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Showing posts from April, 2008

मौन लेखन ओढ़ता है

मूर्च्छित है भावना, बिंध वक्त के पैने शरों से
लेखनी हतप्रभ शिथिल है, मौन लेखन ओढ़ता है

काल के तो चक्र चलते हैं सदा होकर दुधारे
युद्ध तो थमता नहीं है एक पल, संध्या सकारे
चक्रवर्ती योद्धा के सामने होकर निहत्थे
हम समर्पण कर रहे हैं सारथी के ले सहारे

कर्म तो कर्तव्य है, अधिकार फल पर क्यों नहीं है
एक बस यह ख्याल आ रह रह ह्रदय झकझोरता है

हर दिशा ने तीर को संधान कर बाँधा निशाना
ढाल का परिचय रहा है हाथ से बिलकुल अजाना
अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित, द्वन्द को तत्पर खड़ा वह
आज तक सीखा नहीं है एक पग पीछे हटाना

नीर देकर हाथ में संकल्प जो करवा रहा है
एक वो ही है सभी निश्चय हमारे तोड़ता है

शान्त हो बैठी रही है गूँज जब मणिपुष्पकों की
व्यक्ति होता है परीक्षित और जय बस तक्षकों की
देवदत्तों ने लिखी है सन्धि की गाथायें केवल
टोलियाँ करती दिखी हैं जब पलायन, रक्षकों की

उस घड़ी जो आस्था की बून्द घुट्टी में मिली थी
का भरम विश्वास का आधार हर इक तोड़ता है

जीवन के इस रंगमंच पर

कितने तो अभिनीत हो गये,कितने अब भी अंक बकाये
जीवन के इस रंगमंच पर, निर्देशक क्या क्या दिखलाये

कभी एक किरदार दिखाता, कभी भूमिकायें बदली हैं
कभी धूप वाले रंगों में बो देता काली बदली है
कहां अवनिका पतन करेगा, कब हो पटाक्षेप दॄश्यों पर
क्या है सत्य,गल्प भी क्या है, क्या कॄत्रिम है क्या असली है

मुट्ठी में है लिये राग के आरोहों को अवरोहों को
न जाने किस सरगम को वो किस साजिन्दे से बजवाये

कभी दर्शकों में से चुन लेता है मुख्य मुख्य अभिनेता
कभी प्राथमिकता देता है फिर नेपथ्यों में रख देता
कभी मिलन की बांसुरिया को कर देता है रुदन विरह का
कभी डालता है भ्रम में तो कभी दिशायें नूतन देता

कथा,पटकथा या मध्यांतर सब पर पूर्ण नियंत्रण उसका
कलम उसी की.भाव उसी के कब जाने क्या क्या लिख जाये

अपने अपने पात्र निभाते रहना है सबकी मज़बूरी
किसे विदित सज्जा कक्षों से कितनी रही मंच की दूरी
किस चरित्र को किस सांचे में ढलना है ये वही जानता
किस को खारिज कर देना है, किसको दे देनी मंजूरी

शतरंजी इस रंगमंच पर शातिर बड़ा खिलाड़ी है वो
प्यादों को करता वज़ीर है, वह ही शाहों को पिटवाये

उत्तर गुमनाम रहे

एक प्रश्न जो ढलती निशा उछाल गई
उत्तर उसका ढूँढ़ सुबह से शाम रहे

थकन पंथ के अंतिम कदमों की, या हो
उगी भोर की अंगड़ाई में क्या अंतर
संकल्पों की भरी आंजुरी में संशय
या हो आहुतियों से रही आँजुरि भर
एक अकेला तारा नभ में उगा प्रथम
याकि आखिरी तारा, गगन अकेला हो
दॄष्टि साधना, प्रथम मिलन की आस लिये
दॄष्टि मिले जब घिरे विदा की बेला हो

हैं समान पल, लेकिन अर्थ विलग क्यों हैं
प्रश्न चिन्ह यह आकर उंगली थाम रहे

प्रश्नों के व्यूहों में उत्तर घिरे हुए
जाने कैसे स्वयं प्रश्न बन जाते हैं
उतनी और उलझती जाती है गुत्थी
जितना ज्यादा हम इसको सुलझाते हैं
सर्पीली हों पगडंडी, या हों कुन्तल
भूलभुलैय्या राह कहाँ बन पाती है
हो आषाढ़ी या हो चाहे सावन की
एक अकेली बदली क्या क्या गाती है

अपनी आंखों के दर्पण में छाया को
हम तलाशते हर पल आठों याम रहे

कोई अटका रहा वॄत्त में, व्यासों में
कोई उलझा बिन्दु परिधि के पर जाकर
कोई अर्धव्यास में सिमटा रहा सदा
कोई था समकोण बनाये रेखा पर
हम थे त्रिभुजी, किन्तु आयतों में उलझे
कोई जिनमें नहीं रहा सम-अंतर पर
सारे जोड़ गुणा बाकी के नियम थके
जीवन का इक समीकरण न सुलझा पर

