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Showing posts from November, 2008

वह तो मेरा गीत नहीं था

लगे उमड़ने आशंका के बादल मन के नील गगन पर
जिसे संवारा तुमने स्वर से वह तो मेरा गीत नहीं था

नैन हुए अभ्यस्त देखते टूट बिखरते बनते सपने
पथ को ज्ञात न पदरज कोई उसे नया जीवन द्वे देगी
छत को विदित न कोई कागा बैठेगा आकर मुंड़ेर पर
मेघदूत की अभिलाषा में अंगनाई पल पल तरसेगी

आशा बनी गोपिका फिर भी भटकी है मथुरा गोकुल में
पर कान्हा के कर से बिखरा मिला उसे नवनीत नहीं था

रोष बिखरता है उपवन में अक्सर ही पतझड़ का आकर
रह जाती है लहर घाट पर अंतिम सीढ़ी से नीचे ही
गूँज, आरती में बजते शंखों की अर्थहीन रह जाती
साथ नहीं देती है दीपक की लौ उसका बनी सनेही

धूप पिरोकर आकांक्षा ने खिला दिये हैं गमलों में जो
सूर्यमुखी के फूलों का कोई भी पाटल पीत नहीं था

जलतरंग, सारंगी, वीणा, मांझी गीत और अलगोजे
डमरू.ढपली, तबला, तासे बजे ताल दे सरगम के संग
धुन सरोद की ले सितार ने रह रह छेड़ा पैंजनियों को
खिला नहीं मल्हारों वाला आकर लेकिन कोई मौसम

आरोहों में अवरोहों में झंकारें थीं, सुर सरगम थी
लेकिन फिर भी बजा शोर ही, वह कोई संगीत नहीं था

पीर मन की बोलती तो है, मगर गाती नहीं है

गूँजती स्वर मॆं सिसक कर
आँख से बहती निकल कर
पीर मन की बोलती तो है, मगर गाती नहीं है

और पल उल्लास के वे
हास के परिहास के वे
याद उनकी एक पल को लौट कर आती नहीं है
पीर मन की बोलती तो है मगर गाती नहीं है

अनमने होकर निपटते हैं दिवस के प्रहर सारे
और खालीपन लपेटे देह को संध्या सकारे
सात घोड़े सूर्य के रथ के चुनें विपरीत पथ को
रात भी आती नहीं है, सांझ कितना पथ निहारे

दीप आतुर जल सके वो
बात कोई कर सके वो
किन्तु सूखी शाख पर इक मंजरी आती नहीं है
पीर मन की बोलती तो है मगर गाती नहीं है

सिलसिले भी खत्म होते हैं नहीं तन्हाईयों के
धुन्ध पीती जा रही आकार भी पर्छाईयों के
बेड़ियां बनत्ते पगों की लुम्बिनी के राजद्वारे
ढूँढ़ते पहचान स्वर भी गूँजती शहनाईयों के

अर्थ की दुश्वारियाँ हैं
बुझ रही चिंगारिया है
मिल रहे हैं जो दिये, उनमें कोई बाती नहीं है
पीर मन की बोलती तो है मगर गाती नहीं है

हाथ से जब छूट जाते हैं सिरे भी उंगलियों के
और नभ पर से बरसते तीर ही जब बिजलियों के
लिख रहे थे जो सुनहरी रागिनी पुरबाईयों पर
टूट बिखराने लगें वे पंख भी जब तितलियों के

उस घड़ी की छटपटाहट
और मन की सुगबुगाहट
करवटें लेती निरंतर, सो मगर पाती नहीं है
पीर मन की बोल…

फिर अधूरा रहा स्वप्न का चित्र वह

आस हर एक जब अजनबी हो गई
रेख जब भाग्य की धुंध में घुल गई
सांस जब धड़कनों से झगड़ती हुई
अपनी ज़िद पे अड़ी, रार पर तुल गई
सिन्धु गहरा निराशा का लहरा हुआ
पीर बन मंदराचल घुमड़ने लगी
कामना थी कि नवनीत मिल जायेगा
अश्रु की आंख से बस झड़ी तब लगी

और फिर हाथ की मुट्ठियों से रिसा
नीर था भूमि में जा सिमटता रहा
फिर अधूरा रहा स्वप्न का चित्र वह,
आज तक रंग मैं जिसमें भरता रहा

