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Showing posts from February, 2008

क्यों न कहो मैं गीत सुनाऊँ ?

क्यों न कहो मैं गीत सुनाऊँ ?
संभव नहीं छंद से टूटे शब्दों को सुर से गा पाऊँ


तुम्हें विदित है और मुझे भी सॄष्टि एक लय में है गतिमय
एक छन्द सा अनुशासित है नक्षत्रों तारों का विनिमय
बिन लगाम के रथ को घोड़े, ले जाते कब सही दिशा में
और योजनाहीन हुआ कब वांछित को पा लेना भी तय

आज तोड़ कर बन्धन फिरते हुए शब्द जो आवारा हैं
कितनी बार उन्हें मैं उनकी सीमा में चलना सिखलाऊँ

जाते जाते नई भोर से जो कहती हैं बूढ़ी रातें
उसमें छुपी हुई रहती हैं अनुभव की अनगिन सौगातें
लेकिन दंभ दुपहरी का उनको नकार कर कह देता है
अर्थहीन सब बीते कल के साथ गईं जो .बीती बातें

तब ऐसी उच्छॄंखलता को समझाने की कोशिश करता
सोच रहा हूँ आखिर कितनी देर और मैं समय गंवाऊं

गंध बदलती है क्या बोलो कभी कहीं शीतल चन्दन की
धारायें परिवर्तित होतीं कब जन्मों के अनुबन्धन की
बदले हुए वक्त की देते हैं दुहाई केवल अशक्त ही
दॄढ़ निश्चय ही तो सक्षमता होती है दुख के भंजन की

आज समर्पित होकर बैठे घुटने टेक और गर्वित हो
तुम बतलाओ क्यों उनकी प्रतिमा के आगे शीश नवाऊँ

पतझड़ का अध्याय खुला

देते हैं हम नित्य ज्योति को आवाज़ें
लेकिन नहीं दीप में आ बाती जलती

हमने जब जब भी बहार की पुस्तक के
पन्ने खोले,पतझड़ का अध्याय खुला
मिला जिसे आशीष नहाओ दूधों से
हर वह सपना मिला आक के दूध धुला
आशायें पल्लवित हुईं लेकिन ऐसे
जैसे सरसों जमती खुली हथेली पर
दोपहरी की धूप ढूँढ़ ले या जैसे
बिन्दु ओस के आधी खिली चमेली पर

ठोकर खाकर गिरे और फिर उठे संभल
लेकिन फिर से ठोकर भूमिसात करती

खड़े हुए व्यवधान बने थे दरवाज़े
अंगनाई इसलिये पगों से दूर रही
दीवारों पर चिपकी हुईं चार कौड़ी
अपने मद में इतराती हो चूर रही
टुटे हुए सीप के टुकड़े ऊंगली की
रहे पहुंच से परे सूत भर हो आगे
देहरी की अल्पना अधूरी रंग बिना
खोये रंग नहीं मेंहदी के भी जागे

और खिड़कियाँ ताक लगाये थी बैठीं
कोई परछाईं ही आये पग धरती

हमने जो आकाश समेटा मुट्ठी में
वह सूरज चंदा तारों से विलग रहा
उल्कायें आ बैठीं बिन आमंत्रण के
धूमकेतु जो आया वापिस नहीं गया
नदिया नहीं पर्वतों से बाहर निकली
सूख गई बोई आशाओं की क्यारी
और धरोहर एक आस्था की जो थी
टूट टूट कर तिल तिल बिखरी बेचारी

पीकर सब संकल्प निराशा एक घनी
बैठी हुई उबासी ले पंखा झलती

बिखरी है हर बार ज़िन्दगी पन्नों सी
कोई वापिस आकर क्रम से …

उत्तर सारे मौन रह गये

उत्तर सारे मौन रह गये हैं प्रश्नो के इन्तज़ार में
तुमने पूछा नहीं अभी तक कितना प्यार तुम्हें करता हूँ

शब्द प्यार की गहराई को बतला पायें क्या है संभव
मन के बन्धन होठों पर आ जायें ये होता है कब कब
सौ सौ साखी लिख कर भी जो व्यक्त कबीरा कर न पाया
मीरा के इकतारे ने ये भेद और ज्यादा उलझाया

मेरी कोशिश उन भावों को अपने, मीत, तुम्हें समझाऊं
इसीलिये तो लिये प्रतीक्षा प्रश्नों की तुमको तकता हूँ

मज़दूरी से जितना करतीं किसी श्रमिक की सुदॄढ़ बांहें
कुंकुम से करतीं दुल्हन की स्वप्न सजाती हुई निगाहें
प्यासी धरती जितना करती सावन के पहले बादल से
पोर उंगलियों के करते हैं असमंजस में जो आंचल से

आशान्वित हूँ तुम पढ़ लोगे नयनों में जो लिखी इबारत
जिसके अक्षर अक्षर में मैं तुमको ही चित्रित करता हूँ

जितना प्यार गज़ल से करता, विरह-पीर से हो स्वर घायल
जितना थाप करे तबले से, करे नॄत्य से जितना पायल
सागर करता, शंख सीपियां अपने ह्रदय सजा कर जितना
मंदिर करे आरती से ज्यों, करे नैन से जितना काजल

बन्धन तोड़ सभी संकोची,तुम्हें आज मैं बता सकूंगा
नित्य भोर की प्रथम किरण के सँग संकल्प किया करता हूँ