अंकगणित से ज्यामितियों के बीच रहा
बीजगणित,जिसके उत्…

तुमको पत्र लिकूँ

बहुत दिनों से सोच रहा हूँ तुमको पत्र लिखूँ

लिखूँ यहाँ मैं स्वस्थ और सानन्द मित्र रहता हूँ
आशा करता हूँ तुम सब भी कुशल क्षेम से होगे
मनभावन ॠतुओं का मेला होगा घर आंगन में
सराबोर तुम सम्बन्धों के मधुर प्रेम से होगे

कीर्ति पुष्प की फुलवारी होगी सर्वत्र लिखूँ

लिखूँ शांति के पंछी उड़ते हर पल यहां गगन पर
चन्द्र कलाऒं जैसा पल पल बढ़ता भाई चारा
राम और गौतम के बन कर रहते सब अनुयायी
स्नेह-सुधा से सिक्त यहां हर गली गांव चौबारा

आज हुए अनुकूल सभी, हम पर नक्षत्र लिखूँ

लिखूँ विक्रमादित्य अनुसरण करते सत्ताधारी
न्यायपालिका जहाँगीर के पदचिन्हों पर चलती
दीपक के आवाहन पर सूरज चल कर आता है
प्रतिनिधि से जनता की दूरी, पल पल यहाँ सिमटती

नई लिये उपलब्धि, शुरू होता नव सत्र लिखूँ

किन्तु न लिखती कलम, आंख ने जो देखे हैं सपने
और दॄश्य को शब्द न देती है कोई भी लिखकर
शायद आने वाला कोई कल सच ही सच लिख दे
और न युग का सपना कोई सपना ही हो सत्वर

तना शीश पर रहे सभी के यश का छत्र लिखूं
बहुत दिनों से सोच रहा हूँ तुमको पत्र लिखूँ

कलम वही जो हर मौसम में

आंधी चीखे, बादल गरजे, कदम कदम पर बढ़ें अंधेरे
कलम वही जो हर मौसम में, बस शब्दों के फूल बिखेरे

यह संकल्प लिया जब हमने अनुष्ठान हमको करना है
तो आड़े आने वाली बाधाओं से फिर क्यों डरना है
मंत्रों के स्वर हमने साधे जिनमें वह अपना ही स्वर है
जो मंतवय हमारा है वह बाकी पूजा से ऊपर है

साक्षी समय, तपस्याओं में आते हैं अवरोध घनेरे
कलम वही जो हर मौसम में, बस शब्दों के फूल बिखेरे

पंथ सही हो, स्वयं लक्ष्य फिर चल कर राही तक आता है
ताल सही हो तो फिर सुर भी स्वत: उमड़ता है गाता है
भ्रम के जालों को किरणों की कैंची सदा छाँट देती है
असमंजस का कोई भी पल ज्यादा देर न रुक पाता है

एक दीप की लौ बोती है, रोज निशा में नये सवेरे
कलम वही जो हर मौसम में, बस शब्दों के फूल बिखेरे

ओ हमराही उठो और नव संकल्पों से आंजुर भर लो
जो कर चुके समर्पण, उनके स्वर को भी अपना स्वर कर लो
देनी है आवाज़, क्षितिज के पार छुपे सूरज को तुमने
थक कर पथ में नहीं रुकोगे,चलो आज यह नूतन प्रण लो

साथ तुम्हारा रहे, कूचियां मेरे भी कुछ चित्र उकेरे
कलम वही जो हर मौसम में, बस शब्दों के फूल बिखेरे

उनकी मात नहीं होती है

कोई साथ नहीं चलने को, लेकिन जब संकल्प लिया है
थक कर कहीं बैठ जाना तो अच्छी बात नहीं होती है

हाँ मीलों के पत्थर अक्सर ही उपहास उड़ाया करते
कभी कभी संशय होता है क्यों आगे को यह पग बढ़ते
लेकिन गति तो चेतनता है, उससे कहां विलग होना है
छलना के पल आ राहों को सही दिशा से वंचित करते

लेकिन शाह जिन्होंने तोड़ी हैं चौखानों की सीमायें
शह लगती हों चाहे जितनी, उनकी मात नहीं होती है

दो मुट्ठी में, दो पाथेय सजा कर चलना तो अच्छा है
और किया जो निश्चय वह भी, अनुमोदन करता सच्चाहै
पर यह पथ है बिना नीड़ के, चलते रहें अनवरत निश्चित
तो दो पल थम जाने का निर्णय भी हो जाता कच्चा है

मैं भी दीप जला कर पथ में इसीलिये हूँ साथ तुम्हारे
जिसकी सुबह नहीं हो कोई ऐसी रात नहीं होती है.