एक गंगाजली को लिये था तिमिर
जब उठाई कसम थी रहे साथ में
इसलिये साथ अपना निभाता रहा
सांझ में, भोर में, दोपहर, रात में
एक पल को विलग हो न पाया कभी
सूर्य के तीर जितने चले, व्यर्थ थे
चाँदनी की गली से निकाले गये
दीप सारे अंधेरे के अभ्यस्त थे

और फिर तारकों ने पिघल कर जिसे
था भरा वो गगन दीप हो न सका
इसलिये रात की ड्योढ़ियों से फिसल
सिर्फ़ तम ही गली में था झरता रहा

एक सन्दर्भ से सिलसिले जब जुड़े
चन्द पौधे पनपने लगे आस के
अर्थ की गंध में थे नहाये हुए
फूल हँसते हुए एक विश्वास के
आंधियों ने दिखा पर दिया आईना
शेष कुछ भी नहीं बाग में रह गया
शब्द आकर लटक तो अधर से गया
ज्ञात हो न सका कौन था कह गया

टूटते भ्रम गये स्वर की सीमाओं के,
ज्ञात होने लगा कोई सुनता नहीं
शब्द होकर बहूटी, हवा की तन…

कर्मण्यवाधिकारस्ते

शब्दों में जब सिमट न पाईं अन्तर्मन में उगी व्यथायें
तब हमने उल्लास बिखेरा है राहों में गाते हँसते

सुना, कमन्दें टूटा करतीं हैं छत की सीमा से पहले
और ठोकरें दुलरातीं पग आँगन की देहरी पर आकर
बिखरा जाती पांखुर पांखुर कलिकाओं की खिलते खिलते
और भोर में ही भटकाया करता राहें निकल दिवाकर

रहा सूत भर दूर सदा ही, अथक प्रयासों का हर प्रतिफ़ल
निष्ठा देती किन्तु दिलासा, है कर्मण्यवाधिकारस्ते

स्वप्न स्वप्न ही तो होते हैं, उम्र उषा के मुस्काने तक
चाहे कितने फ़ुंदने बाँधें आशाओं के चूनरिया में
खुले हाथ को मुट्ठी कहकर, भ्रम में रँगकर चेहरा जीते
संचय कहाँ शिवाले वाली हो पाता है गागरिया में

लेकिन आदत की लाचारी ले जाती पग उन राहों पर
जो जाती हैं कभी सुना था, जहां आस के नूपुर बजते

जीवन भरा विसंगतियों से ज्ञात मुझे है तुम भी जानो
पंथ समन्वय के पर चलते रहना होता आवश्यक है
समतल राहों पर बोयी जाती हैं जब फ़सलें मनमानी
गंतव्यों के पथ का कण कण होने लगता तब बाधक है

उस नगरी के गलियारों में सम्बन्धों की लुटती पूँजी
जहाँ स्वार्थ की दूकानों पर भाव बिका करते हैं सस्ते.

कोई भी अंकुर न फ़ूटा

ढली सांझ से उगी भोर तक, बोते रहे आंख में आंसू
बीती रात. स्वप्न का लेकिन कोई भी अंकुर न फ़ूटा

तारों की झिलमिली छांह में पीड़ा के पैबन्द लगा कर
टूती तस्वीरों की किरचों को बरौनियों पर अटका कर
सांसों ने धड़कन के संग मिल पल पल सींचा देखा भाला
आशाओं का पुष्प गुच्छ् था पलकों पर ला रखा सजा कर

लेकिन सूखे का शिकार हो गई मिलन के पल की बदली
राहों से सम्बन्ध जुड़ सके , इससे पहले ही था टूटा

प्राची के पनघट पर बैठी रही प्रतीक्षा एक रात भर
बुनती रही किरण की डोरी अभिलाषा का सूत कात कर
सन्देशों के पाखी निकले नहीं नीड़ की सीमाओं से
रूठे रहे अनकही अधरों पर थी अटकी किसी बात पर

और धुन्ध के दावानल का यों विस्तार बढ़ा सहसा ही
एक एक कर लीन हो गया रँगा हाथ का हर इक बूटा

बूँद बूँद कर झरी चाँदनी घुली टपकते सन्नाटे में
अटका रहा चाँद सागर के तट पर खड़ा ज्वार-भाटे में
नीर भरी थाली,झीनी चूनर,चलनी, रेशम की जाली
सबका विक्रय हुआ एक ही साथ,हुआ लेकिन घाटे में

