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Showing posts from December, 2008

नव वर्ष की शुभकामनायें

पंथ विधु की विभायें सजाती रहें,ज्योत्सना आंगनों से ढले न कभी
व्यस्तता आपके साथ चलती रहे, जोर एकाकियत का चले न कभी
पेंजनी की तरह झनझनाती रहे,होके फ़गुनाई खिड़की पे पुरबाईयाँ
दोपहर चैत की धूप वाली रहे, जेठ का सूर्य आकर जले न कभी

मंदिरों में जले दीप की रोशनी, जगमगाती रहे आपके द्वार पर
सप्त घट नीर अभिषेक करते रहें नित्य ही आपका मंत्र उच्चार कर
तूलिकायें लिये, नित्य विधना नये, आपके हाथ में चित्र रँगती रहे
इस नये वर्ष में आपका हर दिवस, गीत गाता रहे राग मल्हार पर

दिन तो बिखरा उफ़नते हुए दूध सा

एक परिशिष्ट में सब समाहित हुए
शब्द जितने लिखे भूमिका के लिये
फ़्रेम ईजिल का सारे उन्हें पी गया
रंग जो थे सजे तूलिका के लिये

स्वप्न की बाँसुरी, नींद के तीर पर
इक नये राग में गुनगुनाती रही
बाँकुरी आस अपने शिरस्त्राण पर
खौर केसर का रह रह लगाती रही
चाँदनी की किरण की कमन्दें बना
चाह चलती रही चाँद के द्वार तक
कल्पना का क्षितिज संकुचित हो गया
वीथिका के न जा पाया उस पार तक

धूप की धूम्र उनको निगलती गई
थाल जितने सजे अर्चना के लिये
सरगमों ने किये कैद स्वर से सभी
बोल जितने उठे प्रार्थना के लिये

दिन तो बिखरा उफ़नते हुए दूध सा
रात अटकी रही दीप की लौ तले
सांझ कोटर में दुबकी हुई रह गई
कोई ढूँढ़े तो उसका पता न चले
पाखियों के परों की हवायें पकड़
जागते ही उठी भोर चलने लगी
दोपहर छान की ओर बढ़ती हुई
सीढियाँ चढ़ते चढ़ते उतरने लगी

व्याकरण ने नकारे सभी चिन्ह जो
सज के आये कभी मात्रा के लिये
एक बासी थकन बेड़ियाँ बन गई
पांव जब भी उठे यात्रा के लिये

बोतलों से खुली, इत्र सी उड़ गई
चांदनी की शपथ,राह के साथ की +
पीर सुलगी अगरबत्तियों की तरह
होंठ पर रह गई अनकही बात सी
चाह थी ज़िंदगी गीत हो प्रेम का
एक आधी लिखी सी ग़ज़ल रह गई
छंद की डोलियाँ अब न आती इधर
ये उज…

वाणी ने कर दिया समर्पण

व्यक्त नहीं हो सकी ह्रदय की भाषा जब कोरे शब्दों में
हुआ विजेता मौन और फिर वाणी ने कर दिया समर्पण

दॄष्टि हो गई एक बार ही नयनों से मिल कर सम्मोहित
और चेतना साथ छोड़ कर हुई एक तन्द्रा में बन्दी
चित्रलिखित रह गया पूर्ण अस्तित्व एक अनजाने पल में
बांध गई अपने पाशों में उड़ कर एक सुरभि मकरन्दी

वशीकरण, मोहन, सम्मोहन, सुधियों पर अधिकार जमाये
समझ नहीं पाया भोला मन, जाने है कैसा आकर्षण

गिरा अनयन, नयन वाणी बिन, बाबा तुलसी ने बतलाया
पढ़ा बहुत था किन्तु आज ही आया पूरा अर्थ समझ में
जिव्हा जड़, पथराये नयना, हुए अवाक अधर को लेकर
खड़ी देह बन कर प्रतिमा इक, शेष न बाकी कुछ भी बस में

संचय की हर निधि अनजाने अपने आप उमड़ कर आई
होने लगा स्वत: ही सब कुछ, एक शिल्प के सम्मुख अर्पण

