Posts

Showing posts from September, 2008

गीत ये कहने लगा है शिल्प में ढलना असम्भव

गीत ये कहने लगा है शिल्प में ढलना असम्भव
देख तुमको शब्दहीना हो ठगा सा रह गया है

एक पल में भूल बैठा अंतरों के अर्थ सारे
है संभल पाता नहीं ले मात्राओं के सहारे
कौन सी उपमा उठा कर कौन सी खूँटी सजाये
कर सके कैसे अलंकॄत भाव जो हैं सकपकाये

चाहता कुछ गा सके पर थरथराते होंठ लेकर
मौन के भुजपाश में बस मौन होकर रह गया है

सोचता है धूप कैसे चाँदनी में आज घोले
रिक्त मिलता कोष है, रह रह उसे कितना टटोले
गंध का जो प्राण, उसको गंध कहना क्या उचित है
अंश के विस्तार में सिमटा हुआ सारा गणित है

कोशिशें कर जो बनाया चित्र कोई बादलों पे
एक झोंके सांस के से वो अचानक बह गया है

रात जिसके शीश पर आ केश बन कर के संवरती
भोर की अरुणाई आ कर नित कपोलों पर मचलती
रागिनी आ सीखती है जिन स्वरों से गुनगुनाना
है कहाँ संभव, उन्हें ले छंद कोई बाँध पाना

गीत का यह भ्रम उसे सामर्थ्य है अभिव्यक्तियों की
एक बालू के घरौंदे के सरीखा ढह गया है

पेशानी पर पड़ीं सिलवटें

पेशानी पर पड़ीं सिलवटें कितना गहरा दर्द, बतायें
एक पंक्ति में लिखे हुए हैं कितने ही इतिहास बतायें

सूरज ने खींची कूची से नित्य भाल पर जो रांगोली
मौसम ने हर रोज मनाई आ आ कर दीवाली होली
सिमट गईं पहरों की चादर्बिन्दु बिन्दु के बिखरावों में
कितनी बार पिरोई इनमें सहज गली में गुंजित बोली

जाने कितनी मेघमाल हैं इनमें, हैं कितनी शम्पायें
पेशानी पर पड़ी सिलवटें, कितना गहरा दर्द बतायें

एक रेख बतलाती आंखों के आंसू की लिखी कहानी
और दूसरी समझाती है मुस्कानों पर चढ़ी जवानी
एक बनी दिग्दर्श्क खींचे चलते हुए चित्र परदे पर
और एक में छिपी हुईं हैं कई भावनायें अनजानी

शून्य,शोर,मंगल,क्रन्दन के साथ गर्व है, हैं करुणायें
एक पंक्ति में लिखे हुए हैं कितने ही इतिहास बतायें

अनुभव की ऊंची लपटों में तपा हुआ जीवन का बर्तन"
सामंजस्यों ने टीका कर दिया लगा कर गोपी चन्दन
नजरें थक जाती तलाश कर कुछ भी अब दॄष्टव्य नहीं है
हालातों के साथ किए थे जीवन ने जितने अनुबन्धन

अपने बिम्ब देखती मन को नित अतीत मे लेकर जायें
पेशानी पर पड़ी सिलवटें, इनमें कितना दर्द बतायें

तुम उनवान गज़ल का मेरी बन कर एक बार आओ तो

मीत अगर तुम साथ निभाओ तो फिर गीत एक दो क्या है
मैं सावन बन कर गीतों की अविरल रिमझिम बरसाऊंगा

मीत तुम्ही तो भरते आये शब्दों से यह रीती झोली
तुमने ही तो बन्द निशा के घर चन्दा की खिड़की खोली
तुमने मन की दीवारों को भित्तिचित्र के अर्थ दिये हैं
सुधियों की प्यासी राहों में तुमने अगिन सुधायें घोलीं

तुम अपनी यों स्नेह-सुधा से करते रहो मुझे सिंचित तो
क्यारी क्यारी में छंदों के सुर्भित फूल उगा जाऊंगा