और एक व्यापारी जो था गया पास का सब खरीद कर
उसका नाम पता जो कुछ था वह सारा ही निकला झूठा

भर भर कलश उलीचे नभ की गंगाओं ने उगी प्यास में
परछाईं का विलय हो गया अँगड़ाई लेते उजास में
खंडित ह…

जब अंधेरे ही उगलते हैं दॄगों के दीप

जब अंधेरे ही उगलते हैं दॄगों के दीप जलते
तो कहाँ संभावना है लेखनी से जन्म गीतों को मिलेगा
और जब ॠतुराज की डाली बसेरा बन गई है कीकरों का
तो कहाँ यौवन कभी कचनार कलियों का खिलेगा ?

देखने के वास्ते यों तो बगीचा खिल रहा दिखता सदा है
पर जड़ों को चूमती हैं दीमकें ये कौन जाना
शाख पर के मुस्कुराते पात पर टिक कर रुकीं अभ्यस्त नजरें
किन्तु क्या परछाईयों पर है लिखा रहता अजाना
ढूँढ़ती हैं भित्तिचित्रों पर टँगी जो कौड़ियों में कुछ निगाहें
आस है पहचान पाने की न जाने क्या यही बस सोचती हैं
द्वार पर आते हुए हैं संदली पथ से निकल कर जो हवाओं के झकोरे
चाहते रुकना मगर आदत उन्हें रुकने न देती टोकती है

होंठ का रह रह उगलना शब्द बेअर्थी , मगर इच्छा जगाना
एक पल के ही लिये कोई कभी तो छन्द में , इनको सिलेगा

शब्द ने विद्रोह की ठानी हुई है भावनाओं के नगर में
और कोई भी समन्वय की दिशा दिखती नहीं है दूर तक भी
पोटली अनुभूतियों की लग रहा है कोई आ फिर फिर कुतरता
छिन गई है शीश पर से एक जो थी छिरछिरी सी ओढ़नी भी
राह ने पाथेय के सब चिन्ह अपने आप में रक्खे छुपाकर
और इक विश्राम का पल भी डगर की धूल में ला भर दिया है
लग रहा है रात ने जितने रचे षड़यंत्…

चांदनी से धुले रात के पॄष्ठ पर

स्वप्न की जो कहानी नयन ने लिखी, चांदनी से धुले रात के पॄष्ठ पर
आज वह आपकी याद को छू गई, गीत बन कर नया गुनगुनाने लगी

कुछ सितारे पिघलते हुए रंग में कैनवस को गगन के सजाते रहे
कुछ निखरती हुई ओस में मिल गये, पाटलों को मधुर आ बनातेरहे
नभ की मंदाकिनी में लगा डुबकियाँ, एक नीहारिका खिलखिलाने लगी
राशि के चक्र की आ धुरी पर रुके,रोशनी में ढले जगमगाते रहे

ज्योति के अग्निमय पंथ पर जा खड़े बिन्दु थे ध्यान के स्वर्णवर्णी हुए
दॄष्टि के पारसों का परस जो मिला हर कली ध्यान की मुस्कुराने लगी

गंध निशिगंध की चूनरी से उड़ी, लिख कथानक गई भोर के पंथ का
वीथियॊं में उभरते रहे पत्र वे, जिनपे लिक्खा हुआ प्रीत अनुबन्ध था
कल्पना बादलों सी उमड़ते हुए आप ही आप को शिल्प देने लगी
बन पथिक आज मौसम चला झूमता, खाई गंगा किनारे की सौगन्ध सा

अंजलि में भरे निर्णयों के निमिष, आपकी दॄष्टि के पारसों से मिले
तो समय की शिला निश्चयों पे टिकी,सूखा पत्ता बनी डगमगाने लगी

चूड़ियों से छिटकती हुई रश्मियों ने रँगे चित्र आकर नये सांझ के
कंगनों ने खनकते हुए लिख दिये चन्द अध्याय, पायल पे आवाज़ के
नथनियों में थिरकते हुए मोतियों ने लिये चूम आकर गुलाबी अधर
कनखियों मे…

बन सुधा अंगनाईयों में प्राण की झरता रहेगा

भोर की पहली किरण जब गा चुके वाराणसी में
सांझ थक कर बैठ जाये वीथियों में जब अवध की
बौर सब अमराईयों के बीन कर ले जाये पतझड़
शब्द रखवाला स्वयं ही लूट ले पूँजी शपथ की

