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दो सौ पचासवीं प्रस्तुति---परिभाषा उस एक निमिष की

परिभाषा उस एक निमिष की खोज रहा हूँ जिस पल तुमने
होठों से न कहते कहते आँखों से मुझको हाँ की थी

वह पल जब शाकुन्तल सपने, सँवरे थे दुष्यन्त नयन में
वह पल देख मेनका को जब विश्वामित्र हुए थे विचलित
वह पल छुआ उर्वशी ने था जब पुरूरवा की नजरों को
वह पल देख लवंगी को जब जगन्नाथ रह गये अचम्भित

परिभाषा मैं ढूँढ़ रहा हूँ रह रह कर उस एक निमिष की
जिस पल नयनों में आ मेरे सँवरी एक छवि बांकी थी

जब राजीवलोचनों में बन चित्र हुई अंकित वैदेही
जब वंशी की धुन ने छेड़ी यमुनातट पर थिरकी पायल
सम्मोहित कर गई शान्तनु को जब उड़ती गंध हवा में
और पुरन्दर के कांधों पर लहराया जब शचि का आँचल

सोच रहा हूँ क्या कह कर मैं आज पुकारूँ उस इक पल को
जब सूरज की रश्मि हटा कर प्राची का घूँघट झांकी थी

वह पल जिसमें कुछ न कहकर तुमने सब कुछ कह डाला था
वह पल जिसने अनजाने ही किया मेरे आगत का सर्जन
शब्दों ने बतलाया संभव नहीं उसे वर्णित कर पाना
जिस पल में सहसा बँध जाते शत सहस्त्र जन्मों के बन्धन

अभिव्यक्ति ने कहा असम्भव व्यक्त करे उस एक निमिष को
जिसमें पूनम बन जाती है जो इक रात अमा की सी थी

वो ही गीत बनी है मेरा

वीणापाणि शारदा ने जो अपने शतदल की इक पांखुर
मुझको सौंपी है, शब्दों में ढल कर गीत बनी है मेरा

यों तो हर मन की क्यारी में फूटे हैं भावों के निर्झर
और कंठ से उपजा करता सहज भावनाओं में ढल स्वर
अक्षर की उंगली को पकड़े सभी प्रकाशित हो न पाते
कुछ लयबद्ध स्वयं ही हो जाते हैं शब्द मात्र को छूकर

आशीषों की अनुकम्पा से कालनिशा का घना अंधेरा
एक रश्मि के आवाहन पर बन जाता है नया सवेरा

अक्षर की पूँजी जो तुमको मिली वही मैने भी पाई
तुमने सब रख लिये कोष में, मैने पास रखे बस ढाई
जो बहार के समाचार को लेकर फिरी बयारे भटकीं
वे सहसा ही कलम चूम कर बनी गंध डूबी पुरबाई

एक तार ने झंकॄत होकर यों सरगम की आंखें खोलीं
सन्नाटे का जो छाया था निमिष मात्र में हटा अंधेरा

फूलों की पांखुर, तितली के पंख, कूचियां चित्रकार की
चूड़ामणि जानकी की जो गढ़े कल्पना स्वर्णकार की
आम्रपालियों के पगनूपुर, वैशाली के कला-शिल्प को
और सूप ने जिन्हें संजोया, सारी बातें गहन सार की

हंसवाहिनी ने जब दे दी दिशा और निर्देशन अपना
तब ही तो स्वयमेव कलम ने इन्हें शब्द में पिरो चितेरा

अभिलाषा की पायल कितनी खनके नॄत्य नहीं सज पाता
पनघट पर आकर भी गागर का तन मन प्यासा रह जाता
श…

मेरा गीत गुनगुनाओगे

लिख तो देता गीत सुनयने, लेकिन एक बार भी तुमने
कहा नहीं है एक गीत भी मेरा, कभी गुनगुनाओगे