तुम दे दो विश्वास मुझे, मैं चन्दा बुला धरा पर लाऊं
दे दो रंग, तूलिका बन कर मैं पुरबाई को रँग जाऊं
एक इशारा दो दीपक में जलूं शिखा बन कर मैं खुद ही
तुम तट बन कर साथ निभाऒ, मैं लहरों के सुर में गाऊं

तुम जो देते रहो दिशायें तो मैं नई राह पर चल कर
पद चिन्हों के प्रतिमानों को नये अर्थ दे कर जाऊंगा

यौं है विदित ह्रदय के मेरे प्रतिपल साथ रहा करते हो
लेकिन होठों की वाणी से यह व्यवहार नहीं करते हो
एक दिवस अपने शब्दों में मेरा नाम पिरो भी दोगे
जिसको नयनों की भाषा में कहते हुए नहीं थकते हि

तुम उनवान गज़ल का मेरी बन कर एक बार आओ तो
सच कहता हूँ मीत सुखन की हर महफ़िल में छा जाऊंगा

जब भी चाहा लिखूँ कहानी

ऐसा हर इक बार हुआ है, जब भी चाहा लिखूँ कहानी
धो जाता है लिखी इबारत बहता हुआ आँख का पानी

डुबो पीर के गंगाजल में मैने सारे शब्द सँवारे
राजपथों से कटी झोंपड़ी की ताकों से भाव उतारे
बिखरे हुअ कथानक पथ में, एक एक कर सभी उठाये
चुन चुन कर अक्षर, घटनाक्रम एक सूत्र में पिरो निखारे

लेकिन इकतारे की पागल भटकी धुन वह कभी न गूँजी
जिसको थाम रही थी मीरा कान्हा की बन कर दीवानी

लिखा कभी सारांश, कभी तो उपन्यास सी लम्बी बातें
कभी अमावस्या का वर्णन, कभी पूर्णिमा वाली रातें
नभ की मंदाकिनियों के तट, श्याम विवर भी धूमकेतु भी
और भाग्य के राशि-पुंज पर अटकीं उल्का की सौगातें

लिखीं भोर से दोपहरी तक, और सांझ की तय कर दूरी
लेकिन पॄष्ठ उठा देखे जब, छाई हुई दिखी वीरानी

दोहराया मैने भी कुंठा, त्रास, भूख बढ़ती बेकारी
विधवा के सपने, अनब्याही सुता देखने की लाचारी
प्रगतिवाद का परिवर्तन का मैने भी जयघोष बजाया
चेहरों पर की चढ़ीं नकाबें, एक एक कर सभी उतारीं

लेकिन जब आईना देखा, तब अपने भी दिखे मुखौटे
और सामने आई अपनी छुपी हुई सारी नादानी

पानी नहीं ठहर पाता है

बोये जाते हैं नयनों में बीज स्वप्न के हर संध्या को
किन्तु निशा के आते आते, माली खुद चुन ले जाता है

पगडंडी के राजपथों से जुड़ते जाने की अभिलाषा
प्रतिपादित करवा देती है सुविधाजनक नई परिभाषा
पनघट की हर सीढ़ी पर जब लगें दिशाओं के ही पहरे
मन मसोस कर रह जाता है रखा कमर पर का घट प्यासा

चौपालों की जलती आंखें सूनापन तकती रहती हैं
वापस आने का आश्वासन भी अब लौट नहीं पाता है

पीपल की हर शाखा चाहे गूलर लगें उसी के ऊपर
सूखा पत्ता राह छोड़ कर नहीं उतरना चाहे भू पर
जड़ का साथ न देता कोई, अगर जरा ऊपर इठता है
सिकुड़ सिमटता है चलती है अगर हवा भी उस को छू कर

अपनी धुन में आगे चढ़ता अक्सर भूल यही करता है
बिसरा देता कटा मूल से ज्यादा देर न टिक पाता है