प्राण सलिले ! प्रीत का विश्वास उस पल में निरंतर
हर अंधेरी रात में दीपक बना जलता रहेगा

राह में झझायें आकर हों खड़ी बाँहे पसारे
वॄष्टि का आवेग कर दे जब प्लावित दॄश्य सारे
हर कदम दावानलों ने गोद में अपनी रखा हो
बीतने लगते सभी दिन हों लगे जब अनगुजारे

चन्द्रबदने ! नैन पाटल पर उभरता प्रीत का पल
बन सुधा अंगनाईयों में प्राण की झरता रहेगा

जब तिमिर का एक धागा चादरों सा फ़ैल जाये
गुनगुनाहट इक विहग की शोर का आकार ले ले
जब घिरें बदरंग कोहरे, पंथ में आ संशयों के
भोर संध्या औ’ दुपहरी, आ निराशा द्वार खेले

स्वर्णवर्णे ! प्रीत की उस पल सुरभि का स्पर्श पाकर
वेदना का हिम, सहज कर्पूर सा उड़त रहेगा

लील जाये जब हथेली ही स्वयं अपनी लकीरें
मील का पत्थर निगल कर राह को जब खिलखिलाये
बादलों को कैद कर ले जब क्षितिज के पार अम्बर
और बस निस्तब्धता ही ज़िन्दगी का गीत गाये

कोकिले ! तब शब्द का विन्यास सुर से स्वर मिला कर
मौन के साम्राज्य से संघर्ष कर लड़ता रहेगा

कहो तो कौन हो तुम

जो जलधि ने देव को सौंपा, वही उपहार हो तुम ?
जो मणी बन ईश के सीने लगा गलहार हो तुम ?
क्या लहर हो तुम उठी नभ की किसी मंदाकिनी की
प्रीत का बन स्वप्न आँखों में बसा संसार हो तुम ?

बन्द हौं आँखें खुली हों चित्र बनते हैं तुम्हारे
किन्तु अब तक जान मैं पाया नहीं हूँ कौन हो तुम

मात्रा हो अक्षरों को जोड़ कर जो शब्द करती ?
तॄप्ति हो जो प्यास के सूखे अधर पर है बरसती ?
हो सुरभि क्या?पुष्प की पहचान का कारण बनी जो
या सुधा हो जो तुहिन कण सी निशा से प्रात झरती

हो असर डाले हुए अनुभूतियों पर इक अनूठा
धूप की परछाईं बन कर चल रही हो कौन हो तुम

क्या वही तुम जो निरन्तर है मधुप से बात करती ?
क्या वही तुम भोर जिसके साथ प्राची में सँवरती ?
क्या तुम्ही को केश पर शिव ने सजाया धार कर के
या कि जो अलकापुरी का है सहज श्रॄंगार करती ?

बन रहे हैं मिट रहे हैं सैंकड़ों आकार प्रतिपल
ओढ़ न पाता तुम्हारा नाम कोई, कौन हो तुम ?

ज्योत्स्ना हो तुम चली नीहारिकाओं की गली से
गंध हो उमड़ी हुई अँगड़ाईयां लेकर कली से
तार पर वीणाओं के झंकॄत हुई झंकार हो तुम
नीर की हो बूँद छिटकी अर्चना की अंजली से

झिलमिलाते रंग अनगिन रश्मियों की उंगलियों से
पर न कोई रंग तुमसा ह…

बहुत दिनों के बाद

बहुत दिनों के बाद पेड़ पर आकर बैठी सोनचिरैय्या
बहुत दिनों के बाद बांसुरी से गूंजे हैं सरगम के सुर

बहुत दिनों के बाद आज इक आया है भटका संदेसा
पुरबाई की अंगड़ाई में गूँथ किसी ने जो था भेजा
बहुत दिनों के बाद करवटें लेकर जागीं सोई शपथें
बहुत दिनों के बाद आज कुछ व्यस्त हुआ मन का रंगरेजा

घुले धुंधलकों में से उभरा चित्र नया कोई सहसा ही
बहुत दिनों के बाद स्वप्न हैं हुए नयन छूने को आतुर

अरसे बाद दूब ने थामा हाथ ओस का हाथ बढ़ाकर
ले मरीचिकायें अपने संग गये उमड़ते मेघ उड़ाकर
बहुत दिनों के बाद आज फिर लहराई रंगीन चुनरिया
बहुत दिनों के बाद पपीहा मचला भंवरे के संग गाकर

