जब चाहे संप्रेषित होना
तब तब आशंकाओं में घिर अधर थरथरा रह जाते हैं
मेरे मन की बातें पहुँचें, बिन परिवर्तन ह्रदय तुम्हारे
उन्हें नयन की भाषाओं में अनुवादित करवाया प्रियतम
Monday, February 23, 2009
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5 comments:
मेरे मन की बातें पहुँचें, बिन परिवर्तन ह्रदय तुम्हारे
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
सत्यापित, प्रस्तावित, विज्ञापित, प्रतिपादित, अनुवादित ..सभी तो करवा लिया प्रियतम के लिए-अद्भुत!! आनन्द आ गया.
आंखें आपकी पहले तो गज़टेड अफसर बनीं और फिर ट्रांस्लेटर भी हो गईं.
आप के नए शब्द प्रयोगों को देख कर चमकृत हूँ :)
इतनी सुंदर तरह से इतने क्लिष्ट शब्दों को गीत माला में मोती की तरह पिरोना केवल आप ही के बस की बात है गुरुदेव !
आपकी कलम सदा यूँ ही नई ऊंचाईयों को छूती रहे !
भावों की बात दूसरी टिप्पणी में करूंगी, अभी तो ज़रा कानूनी सा ह्रदय हो गया है :)
सादर ...
"मैं जब देखूँ स्वप्न तुम्हारे, ऊषा पलक नहीं खड़काये
सूरज से कह आज नियम यह प्रतिपादित करवाया प्रियतम
मन की भाषा कह पाने में शब्द सदा हो जाते अक्षम
और शब्द के सोचों से होठों तक अर्थ बदल जाते हैं
जागी हुई भावना मन की, जब चाहे संप्रेषित होना
तब तब आशंकाओं में घिर अधर थरथरा रह जाते हैं
मेरे मन की बातें पहुँचें, बिन परिवर्तन ह्रदय तुम्हारे
उन्हें नयन की भाषाओं में अनुवादित करवाया प्रियतम "
अप्रतिम !!
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