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Showing posts from March, 2008

रूप का वर्णन तुम्हारे कर सके क्षमता नहीं है

शब्द जिसने क्रोंच पक्षी के रुदन से प्रेरणा पा
काव्य का अद्भुत गहन सागर बहाया
शब्द जिसने पी मिलन आतुर ह्रदय,उपलंभ देकर
राम मानस का नया अध्याय जीवन को सुनाया
शब्द जिसने एक भ्रम में डूब कर विचलित हुए को
मंत्र बन कर ज्ञान गीता का दिया है
शब्द जिसने अनवरत गाथाऒं की झड़िया लगाकत
लेखनी को कर गजानन के थमाया

आज वह ही शब्द हो असहाय मुझसे कह रहा है
रूप का वर्णन तुम्हारे कर सके क्षमता नहीं है

हाँ कभी कर थाम दिनकर के सुनाई उर्वशी की थी कहानी
और कालिदास के श्लोक में शाकुन्तली गाथा बखानी
संगेमरमर में पिघल कर दास्तान-ए-हुस्न भी मैने लिखी है
और दुहराई गई तपभंग की कारण कथा मेरी जुबानी

किन्तु मैं स्वीकारता असमर्थता हूँ आज अपनी, चुक गया हूँ
देख तुमको कोई भी स्वर होंठ पर चढ़ता नहीं है

जब नदी की धार करती नॄत्य बन कर इक मयूरी
जल तरंगें चूम कर तट बून्द बन शहनाई रागिनियाँ जगायें
जेठ के भुजपाश में सावन मचल अंगड़ाई ले जब
तितलियों के पंख पर जब गंध आ आ कर नये बूटे बनायें

और ये सब एक प्रतिमा में सिमट कर सामने आ जब रुके तो
रंग का भी रंग उड़ता, चित्र में भरता नहीं है

गात कलियों के, सहज कोमल परस से नेह में भर चूमती सी
वादियों में चल रही हो…

होली का रंग

लजाती ओढ़ कर चूनर सुनहरी, खेत में बाली
डिठौना बन गई सरसों, बहारों की जवानी का
बिरज ने टेसुओं का है नया पीताम्बर ओढ़ा
कथानक लिख रही जमुना उमंगों की कहानी का

हरे नीले गुलाबी रंग, सूखे और हैं गीले
चमकते कत्थई भी बैंगनी भी और हैं पीले
अधर के रंग, आँखों के, कपोलों पर खिंचे जो भी
बुलावा दे रहे हैं आज सुधि को भूल कर जी ले

चुहल अँगड़ाईयाँ लेती सजी है आज आँगन में
शहद मे डूब कर मलयज थिरकती झूम कानन में
रँगा है रंग होली के भ्रमित सा हो गया मौसम
घुली मल्हार सावन की लगा है आज फ़ागुन में

शब्द छिन गये

शब्द छिन गयेआज समय ने चलते चलते कुछ ऐसे करवट बदली है
खेल रहे थे जो अधरों पर मेरे, सारे शब्द छिन गये

इन्द्र धनुष पर बैठ खींचता रहता है जो नित तस्वीरें
बुनता वह रेशम के धागे, वही नाता है जंज़ीरें
अपने इंगित से करता है संयम काल चक्र की गति का
कभी रंग भरता निर्जन में, कभी मिटाता खिंची लकीरें

साहूकार! लिये बैठा है खुली बही की पुस्तक अपनी
और सभी बारी बारी से उसे चुकाते हुए रिन गये

कब कहार निर्धारित करता कितनी दूर चले ले डोली
कब देहरी या आंगन रँगते खुद ही द्वारे पर रांगोली
कठपुतली की हर थिरकन का होता कोई और नियंत्रक
कब याचक को पता रहेगी रिक्त, या भरे उसकी झोली

जो बटोर लेता था अक्सर तिनके खंडित अभिलाषा के
वही धैर्य अब प्रश्न पूछता रहता मुझसे हर पल छिन है

यों लगता है चित्रकथायें आज हुई सारी संजीवित
अंधियारों ने बिखर बिखर कर, सारे पंथ किये हैं दीपित
कलतक जो विस्तार कल्पना का नभ के भी पार हुआ था
कटु यथार्थ से मिला आज तो, हुआ एक मुट्ठी में सीमित

कल तक जो असंख्य पल अपने थ सागर तट की सिकता से
बँधे हाथ में आज नियति के, एक एक कर सभी गिन गये

दीप दोनों में रख कर बहाते रहे

प्रार्थना की सभा में लगा हाजिरी, ढोल चिमटे,मजीरे बजाते रहे
फूलमाला,प्रसादी की थाली लिये,परिक्रमा मन्दिरों की लगाते रहे
किन्तु पत्थर न कोई पसीजा कभी, चाल नक्षत्र अपनी बदल न सके
और हम भाग्य  को दोष देते हुए, दीप दोनों में रख कर बहाते राहे

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ज्योतिषी ने कहा था हमें एक दिन, हाथ की रेख कहती बनेगा धनी
हाथ पर हाथ रख बैठ हम फिर गये ,खुद चली आयेंगी पास हीरक मणी
आये मौसम,गये, वर्ष बीते बहुत, एक सूखा हुआ फूल भी न मिला
और हम अब भी बैठे प्रतीक्षा लिये,खुद ही खुल जायेगे भाग्य की चटकनी