वाणी ने कर दिया समर्पण

व्यक्त नहीं हो सकी ह्रदय की भाषा जब कोरे शब्दों में
हुआ विजेता मौन और फिर वाणी ने कर दिया समर्पण

दॄष्टि हो गई एक बार ही नयनों से मिल कर सम्मोहित
और चेतना साथ छोड़ कर हुई एक तन्द्रा में बन्दी
चित्रलिखित रह गया पूर्ण अस्तित्व एक अनजाने पल में
बांध गई अपने पाशों में उड़ कर एक सुरभि मकरन्दी

वशीकरण, मोहन, सम्मोहन, सुधियों पर अधिकार जमाये
समझ नहीं पाया भोला मन, जाने है कैसा आकर्षण

गिरा अनयन, नयन वाणी बिन, बाबा तुलसी ने बतलाया
पढ़ा बहुत था किन्तु आज ही आया पूरा अर्थ समझ में
जिव्हा जड़, पथराये नयना, हुए अवाक अधर को लेकर
खड़ी देह बन कर प्रतिमा इक, शेष न बाकी कुछ भी बस में

संचय की हर निधि अनजाने अपने आप उमड़ कर आई
होने लगा स्वत: ही सब कुछ, एक शिल्प के सम्मुख अर्पण

आने लगे याद सारे ही थे सन्दर्भ पुरातन, नूतन
कथा,गल्प,श्रुतियां, कवितायें पढ़ी हुई ग्रन्ठों की बातें
यमुना का तट, धनुर्भंग वे पावन आश्रम ॠषि मुनियों के
नहीं न्याय कर पाये उससे, मिली ह्रदय को जो सौगातें

खींची हैं मस्तक पर कैसी, भाग्य विधाता ने रेखायें
उनका अवलोकन करने को देख रहा रह रह कर दर्पण

Comments

वशीकरण, मोहन, सम्मोहन, सुधियों पर अधिकार जमाये
समझ नहीं पाया भोला मन, जाने है कैसा आकर्षण

सुंदर लिखा आपने ...न जाने यह कैसा आकर्षण
राकेश जी
कविता इतनी अच्‍छी लगी कि कुछ कहने के लिये मुझे शब्‍द नही मिल रहे हैं। या यूँ कहूँ शब्‍दों ने कर दिया समर्पण।
रंजना said…
सचमुच,
रचना ने बाँधा यूँ मन को शब्दों ने कर दिया समर्पण....
अब इस गीत के प्रशंशा में कुछ कहूँ तो मखमल में टाट का पैबंद सा लगेगा.
साधुवाद स्वीकारें.......
रंजना said…
सचमुच,
रचना ने बाँधा यूँ मन को शब्दों ने कर दिया समर्पण....
अब इस गीत के प्रशंशा में कुछ कहूँ तो मखमल में टाट का पैबंद सा लगेगा.
साधुवाद स्वीकारें.......
Dr. Amar Jyoti said…
'हुआ विजेता मौन और फिर…'
गीत की प्रशंसा में भी यही हुआ है। अद्भुत!
aapne shabdo ka itna shaandar istmaal kiya hai ki saari ki saari rachana apne aap mein ek mahan kruti ban gayi hai ..

खींची हैं मस्तक पर कैसी, भाग्य विधाता ने रेखायें
उनका अवलोकन करने को देख रहा रह रह कर दर्पण

ye lines mahaan lines hai ..

bahut si badhai ...

aajkal aap mere blog par darshan nahi dete... kuch nayi rachnaayen aapki raah dekh rahi hai ..


vijay
pls visit my blog :
http://poemsofvijay.blogspot.com/
खींची हैं मस्तक पर कैसी, भाग्य विधाता ने रेखायें
उनका अवलोकन करने को देख रहा रह रह कर दर्पण


अहा....!मेरी वाणी कब का समर्पण कर चुकी है आपकी प्रशंसा के क्षेत्र में....!
Shar said…
:)
Shardula said…
आया पूरा अर्थ समझ में ??

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