आने लगे याद सारे ही थे सन्दर्भ पुरातन, नूतन
कथा,गल्प,श्रुतियां, कवितायें पढ़ी हुई ग्रन्ठों की बातें
यमुना का तट, धनुर्भंग वे पावन आश्रम ॠषि मुनियों के
नहीं न्याय कर पाये उससे, मिली ह्रदय को जो सौगातें

खींची हैं मस्तक पर कैसी, भाग्य विधाता ने रेखायें
उनका अवलोकन करने को देख रहा रह रह कर दर्पण

संध्या की पुस्तक के पन्ने तब सिन्दूरी हो जाते हैं

मीत तुम्हारे हाथों की मेंहदी जब इनको छू जाती है
संध्या की पुस्तक के पन्ने तब सिन्दूरी हो जाते हैं

अभिलाषायें लिख देती हैं प्रथम पॄष्ठ पर स्वप्न सुनहले
स्वयं रंग में रँग सतरंगी हो जाता है पूर्ण कथानक
और क्षितिज की खिड़की पर आ खड़ी हुई रजनी के कुन्तल
रजत आभ से घिर जाते हैं बिना चाँद के तभी अचानक

और तुम्हारी नजरें छूकर शब्द लिखे परिशिष्ट रहे जो
पता नहीं है जाने कैसे सब अंगूरी हो जाते हैं

बिखरी हुई लालिमा आकर चेहरे को रँगने लग जाती
आंखों में खिंचने लग जातीं हैं रेखायें हुईं गुलाबी
मौसम ढल कर प्रतिमाओं में संजीवित होने लगता है
और बादलों की रंगत भी हो जाती कुछ और उनावी

खनके हुए कंगनों की धुन जब छू लेती ज़िल्द सांझ की
बिखरे सब अध्याय सिमट कर गाथा पूरी हो जाते हैं

नीड़ लौटते पाखी के स्वर में बजने लगते अलगोजे
उठ जाती है लेकर करवट, बांसुरिया की सोई सरगम
सोना बिखराने लगते हैं धारा पर दोनों के दीपक
चहलकदमियां करने लगता मंदिर का आरति स्वर मद्दम

रजनीगंधा की महकों से, उमड़ी हुई हवा के झोंके
अनायस ही एक बिन्दु पर संचित दूरी हो जाते हैं

किसलिये फिर उत्तरों की कुछ अपेक्षायें करूँ मैं

रह गये हैं प्रश्न सारे कंठ में ही जब अटक कर
किसलिये फिर उत्तरों की कुछ अपेक्षायें करूँ मैं

जो विसंगतियाँ बिखेरीं ज़िन्दगी ने पंथ में आ
मैं उन्हें अरुणाई कर के भोर की जीता रहा हूँ
दोपहर ने जो पिघल कर सांझ के प्याले भरे हैं
पीर के वे पल निरंतर ओक भर पीता रहा हूँ
रात के बिखरे चिकुर में गंध ले निशिगंध वाली
गूँथता मंदाकिनी की लहर के मोती उठाकर
स्वप्न की दहलीज पर जो आ उतर जाते अचानक
याद के पैबन्द अपने मौन से सीता रहा हूँ

उंगलियाँ का काम ही जब हो गया पैबन्द करना
किसलिये फिर एक धागा भी पिरोने से डरूँ मैं

डूब कर जो दंभ में खोई हुइ है मानसिकता
कोशिशें सारी विफ़ल हैं एक पल उसको उबारूँ
चाहना जिस बिम्ब की है आईने में देख पाना
वो मुझे दिखता नहीं है चाहे जितना भी निहारूँ
ढीठ हैं सपने दिवस के, पॄष्ठ पलकों के न छोड़ें
लिख रहे हैं दॄष्टि भ्रम की एक नव फिर से कहानी
चेतना के तर्क को घेरे खड़े हैं आवरण कुछ
कोई भी उत्तर नहीं है चाहे जितना भी पुकारूँ

रोष पतझड़ का खड़ा है राह में बाहें पसारे
सोचता हूँ क्यों नहीं फिर पात बन क ही झरूँ मैं

राह पर चलते हुए विपरीत जो पग हो गये तो
कह दिया है दोष पथ का, पांव का माना नहीं है
अर्धव्यासों की डगर …