ओ राही ! पथ की विस्तॄतता देती है तुमको आवाज़ें
अंबर का आँगन आमंत्रित करता उठ कर लो परवाज़ें
रामचरितमानस ही रचकर रुकती कहाँ कलम तुलसी की
उतनी चमक और बढ़ती है जितना ज्यादा इसको माँजें

अवरोधों की झंझाओं से, बुझती नहीं ज्योति निश्चय की
यह वड़ की जड़ है, पतझड़ का सूखा पात नहीं होती है

रश्मियाँ स्वर्णमय हो गईं भोर की

प्रीत का गीत बन गुनगुनाने लगा, शब्द ने छू लिये आपके जो अधर
रश्मियाँ स्वर्णमय हो गईं भोर की, आपने उनको देखा जरा आँख भर
कुन्तलों ने हवाओं की डोरी पकड़, एक ठुमका दिया तो घटा घिर गई
पेंजनी की खनक पर लगीं नाचने,करके श्रॄंगार संध्या निशा दोपहर.

गीत करके लिखूँ

चाँदनी, फूल की गंध, पुरबाईयाँ; सोचता मैं रहा, प्रीत करके लिखूँ
पैंजनी और लहरों की अँगड़ाईयाँ, बांसुरी का मैं संगीत करके लिखूँ
रूक गई पर कलम आपके नाम पर, पॄष्ठ पर मैने प्रारंभ में जो लिखा
आपके नाम में सब समाहित हुआ,शेष क्या? फिर जिसे गीत करके लिखूँ

अनुभूतियां शब्द बनने लगीं

आँख की वादियों में फ़िसल कह गये
बात मन की, दो आँसू लरजते हुए
शब्द थे लड़खड़ाते हुए रह गये
होठ की पपड़ियों पर अटकते हुए
साथ, तय कर लिया सुर ने देना नहीं
इसलिये गूँज पाई नहीं सिसकियां
कुछ लगा है गले में रुका रह गया
फिर भी आ न सकीं एक दो हिचकियां

जो न चाहा कहें, वो उजागर हुआ
सारी अनुभूतियां शब्द बनने लगीं

मन की संदूकची में रखे थे हुए
भाव सहसा निकल इस तरह से बहे
कोई भाषा की उंगली को पकड़े बिना
बोल बिन, थरथराते अधर ने कहे
एक पल में समाहित सभी कुछ हुआ
नभ का विस्तार, सारी चराचर धरा
एक ही अर्थ में सब निहित हो गया
शून्य की मुट्ठियाँ, थाल मोती भरा

स्वप्न सी आँख में पल रही हर घड़ी
आज बीता हुआ वक्त बनने लगी

पंथ में जो उठे थे कदम वे सभी
लौट कर भोर की आये दहलीज पर
नीड़ पाथेय की पोटली को उठा
ले गया था सहज आँख को मींच कर
राह थक सो गयी ओढ़ कर चादरें
और गंतव्य ने अर्थ बदले सभी
जो अभी है, नहीं वो कभी था हुआ
और शायद न हो पाये आगे कभी

भोर, आते हुए सूर्य से हो विमुख
सांझ बनती हुई आज ढलने लगी

ज़िन्दगी मोम बन कर पिघलती रही

पास रह न सकी बून्द भर रोशनी
ज़िन्दगी मोम बन कर पिघलती रही

दिन उगा पर झपकते पलक ढल गया
रात को नींद आकर चुरा ले गई
दोपहर थी पतंगें कटी डोर से
सांझ आने से पहले कहीं खो गई
हाथ की , मेज की और दीवार की,
हर घड़ी ये लगा शत्रुता कर गई
छोड़ मुझको अकेला खड़ा राह में
और द्रुत हो गईं, पंथ में बढ़ गईं

हर निमिष बन मरुस्थल बिखरता रहा
कंठ में और बस प्यास उगती रही

बिम्ब धुंधले दिखाता रहा आईना
प्रश्न करता रहा वक्त आठों पहर
आस की क्यारियों को निगलता रहा
चाहतों का उमड़ता हुआ इक शहर
पूर्णिमा रुक गई जा तिमिर की गली
स्वप्न आये नहीं नैन के गांव में
गीत सावन के सारे प्रतीक्षित रहे
झूले डाले नहीं नीम की छांह ने

और उमड़ी घटा की लहरिया, गगन
के किसी कोण पर जा अटकती रही

पांव ने जिस डगर को बनाया सखा
वो बदलती रही नित्य अपनी दिशा
कौन सा पथ सही, कौन सा है गलत
आज तक इसका चल न सका है पता
चल रहे हैं निरन्तर कदम राह में
कोई गंतव्य लेकिन नहीं सामने
होते बोझिल पगों को न विश्राम का
एक भी पल दिया है किसी याम ने

नीड़ की एक परछाईं बस दूर से
मन में उगती हुई आस छलती रही

उम्र की वाटिका में खिले फूल की
गंध हर एक होकर अपरिचित रही
एक पुरबाई, जिसको निमंत्रण दिया
वो बही, किन्तु …