बहुत दिनों के बाद पखारे चरण स्वयं के आज उसी ने
मंदिर मंदिर घूम रही थी भरी नीर की जो इक आंजुर

बहुत दिनों के बाद आज फिर बोला है मुंड़ेर पर कागा
बहुत दिनों के बाद बँधा है बरगद पर मन्नत का धागा
बहुत दिनों के बाद नदी ने छेड़ी है तट पर सारंगी
बहुत दिनोंके बाद समय का सोया हुआ प्रहर इक जागा

बहुत दिनों के बाद आज उन शब्दों ने पाई परिभाषा
बन्द पुस्तकों में जो रहते बने फूल की सूखी पांखुर

बहुत दिनों के बाद गीत इक गूँजा वीणा के तारों पर
बहुत दिनों के बाद किसी का पिघला है मन मन…

उसका चढ़ा सांस पर कर्ज़ चुकाऊँ

सरगम का हर स्वर रह जाता है घुट कर जब रुँधे कंठ में
तब कैसे है संभव अपने गीतों को मैं तुम्हें सुनाऊँ

पा न सका आशीष नीड़ से जब आँखों का कोई सपना
अंगनाई ने नहीं सांत्वना वाला हाथ रखा काँधों पर
छिदों भरी गगन की चादर, नहीं ओढ़नी बन पाई जब
लगे रहे अनगिनती पहरे जब मन की क्वांरी साधों पर

तब जिस टूटी हुई आस ने बढ़ कर मेरी उंगली थामी
सोच रहा हूँ कैसे उसका चढ़ा सांस पर कर्ज़ चुकाऊँ

पनघट के द्वारे से लौटी, आशाओं की रीती गागर
रत्नाकर ने निगले भोली सीपी के सोनहरे सपने
मेघों के उच्छवासों में घुल गईं सावनों की मल्हारें
बातों की कल्पना मात्र से लगे होंठ रह रह कर कँपने

तब मन की सूनी क्यारी में उगी एक कोंपल जो फिर फिर
सोच रहा हूँ कैसे उसका दॄढ़ निश्चय, मैं भी दुहराऊँ

अक्षत पुष्प सभी बिखरे जब सौगंधों के गंगा तीरे
आरति के मंत्रों की ध्वनि से सजी न मन्दिर की अँगनाई
छोड़ गई जब एक दिये को जलता हुआ राह में बाती
समो गई प्राची में ही जब बिखरी नहीं तनिक अरुणाई

उस पल ढहती हुई आस्था के अतिरेकों ने जो सम्बल
दिया, उसे मैं सोच रहा हूँ किस सिंहासन पर बिठलाऊँ

व्यक्ति बन कर आ प्रथम तू

चाहना तो है पुजू मैं देवता बन कर किसी दिन
चेतना पर कह रही है व्यक्ति बन कर आ प्रथम तू

आईना तो ज्ञात तुमको झूठ कह सकता नहीं है
ताल में जो रुक गया जल,धार बान सकता नहीं है
मंज़िलों के द्वार तक जाते कहां हैं चिन्ह पथ के
हो गया जड़ जो, कभी गतिमान हो सकता नहीं है

साध तो यह पल रही है रागिनी नूतन रचूँ मैं
चेतना पर कह रही है एक सरगम गा प्रथम तू

जो कि है क्षमता सिमटता सिर्फ़ उतना मुट्ठियों में
ज्ञान की सीमा सदा उलझाये रखती गुत्थियों में
चादरों से बढ़ गये जो बस वही तो पांव ठिठुरे
फ़ूट कब पाते कहो अंकुर बची जो थुड्डियों में

चाहना तो है सजूँ हर होंठ पर मैं गीत बनकर
चेतना पर कह रही है, शब्द बन कर आ प्रथम तू

बालुओं की नींव पर प्रासाद कितनी देर टिकते
और पत्थर भी कहां पर स्वर्ण के हैं भाव बिकते
ज्ञात हो असमर्थता पर चाँद को चाहें पकड़ना
इस तरह विक्षिप्त कितने सामने आ आज दिखते

चाहना तो है बनूँ मैं शिल्प का अद्भुत नमूना
चेतना पर कह रही है, चोट कोई खा प्रथम तू