गीत तुम संगीत हो तुम

कंठ का स्वर, शब्द होठों के मिले बस एक तुमसे
चेतना को दे रही चिति एक अभिनव प्रीत हो तुम

जो तपस्या के पलों में चित्र बनते हो वही तुम
नाम तुम जपते जिसे मालाओं के मनके निरन्तर
यज्ञ की हर आहुति को पूर्णता देती तुम ही हो
पांव प्रक्षालित तुम्हारे कर रहे सातों समन्दर

लेखनी तुम और तुम मसि,हम निमित बस नाम के हैं
सिर्फ़ इक तुम ही कवि हो और सँवरा गीत हो तुम

राग के आरोह में, अवरोह में औ’ रागिनी में
स्वर निखरते बीन की झंकार की उंगली पकड़ कर
तार पर बिखरा हुआ स्वर एक तुम हो स्वररचयिते
हर लहर उमड़ी सुरों की एक तुम ही से उपज कर

साज की आवाज़ तुम ही, तार का कम्पन तुम्हीं हो
पूर्ण जग को बाँधता लय से वही संगीत हो तुम

हो कली की सुगबुगाहट याकि गूँजा नाद पहला
शब्द को रचती हुई तुम ही बनी हर एक भाषा
बस तुम्ही अनूभूति हो,अभिव्यक्ति भी तुम ही सदाशय
भाव भी तुम,भावना तुम,प्राण की तुम एक आशा

तुम रचेता अक्षरों की,वाक तुम,स्वर तुम स्वधा तुम
प्राण दे्ती ज़िन्दगी को वह अलौकिक रीत हो तुम


प्राण का पाथेय पल पल क्षीण होता जा रहा है

शब्द कोई लिख नहीं पाये समय की हम शिला पर
प्राण का पाथेय पल पल क्षीण होता जा रहा है

नीड़ कोई दे न पाया चार पल विश्रांति वाले
राह सारे पी गई है पास के संचित उजाले
पांव के छाले पिघल कर कह गये जो पत्थरों से
बात वह मिलती नहीं अब, कोई कितना भी खंगाले

पेंजनी बोली नहीं आकर कभी नदिया किनारे
बाँसुरी पर गीत कोई युग युगों से गा रहा है

लिख गईं थीं रोशनी की सलवटों पर जो कहानी
शेष अब बाकी नहीं है कोई भी उनकी निशानी
तूलिकाऒं ने अंधेरों का रँगा था भाल जिससे
साथ है बस टूटती इक आस की ढलती जवानी

जीत कर बाजी ठठाता हँस रहा तम का दु:शासन
वर्तिका के चीर को पल पल निगलता जा रहा है

धुन्ध की परछाईयों ने चित्र जितने भी बनाये
डूब कर वे रह गये हैं बस कुहासों में नहाये
दर्पणों की चाँदनी को लग गया शायद ग्रहण है
बिम्ब बनते ही नहीं है चाहे जितना भी बनाये

खो गई आवाज़ की हर गूँज गहरी घटियों में
एक सन्नाटा घनेरा लौट कर बस आ रहा है

रात दिन सारे कटे हैं रश्मियों के तीर सहते
और आवारा हवाओं के झकोरों साथ बहते
होंठ पर ताले लगाये ज़िन्दगी के शासकों ने
हो नहीं संभव सका कुछ भी किसी से बात कहते

जो सुधा समझे हुए हम आचमन करते रहे हैं
वह गले को बन हलाहल नील करत…

राह के इक मोड़ पर कब से खड़ा हूँ

एक पागल और सूनी सी प्रतीक्षा के दिये को
मैं जला कर राह के इक मोड़ पर कब से खड़ा हूँ

सो गई है गूँज कर अब चाप भी अन्तिम पगों की
पाखियों ने ले लिये हैं आसरे भी नीड़ जाकर
धूप की बूढ़ी किरण, थक दूर पीछे रह गई है
और चरवाहा गया है लौट घर बन्सी बजाकर

पर लिये विश्वास की इक बूँद भर कर अंजलि में
मैं किसी के दर्शनों की ज़िद लिये मन में अड़ा हूँ

