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Showing posts from June, 2008

चन्दा का झूमर

शब्दों के झरने उंड़ेलती हैं कलमें
लेकिन कोई गीत नहीं बन पाता है

चन्दा का झूमर अम्बर के कानों में
घुली हुई सरगम कोयल के गानों में
चटक रही कलियों की पहली अंगड़ाई
टेर पपीहे की वंशी की तानों में
रश्मि ज्योत्सना की कंदीलों से लटकी
एक टोकरी धूप दुपहरी से अटकी
सन्ध्या की देहरी पर आकर सुस्ताती
एक नजर, पूरे दिन की भुली भटकी

लेकिन दीप न जल पाता संझवाती का
और अंधेरा पल पल घिरता आता है

खिंची हाथ पर आड़ी तिरछी रेखायें
और अर्थ जीवन के पल पल उलझायें
चौघड़ियों के फ़लादेश में बल खाते
नक्षत्रों से ताल मेल भी बिठलायें
लिखते विधि का लेख दुबारा, कर पूजा
मंदिर की चौखट पर शीश नवाते हैं
कल का सूरज रंगबिरंगी किरणों से
राह सजायेगा, यह आस लगाते हैं

लेकिन आधा लिखा पॄष्ठ इस किस्मत का
फिर से आधा लिखा हुआ रह जाता है

मन में पलतीं नित्य अधूरी आशायें
और बदलते नित्य, अर्थ, परिभाषायें
सूनेपन पर लगी टकटकी नजरों की
बनें दॄश्य, इससे पहल ही धुल जायें
खुले हाथ की मुट्ठी बँधती नहीं कभी
लेकिन संचय दिवास्वप्न बन रहता है
आज नहीं तो कल या फिर शायद परसों
पागल मन खुद को समझाता रहता है

लेकिन संवरा हुआ आंख का हर सपना
गिरे डाल से पत्ते सा उड़ जाता है

सबन्धों के चरणामॄत

वैसे गीत की भूमिका लिखना मैं कभी आवश्यक नहीं समझता परन्तु इस बार समीर भाई के आग्रह पर मात्र इतना लिख रहा हूँ कि इस गीत के आरंभिक छन्द के बाद के अंतरों में अनुप्रास का प्रयोग किया गया है.


सबन्धों के चरणामॄत का किया आचमन सांझ सवेरे
तुलसी पत्रों से अभिमंत्रित माना उनको शीश चढ़ाया
अंकुर फूटेंगे नव, बिखरेगा सौरभ मधुपूर्ण स्नेह का
आंखों के परदे पर सुधि ने बहुरंगी यह चित्र बनाया

लेकिन मरुथल की मरीचिका सा निकला नयनों का सपना
आस पिघलती रही कंठ में बन कर नागफ़नी के कांटे

अँगनाई के आशीषों से आल्हादित थी हर अरुणाई
संस्कॄतियों की सुरभि सांझ ने सुन्दरता के साथ पिरो ली
वहनशक्ति वसुधा की ओढ़े वक्ष विशाल रहा वॄक्षों सा
सहज समर्पैत हो संशोधित संकल्पों की साध समोली

लेकिन बंजर के सिंचन का तो प्रतिकार शून्य ही होता
नाम-जमा के समीकरण में हासिल हुए हाथ बस घाटे

समझौतों की सीमायें यों सन्दर्भों से सही नहीं थीं
आगत हो अनुकूल, आज का अर्घ्य दिया, अवगुण आराधे
पतझड़ के पीले पत्रों को पावन पुण्य प्रसादी माना
तॄप्त किय्र तप का तप लेकर तॄषित ताप के तप्त तकादे

लेकिन हर इक होम मंत्र का होता अंत सदा स्वाहा ही
चाह जहाँ थी ज्वार उमड़ते, आते रहे…

हर अधूरे प्रश्न का उत्तर

क्या कहां कब कौन किसने किसलिये क्यों
प्रश्न खुद उठते रहे हैं, बिन किसी के भी उठाये
आस दीपक बालते इक रोज तो आखिर थकेगी
ज़िन्दगी जब हर अधूरे प्रश्न का उत्तर बनेगी

खिल रहे हैं फूल से, रिश्ते, अगर वे झड़ गये तो ?
साये अपने और ज्यादा आज हम से बढ़ गये तो ?
और सोता रह गया यदि सांझ का दीपक अचानक
स्वप्न आंखों में उतरने से प्रथम ही मर गये तो ?