सपनों के आश्रित रह जाना तो आंखों की है मज़बूरी
रहे बढ़ाते सदा दूब, वॄक्ष निरन्तर अपनी दूरी
सूखी हुई दूब पाकर चिंगारी दावानल बन जाये
तो उसका क्या दोष उमर ही हो जाती वॄक्षों की पूरी

लिखा हुआ है इतिहासों में, और ग्रंथ ने भी समझाया
कच्ची मिट्टी की गागर में पानी नहीं ठहर पाता है

मैने जितना समझा कम था

हर दिन यों तो तुष्टि मिली थी, लेकिन साथ जरा सा गम था
अर्थ तुम्हारी मुस्कानों का, मैने जितना समझा कम था

बिना शब्द के भी बतलाई जाती कितनी बार कहानी
ढाई अक्षर में गाथायें कबिरा ने हर बार बखानी
रावी और चिनावों की लहरों ने जिनको सरगम दी थी
इकतारे पर झंकारा करती थी जो मीरा दीवानी

नीची नजरें किये मिले तुम, उस दिन जब पीपल के नीचे
कुछ ऐसी ही बातों का वह भीना भीना सा मौसम था

गेंदे की पंखुड़ियों पर जब चढ़ते रंग घने मेंहदी के
चेहरे की पूनम में जब जब उभरे है चन्दा बेंदी के
झूमर, पायल, कंगन, टिकुली,बिछुआ, तगड़ी करते बातें
संध्या की चूनर ने बीने तम जब दीपक की पेंदी के

उस पल असमंजस कौतूहल में जो उलझी थी चेतनता
उसका प्रश्न और उत्तर से अनजाना सा इक संगम था


वाणी जब नकार देती है कभी कंठ से मुखरित होना
और हथेली बन जाती है उंगलियों का नर्म बिछौना
नख-क्षत भूमि, दांत में पल्लू, संकोचों के घने भंवर में
डूबा करता तैरा करता सुधियों का इक नव मॄग छौना

होठों की कोरों पर आकर ठिठका, फ़िसला फिर फिर संभला
वह स्मित स्वीकृति वाला था या फिर नजरों को ही भ्रम था

नहीं संभव रहा

नहीं संभव रहा अब लौट कर उस द्वार तक जाना

गली जिसमें हमारे पांव के उगते निशां हर पल
वो पीपल, पात जिसके छांव करते शीश बन आंचल
कुंए की मेंड़ जिसने गागरें प्यासी भरीं अनगिन
वो मंदिर द्वार पर जिसके कभी लगती नहीं आगल

नहीं संभव रहा अब धुन्ध से उनका उभर आना

दिये की लौ, खनकती घंटियां चौपाल की बातें
वो बमलहरी की स्पर्धायें लिये संगीतमय रातें
सुबह की आरती मंगल सिराना दीप नदिया में
हजारों मन्नतों की बरगदों की शाख पर पांतें

नहीं संभव रहा साकार अब वह दॄश्य कर पाना

गली में टेसुआ गाती दशहरे की कोई टोली
संवरती सूत,कीकर,घूघरी से रंगमय होली
रँगे रांगोलियों से वे तिवारे, आंगना, देहरी
शह्द डूबी वो मिश्री की डली जैसी मधुर बोली

नहीं संभव रहा फिर से इन्हें अनुभूत कर पाना
नहीं संभव रहा अब लौट कर उस गांव में जाना

अब सुनिये पॉडकास्ट

कल जो लोग मेरी पॉडकास्ट नहीं सुन पाये, उनके लिए विशेष:


गीत १







गीत २






मेरी पॉडकास्ट : दो गीत

आज सुनिये मेरे दो गीत, मेरी ही अवाज में. यह मेरा पॉडकास्टिंग का प्रयास है, बताईयेगा कैसा लगा?