लिखता मैं उतरीं संध्यायें जो आकर खंजन नयनों में
अरुण कपोलों पर आकर जो फ़ूले गुलमोहर महके हैं
सीपी की संतानों ने जो रँगा हुआ है मुस्कानों को
रक्तिम अधरों पर यौवन पा कर जितने पलाश दहके हैं

अभिमंत्रित हो गई कलम जिस रूप सुधा का वर्णन करते
एक बार तुम उस में अपना, बिम्ब एक भी झलकाओगे

लिखता स्वर जो करता प्रेरित मस्जिद से उठानी अजान को
जो बन शंख ध्वनि, मंदिर में करता है मंगला आरती
जो मिश्रित है गिरजों से उठते घंटों के तुमुल नाद में
वह स्वर जिससे सावन की झड़ियां अपना तन हैं निखारती

सरगम को जो दे देता है इक अस्तित्व नया, शतरूपे
उस स्वर को अपना सुर देकर और अधिक कुछ चहकाओगे

लिखता वह कल्पना, शब्द जो बनी बही हर एक कलम से
लिखता जो बन गई अजन्ता, छूकर कूची चित्रकार की
वह जिसकी सांसों में चन्दन के वन,तन में वॄन्दावन है
वह जो एक अनूठी कॄति, छैनी से उपजी निराकार की

लिख दूँ उसके गीत, बँधा है, सकल विश्व जिसकी चितवन से
कह दो तुम मेरे शब्दों को पिरो सांस में महकाओगे

आज नये कुछ बिम्ब उभारूँ

आंसू से सिंचित सपनों के अवशेषों पर उगी कोंपलें
मुझसे कहती हैं आँखों में, मैं फिर नूतन स्वप्न संवारूँ

सिर्फ़ काल ही तो निशेश है, बाकी सब कुछ क्षणभंगुर है
संध्या के संग डूबा करता, उगा भोर में जो भी सुर है
एक निमिष की परिभाषायें, बदला करतीं कल्प निगल कर
और रोशनी दिन बन जाती, अंधियारा मुट्ठी में भर कर

यों तो सब कुछ ज्ञात सभी को, लेकिन यादें ताजा करने
मैं इनको रंगों की कूची में भर कर कुछ चित्र निखारूँ

आवाज़ें खो तो जाती हैं, पर अपना अस्तित्व न खोतीं
पा लेना है छुप जाता है जो सीपी के भीतर मोती
प्रतिध्वनियों को अम्बर से टकरा कर लौट पुन: आना है
एक शाश्वत सत्य ! नदी का विलय सिन्धु में हो जाना है

लौटे पुन: जलद में ढल कर, इस तट से गुजरी जो धारा
दिशाबोध का चिन्ह स्वयं को किये, उसे मैं आज पुकारूँ

वहाँ क्षितिज के परे बिन्दु है एक सभी कुछ जो पी जाता
एक दिशा को ही जाता पथ, लौट नहीं है वापिस आताउ
स रहस्य की कथा खोल दूँ एक एक कर अध्यायों में
और नई आशा संचारूँ, थक कर बैठे निरुपायों में

पारायण हो चुकी कथा के जितने चिन्ह अभी बाकी हैं
उन्हें नये संकल्पों के लेने से पहले, उठूँ बुहारूँ

एक ही आशीष बन कर शब्द हर पल गुनगुनाये

शारदा का हो नहीं आशीष तो संभव कहाँ है
कोई भी अक्षर अधर पर आये,आकर खिलखिलाये

शब्द जितने गुंथ गये हैं मोतियों की माल बनकर
हार में नव गीत के, बस एक उंगली की थिरक से
और पत्थर की लकीरों से खुदे सिल पर समय की
भाव वैसे तो रहे भंगुर, रजतवाले वरक से

एक स्वर जो तार की झंकार स उसकी उठा है
है वही जो रागिनी संध्या सवेरे गुनगुनाये

ओस की जो बूँद उसके श्वेत नीरज से झड़ी है
वह बनी इतिहास रच कर भोजपत्रों पर कथायें
एक अनुकम्पा उसी की बीन से उपजे हुए स्वर
या बने पद सूर के, या संत तुलसी गुनगुनाये