प्यास जो है प्रश्न की वह फिर अधूरी न रहेगी ?
ज़िन्दगी ही तब अधूरे प्रश्न का उत्तर बनेगी

चांदनी यदि चांद से आई नहीं नीचे उतर कर
बांसुरी के छिद्र में यदि रह गई सरगम सिमट कर
कोयलों ने काक से यदि कर लिया अनुबन्ध कोई
यामिनी का तम हँसा यदि भोर को साबुत निगल कर

कामना फिर और ज्यादा बाट न जोहा करेगी
ज़िन्दगी ही जब अधूरे प्रश्न का उत्तर बनेगी

शाख से आगे न आयें पत्तियों तक गर हवायें
या कली के द्वार पर भंवरे न आकर गुनगुनायें
बून्द बरखा की न छलके एक बादल के कलश से
और अपनी राह को जब भूल जायें सब दिशायें

उस घड़ी जब चेतना आ नींद से बाहर जगेगी
ज़िन्दगी तब हर अधूरे प्रश्न का उत्तर बनेगी

सूर्य प्राची में उभरने से प्रथम ही ढल गया यदि
भोर का पाथेय सजने से प्रथम ही जल गया यदि
पूर्व पग के स्पर्श से यदि देह…

बस यूँ ही

रंग में गेरुओं के रँगे चौक ने चूम जब दो लिए पग अलक्तक रँगे
देहरी को सुनाने लगे राग वह, पायलों की बजी रुनाझुनों में पगे
खिड़कियों से रहा झाँकता चन्द्रमा, घूंघटों की सुनहरी किनारी पकड़
प्रीत का एक मौसम घिरा झूमता, रह गए हैं सभी बस ठगे के ठगे

देहरी शीश टीके लगाती रही

अपने अस्तित्व की पूर्णता के लिये
प्राण की ज्योत्स्ना छटपटाती रही

ओस की बून्द सी दो पहर धूप में
मन के आंगन में उगती हुई प्यास थी
रोज दीपित हुई भोर के साथ में
अर्थ के बिन भटकती हुई रात थी
चाह की चाह थी जान पाये कभी
चाहना है उसे एक किस चाह की
पांव ठिठके रहे बढ़ न पाये तनिक
गुत्थियों में उलझ रह गई राह थी

एक खाका मिले, रंग जिसमें भरे
तूलिका हाथ में कसमसाती रही

चिन्ह संकल्प के धुंध में मिल गये
सारे निर्णय हवायें उड़ा ले गईं
वक्त बाजीगरी का पिटारा बना
दॄष्टियां आईनों में उलझ रह गईं
दिन का पाखी उड़ा तो मुड़ा ही नहीं
रात बैठी रही आकलन के लिये
पॄष्ठ सारे बिना ही लिखे रह गये
शब्द से सिर्फ़ रंगते रहे हाशिये

ज़िन्दगी बनके पुस्तक बिना ज़िल्द की
भूमिका पर अटक फ़ड़फ़ड़ाती रही

देहरी शीश टीके लगाती रही
और अंगनाई की रज बिछौना बनी
स्वस्ति के मंत्र का जाप करती रहीं
हाथ की उंगलियां रोलियों में सनी
पत्थरों से विनय, फूल की पांखुरी
करके अस्तित्व को होम, करती रही
आँख की झील से पर फ़िसलती हुई
आस पिघली हुई रोज झरती रही

आस्था कंठ को चूम वाणी बनी
आई अधरों पे, आ कँपकँपती रही

संभव है सपना सच हो ले

पानी का बुलबुला बनाती, सारे स्वप्न भोर की थपकी
क्या संभव इस बार आंख का कोई तो सपना सच हो ले

पल्लव सभी उड़ा ले जाती बहती हुई हवा पल भर में
तट की सभी संपदा लहरें ले जातीं समेट कर, कर में
चक्रवात के पथ में बचते चिन्ह शेष न निर्माणों के
प्रत्यंचा से बन पाते हैं कब संबंध घने वाणों के

ये सच है. हाँ पर ये भी तो सच है थके हुए पाखी को
है उपलब्ध गग की पूरी सीमा, यदि अपने पर तोले

सीमा नहीं हुआ करती है, यों चाहत के विस्तारों की
रह जाती है एक कहानी बनकर अक्सर अखबारों की
सागर की हर इक सीपी में मोती नहीं मिला करता है
उपवन का हर इक पौधा तो चन्दन नहीं हुआ करता है

लेकिन फिर भी बून्द एक जो छिटकी हुइ किसी ज्योति की
आशान्वित होती है संभव है वह किरण नवेली होले

महका करते हैं गुलदस्ते, अभिलाषा के सांझ सकारे
आकांक्षाओं की चूनरिया लहराती है मन के द्वारे
सतरंगे अबीर सी झिलमिल झिलमिल होती मधुर कल्पना
अगली बार निराशा का हो शायद कोई भी विकल्प ना

कागज़ पर खींची जाती है जो रेखायें बना योजना
संभव है वह उतर पॄष्ठ से सचमुच ही कोई घर हो ले