आ क्षितिज पर रुक गया है रात का पहला सितारा
जुगनुओं की सैकड़ों कन्दील जलने लग गई हैं
धार तट की बात तन्मय हो लगी सुनने निरन्तर
शाख पर की पत्तियां करवट बदलने लग गई हैं

आस वह इक स्पर्श पाये पाटलों जैसा सुकोमल
ओस बन कर मैं सदा जिसके लिये पल पल झड़ा हूँ

लग गया चौपाल पर हुक्का निरन्तर गुड़गुड़ाने
छेड़ दी आलाव पर दरवेश ने आकर कहानी
भक्त लौटे देव की दहलीज पर माथा टिका कर
जग गई है नींद से अँगड़ाई लेकर रातरानी

दृष्टि का विस्तार फिर भी हो असीमित रह गया है
सीढ़ियां, सीमायें देने के लिये कितनी चढ़ा हूँ

उभरे आ संशय के साये

काढ़ रहे थे रांगोली तो अभिलाषा की सांझ सकारे
रंग भरा तो न जाने क्यों उभरे आ संशय के साये

संकल्पों के वटवृक्षों की जड़ें खोखली ही थीं शायद
रहे सींचते निशा दिवस हम उनको अपने अनुरागों से
जुड़े हुए सम्बन्धों के जो सिरे रहे थे बँध कर उनसे
एक एक कर टूट गये वे सहसा ही कच्चे धागों से

रागिनियों ने आरोहित होते स्वर की उंगली को छोड़ा
रहे तड़पते शब्द न लेकिन फिर से होठों पर चढ़ पाये

सपनों का शिल्पित हो जाना, होता सोचा सिर्फ़ कहानी
असम्भाव्य कुछ हो सकता है बातें ये भी कभी न मानी
इसीलिये जब हुआ अकल्पित,ढलीं मान्यतायें सब मन की
अटकी रही कंठ के गलियारे में, मुखरित हुई न वाणी

जाने क्यों यह लगा छलावा है कुछ सत्य नहीं है इनमें
दरवाजे पर आकर पुरबाई ने जितने गीत सुनाये

विश्वासों के प्रासादों की नींव रखी थी गई जहाँ पर
सिकता थी सागर के तट की, या फिर थे मरुथल रेतीले
बन न सकी दीवार, उठाती कंगूरों का बोझा कांधे
और सीढ़ियां थी सम्मुख जो, उनके थे पादान लचीले

निश्चय तो था अवसर पाते, भर लेंगे अम्बर बाँहों में
लेकिन हुई परिस्थिति ऐसी, हाथ नहीं आगे बढ़ पाये

आईने का सत्य, सदा स्वीकार रहे, क्या है आवश्यक
जितने अक्स दिखें थे उनमें कोई परिचय मिला नह…

पखेरू याद वाले

सांझ आई हो गये जब सुरमई दिन के उजाले
खिड़कियों पर आ गये उड़ कर पखेरू याद वाले

छेड़ दी आलाव पर सारंगियों ने फिर कहानी
चंग बमलहरी बजाने लग गये फिर गीत गा कर
बिछ गईं नजरें बनी कालीन आगंतुक पगों को
स्वप्न के दरवेश नभ में आ गये पंक्ति बनाकर

कुछ सितारे झिलमिलाये ओढ़ कर आभा नई सी
ज्यों किसी नीहारिका ने झील में धोकर निकाले

वे विभायें झांकती सी चूनरी से चन्द्रमा की
नैन में अंगड़ाईयां लेती हजारों कल्पनायें
पा बयारी स्पर्श रह रह थरथराता गात कोमल
पूर्णता पाती हुइ मन की कुंआरी भावनायें

और मुख को चूमते रह रह उमड़ते केश काले
खिड़कियों पर आ गये उड़ कर पखेरू याद वाले

गंध की बरसात करते वे खिले गेंदा चमेली
आरती की गूँज, गाती भोर की बन कर सहेली
मंत्र की ध्वनियां नदी के तीर पर लहरें बनाती
नीर से भीगी हिना के रंग में डूबी हथेली

तारकों की छांह से वे ओस के भरते पियाले
खिड़कियों पर आ गये उड़ कर पखेरू याद वाले