गीत १


---चाहता हूँ लेखनी को उंगलियों से दूर कर दूँ----



चाहता हूँ आज हर इक शब्द को मैं भूल जाऊँ

चाहता हूँ लेखनी को उंगलियों से दूर कर दूँ /





आज तक मैं इक अजाने पंथ पर चलता रहा हूँ

और हर इक शब्द को सांचा बना ढलता रहा हूँ

आईने का बिम्ब लेकिन आज मुझसे कह गया है

व्यर्थ अब तक मैं स्वयं को आप ही छलता रहा हूँ





सांझ के जिन दर्पणों में रंग लाली ने संवारे

सोचता हूँ आज उनमें रात का मैं रंग भर दूँ





निश्चयों के वॄक्ष उगती भोर के संग संग उगाये

और मरुथल की उमड़ती लहर के घेरे बनाये

ओढ़ कर झंझा खड़े हर इक मरुत का हाथ थामा

मेघ के गर्जन स्वरों में जलतरंगों से बसाये





किन्तु केवल शोर का आभास बन कर रह गया सब

सोचता सब कुछ उठा कर ताक पर मैं आज धर दूँ





कब तलक लिखता रहूँ कठपुतलियों की मैं कहानी

बालपन भूखा, कसकती पीर में सुलगी जवानी

कब तलक उंगली उठाऊँ शासकों के आचरण पर

कब तलक सोचूँ बनेगी एक दिन ये रुत सुहानी





कल्पना के चित्र धुंधले हो गये अब कल्पना में

इसलिये संभव नहीं है स्वप्न को भी कोई घर दूँ











गीत २



---तुम ने मुझे पुकारा प्रियतम--…

तुम ने मुझे पुकारा प्रियतम

आँखों के इतिहासों में पल स्वर्णिम होकर जड़े हुए हैं
जब तुमने अभिलाषाओं को मन में मेरे संवारा प्रियतम

लिखी कथा ढाई अक्षर की जब गुलाब की पंखुड़ियों पर
साक्षी जिसका रहा चन्द्रमा, टँगा नीम की अलगनियों पर
खिड़की के पल्ले को पकड़े, रही ताकती किरण दूधिया
लिखे निशा ने गीत नये जब धड़कन की गीतांजलियों पर

अनुभूति के कैनवास पर बिखरे हैं वे इन्द्रधनुष बन
जिन चित्रों के साथ तुम्हारी चूड़ी ने झंकारा प्रियतम

चन्द्रकलायें उगीं कक्ष की जब एकाकी अँगनाई में
साँसों की सरगम लिपटी जब सुधियों वाली शहनाई में
जहां चराचर हुआ एक, न शेष रहा कुछ तुम या मैं भी
हुई साध की पूर्ण प्रतीक्षा, उगी भोर की अरुणाई में

मन की दीवारों पर वे पल एलोरा के चित्र हो गये
अपनी चितवन से पल भर को तुमने मुझे निहारा प्रियतम

आकुलता के आतुरता के हर क्षण ने विराम था पाया
निगल गया हर एक अंधेरा जब अंधियारे का ही साया
मौसम की उन्मुक्त सिहरनें सिमट गईं थीं भुजपाशों में
अधर सुधा ने जब अधरों पर सावन का संगीत बजाया

एक शिला में शिल्पित होकर अमिट हो गया वह मद्दम स्वर
जिसमें नाम पिरोकर मेरा, तुम ने मुझे पुकारा प्रियतम

आलिंगन की कलियां मन में फिर से होने लगीं प्रस्फ़ुटित
अधरों प…

चाहता हूँ लेखनी को उंगलियों से दूर कर दूँ

चाहता हूँ आज हर इक शब्द को मैं भूल जाऊँ
चाहता हूँ लेखनी को उंगलियों से दूर कर दूँ

आज तक मैं इक अजाने पंथ पर चलता रहा हूँ
और हर इक शब्द को सांचा बना ढलता रहा हूँ
आईने का बिम्ब लेकिन आज मुझसे कह गया है
व्यर्थ अब तक मैं स्वयं को आप ही छलता रहा हूँ