एक उसकी दॄष्टि का अनुग्रह बने सूरज दिवस में
और ढल कर तारकों में रात को वह झिलमिलाये

कंठ में उपजा हुआ स्वर, होंठ पर जो शब्द आते
या कि अक्षर में छुपी रचना जिसे हम जान पाते
है उसी भाषा स्वरा की अक्षरा की देन हमको
अन्यथा है कौन सक्षम जो कभी कुछ गुनगुनाये

शब्द भी वह , है वही सुर और वह ही रागिनी है
गीत में संगीत बन कर एक वह ही झनझनाये

दस्तावेज सुरक्षित सारे

गुलमोहर के तले धूप की परछाईं में उस दिन तुमने
अपने अधरों से लिख दीं थीं कुछ शपथें कपोल पर मेरे,
ॠतुएं बदलीं किन्तु दिवस वे अब तक धुंधले हो न सके हैं
मन के लेखागार रखे हैं, दस्तावेज सुरक्षित सारे

चढ़ी किरण की प्रत्यंचा थी, सात रंग की जब कमान पर
अठखेली कर रहीं हवायें बाद्ल से थीं, जब वितान पर
गूँज रहे थे देवालय के पथ में अभिमंत्रित हो जब स्वर
जलतरंग के साथ नदी से बातें करता था इक निर्झर

उस पल झुकी हुई नजरों की रह रह कर उठती चितवन ने
पगनख से जो लिखे धरा पर, संशय की स्याही ले लेकर
उन प्रश्नों के उत्तर बन कर, जो पल ढले गये प्रतिमा में
उस पर ही अटके हैं अब तक ,वर्षों हुए, नयन बजमारे

यों तो बहते हुए समय की धारा सब करती परिवर्तित
वहां मौन अँगड़ाई लेता, जहाँ रहे हों घुंघरू झंकॄत
फूलों वाले नर्म बिछौने, बन जाते पथरीली राहें
सूनापन पीने लगतीं हैं सपने बुनती हुई निगाहें

किन्तु समय के हस्ताक्षर जब अंकित हो जाते पन्नों पर
वे यादों की पुस्तक में जाकर सहसा ही जुड़ जाते हैं
फिर संध्या के थके हुए पग, वापिस नीड़ लौटते हैं जब
पढ़तीं उनको रह रह सुधियाँ खुलते ही आंगन के द्वारे

शरद पूर्णिमा में निखरी हो ताजमहल की जब अंगड़ाई
य…

कभी किसी से सामंजस्य नहीं हो पाया

मंज़िल पथ के दोराहे पर आ कर जब पीछे मुड़ देखा
सूनी राहों पर कदमों का कोई चिन्ह नजर न आया

यूँ तो एक चक्र में बँध कर चलते रहना भी चलना है
निरुद्देश्य भटके पग का भी निश्चित ही गतिमय रहना है
लक्ष्यहीन गति की परिणति तो केवल शून्य हुआ करती है
दूरी को तय करना उस पल इक भ्रम का टूटा सपना है

उगी भोर से ढली सांझ तक चलते हुए निरन्तर पथ में
जहां सजा पाथेय, नीड़ भी आखिर उसी जगह बन पाया

टँगी नित्य ही दीवारों पर चाहत की अनगिन तस्वीरें
कुछ रंगों से सज्जित थीं, कुछ में थी केवल खिंची लकीरें
समझा नहीं किन्तु रंगो का निश्चित होता एक आचरण
उंगली रहे उठाते, अपनी नहीं जाग पाती तकदीरें

जीवन के हर समीकरण का कोई सूत्र अधूरा निकला
इसीलिये तो कभी किसी से सामंजस्य नहीं हो पाया