सांझ के जिन दर्पणों में रंग लाली ने संवारे
सोचता हूँ आज उनमें रात का मैं रंग भर दूँ

निश्चयों के वॄक्ष उगती भोर के संग संग उगाये
और मरुथल की उमड़ती लहर के घेरे बनाये
ओढ़ कर झंझा खड़े हर इक मरुत का हाथ थामा
मेघ के गर्जन स्वरों में जलतरंगों से बसाये

किन्तु केवल शोर का आभास बन कर रह गया सब
सोचता सब कुछ उठा कर ताक पर मैं आज धर दूँ

कब तलक लिखता रहूँ कठपुतलियों की मैं कहानी
बालपन भूखा, कसकती पीर में सुलगी जवानी
कब तलक उंगली उठाऊँ शासकों के आचरण पर
कब तलक सोचूँ बनेगी एक दिन ये रुत सुहानी

कल्पना के चित्र धुंधले हो गये अब कल्पना में
इसलिये संभव नहीं है स्वप्न को भी कोई घर दूँ

खिले गीत के छंद

छलक रही शब्दों की गागर
संध्या भोर और निशि-वासर
दोहे, मुक्तक और सवैये, खिले गीत के छंद
घुलने लगा कंठ में सुरभित पुष्पों का मकरंद

भरने लगा आंजुरि मे अनुभूति का गंगाजल
लगा लिपटने संध्या से आ मॆंहदी का आँचल
ऊसर वाले फूलों में ले खुश्बू अँगड़ाई
मरुथल के पनघट पर बरसा सावन का बादल

करने लगी बयारें, पत्रों से नूतन अनुबंध
दोहे मुक्तक और सवैये, खिले गीत के छंद

लहराई वादी में यादों की चूनर धानी
नदिया लगी उछलने तट पर होकर दीवानी
सुर से बँधी पपीहे के बौराई अमराई
हुए वावले गुलमोहर अब करते मनमानी

वन-उपवन में अमलतास की भटकन है स्वच्छंद
घुलने लगा कंठ में सुरभित पुष्पों का मकरंद

रसिये गाने लगीं मत्त भादों की मल्हारें
अँगनाई से हंस हंस बातें करतीं दीवारें
रंग लाज का नॄत्य करे आरक्त कपोलों पर
स्वयं रूठ कर स्वयं मनायें खुद को मनुहारें

एक एक कर लगे टूटने मन के सब प्रतिबंध
दोहे मुक्तक और सवैये, खिले गीत के छंद

नाम वह एक नि:शेष हो रह गया,

भोर की गुनगुनी धूप ने लिख दिया ओस की बूँद पर स्वर्ण से नाम जो
चेतना को विमोहित किये है रहा रात के और दिन के हर इक याम वो
धड़कनों से जुड़ा, सांस में मिल बहा, राग में रागिनी में बजा है वही
नाम वह एक नि:शेष हो रह गया, और भूला ह्रदय शेष हर नाम को
---------------------------------------------------------------------------

ज्ञान की पुस्तकें धर्म के ग्रंथ सब बात हमको यही बस बताते रहे
प्राप्त उनको अभीप्शित हुआ है सदा दीप जो साधना का जलाते रहे
आपका पायें सामीप्य, यह ध्येय है, इसलिये अनुसरण कर कलासाधिके
आपके नाम को मंत्र करते हुए भोर से सांझ तक गुनगुनाते रहे

--------------------------------------------------------------------------

जब भी परछाईयाँ आईने में बनीं, आपका चित्र बन झिलमिलाती रहीं
होंठ पर आ थिरकने लगीं सिहरनें, पंखड़ी की तरह थरथराने लगीं
आपकी गंध लेकर हवा जो चली, द्वार मेरे खड़ी गुनगुइनाती रही
पल सभी आपके थे, रहे आपके, धूप आँगन में आई बताती रही

--------------------------------------------------------------------------

भोर में नींद के साथ टूटे सपन, रात को फिर से रंगीन हो न सके
पल प्रतीक्षा के सारे रहे मो…