सुना हुआ था सत्य, गल्प से अधिक अजनबी भी होता है
वही फूल हँसता है घिर कर काँटो में भी जो सोता है
बढ़ा कदम जो आगे वह ही पथ की तय कर पाता दूरी
गठरी हो जिसकी बस वह ही तो अपनी गठरी खोता है

लीकिन हर इक सोचा समझा जाना था हो गया अजनबी
जो समझे थे समझ रहे हैं वह भी कुछ भी समझ न आया

एक कंदील की हो गई रहजनी

स्वप्न सब सो गये सांझ की सेज पर
नैन बैठे रहे नींद के द्वार पर
राह भटका हुआ था कहीं रह गया
चाँद आया नहीं नीम की शाख पर

चाँदनी की सहेली खड़ी मोड़ पर
हाथ में एक कोरा निमंत्रण लिये
लिख न पाई पता, रोशनी के बिना
जुगनुओं के महज टिमटिमाये दिये
शेष चिंगारियां भी नहीं रह गईं
शीत के बुझ चुके एक आलाव में
हर लहर तीर के कोटरों में छुपी
सारी हलचल गई डूब तालाब में

रिक्त ही रह गईं पुष्प की प्यालियाँ
पाँखुरी के परिश्रम वॄथा हो गये
नभ से निकली तो थी ओस की बूँद पर
राह में रुक गई वो किसी तार पर

झाड़ियों के तले कसमसाती हुई
दूब के शुष्क ही रह गये फिर अधर
डोर थामे किरण की उतर न सका
एक तारा तनिक सी सुधा बाँह भर
स्याह चादर लपेटे हुए राह भी
पी गई जो कदम मार्ग में था बढ़ा
रोशनी को ग्रहण था लगाता हुआ
इक दिये का तला मोड़ पर हो खडा

शून्य पीता रहा मौन को ओक से
ओढ़ निस्तब्धता की दुशाला घनी .
सुर का पंछी न कोई उतर आ सका
बीच फैला हुआ फासला पार कर

न तो पहला दिखा और न आखिरी
हर सितारा गगन के परे रह गया
एक कंदील की हो गई रहजनी
कंपकंपाता हुआ इक निमिष कह गया
धुंध रचती रही व्यूह कोहरे से मिल
यों लगे अस्मिता खो चुकी हर दिशा
पोटली में छुपी रह गई भोर भी
देख विस्त…

धूप की रहगुजर से निकलती रही

अर्थ पीती रही शब्द की आंजुरी
और अभिप्राय भी प्रश्न बन रह गये
सारे संवाद घिर कर विवादों पड़े
तर्क आधार बिन धार में बह गये
मौन की रस्सियों ने जकड़ कर रखा
छूट स्वर न सका गूँजने के लिये
देहरी सांझ की फिर से सूनी रही
कोई आया नहीं जो जलाता दिये

और फिर नैन की कोर इक दृश्य के
कैनवस के किनारे अटकती रही

नीड़ को लौटते पंछियों के परों
की, हवा फ़ड़फ़ड़ाहट निगलती रही
सांझ चूनर को पंखा बनाये हुए
इक उदासी के चेहरे पे झलती रही
सीढियों में ठिठक कर खड़ी रोशनी
जाये ऊपर या नीचे समझ न सकी
और थी संधि की रेख पर वह खड़ी
न बढ़ी ही उमर और न ढल सकी

कोण को ढूँढ़ते वॄत्त के व्यास में
रोशनी साया बन कर मचलती रही

सरगमें साज के तार में खो गईं
अंतरों से विलग गीत हो रह गये
स्वन के साध ने जो बनाये किले
आह की आंधियों में सभी ढह गये
नैन सर की उमड़ती हुई बाढ़ में
ध्वस्त होती रही सांत्वना की डगर
दॄष्टि के किन्तु आयाम बैठे रहे
आस के अनदिखे अजनबी मोड़ पर

ज़िन्दगी मरुथली प्यास ले हाथ में
धूप की रहगुजर से निकलती रही